Last Updated on January 13, 2026 11:53 pm by INDIAN AWAAZ

By निशा
किताबों की खुशबू, इसके पन्नों की सरसराहट और उस पर उकेरे गए शब्द हमें किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं। चाहे ज्ञान-विज्ञान हो या रोमांस, चाहे खाना पकाना हो या योग, राजनीति से लेकर अर्थनीति, देश से लेकर दुनिया तक, बच्चे से लेकर युवा और वृद्ध तक सबके लिए किताबें साथी के रूप में हमेशा साथ निभाती आईं हैं।
हर पुस्तक प्रेमी दिल्ली में लगने वाले विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इन्तजार करता है। दिल्ली की ठंड में किताबों की गर्माहट से सभी को सूकून मिलता है। विश्व पुस्तक मेला 2026, का आयोजन 10-18 जनवरी को दिल्ली में हो रहा है। इसमें 1000 से ज्यादा प्रकाशक और 3000 से ज्यादा स्टॉल हैं, जिसमें देशी और विदेशी प्रकाशक शामिल हैं। विश्व पुस्तक मेले का आयोजन पिछले 53 सालों से नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। पुस्तक प्रकाशन में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर आता है। इससे साफ हो जाता है कि हमारे देश में किताबों का कितना महत्त्व रहा है।
पर धीरे-धीरे इस मेले में भारी बदललाव देखने को मिल रहा है। प्रगति मैदान जहां यह मेला आयोजित होता है उसका नाम भी अब भारत मंडपम हो गया है, सिर्फ नाम ही नहीं बदला है, बहुत-सी चीज़ें बदल गई हैं। अब पुस्तक मेले का आयोजन किसी मार्केटिंग इवेंट की तरह किया जाता है। जहां पर सारा ज़ोर किताबों से ज्यादा ज़ोर दूसरी चीज़ों पर होता है।
फिल्म स्टार और सेलिब्रिटीज को बुला कर, नि:शुल्क प्रवेश या फ्री एंट्री से भीड़ तो जुट जाती है पर क्या इससे किताबों की जानकारी या उनके पाठकों को कोई लाभ मिल पाता है। इससे ऐसे लोग भी आने लगे हैं जिन्हें किताबों से कोई लगाव है ही नहीं, जो केवल मस्ती और टाइम पास के लिए आ जाते हैं।

पहले लोग साल भर अपने पसंदीदा लेखक से मिलने का इंतज़ार करते थे और उनकी किताब पर उनके ऑटोग्राफ पाने के लिए उत्सुक रहते थे। गंभीर चर्चाएँ लेखक मंच पर भीड़ जमाए रखती थी, पर आजकल इन चर्चाओं में इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई देते हैं, उनमें भी ऐसे लोग शामिल होते हैं जो थक कर आराम की तललाश में उन कुर्सियों पर बैठ जाते हैं।
प्रधानमंत्री की सैन्य वर्दी वाली तस्वीर से सजा एक सेल्फी कॉर्नर एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है। क्या प्रधानमंत्री को हाथ में पुस्तक लिए हुए नहीं दिखाया जाना चाहिए था? आखिरकार, जहां साहस राष्ट्र की रक्षा करता है, वहीं पुस्तकें उसके विचार, पहचान और सामूहिक चेतना को आकार देती हैं। इन दोनों के बीच संतुलन ही ऐसे साहित्यिक आयोजन की वास्तविक भावना को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सकता है।
आज के ज़ेन ज़ी युवा जो किताबें पढ़ने की बजाय किताब पढ्ने की सेलफ़ी लेने के लिए आते हैं। जहां धीरे-धीरे कम होती पढ़ने की आदत ने प्रकाशकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं ऐसे दौर में पुस्तक मेले की शुचिता को बनाए रखा जाना चाहिए। जहां पर लेखक, प्रकाशक और पाठक आपस में संवाद कर सकें और किताबों की इस मनमोहक दुनिया को और खूबसूरत बना सकें।
