
— ललित गर्ग
अक्सर कहा जाता है कि जल ही जीवन है। लेकिन यदि यही जल दूषित हो जाए, तो क्या वह जीवन का आधार रह जाता है? सच तो यह है कि प्रदूषित पानी जीवन को सहारा नहीं देता, बल्कि उसे खतरे में डाल देता है। आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की चुनौती से जूझ रही है। विडंबना यह है कि जिस देश में नदियों को मां का दर्जा दिया जाता है और जल को पवित्र माना जाता है, वहीं करोड़ों लोग आज भी सुरक्षित पेयजल से वंचित हैं। यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि नीतिगत खामियों, प्रशासनिक उदासीनता और असंतुलित विकास मॉडल को भी उजागर करती है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने पेयजल उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं। 2019 में शुरू हुआ जल जीवन मिशन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है, जिसका लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार तक नल का जल पहुंचाना है। इसी तरह नमामि गंगे जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य नदियों की सफाई रहा है। इन प्रयासों से जल आपूर्ति के बुनियादी ढांचे का विस्तार जरूर हुआ है। जहां 2019 में केवल 16.7% ग्रामीण परिवारों के पास नल का जल था, वहीं 2024 के अंत तक यह आंकड़ा 80% से अधिक हो गया। यह उपलब्धि सराहनीय है, लेकिन केवल पाइपलाइन बिछा देने से समस्या का समाधान नहीं होता। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि घरों तक पहुंचने वाला पानी वास्तव में स्वच्छ और सुरक्षित हो।
दुर्भाग्य से, पानी की गुणवत्ता को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं है। विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पेयजल के नमूनों की जांच से पता चलता है कि बड़ी मात्रा में पानी दूषित है। चिंताजनक बात यह है कि ऐसे नमूनों में से केवल एक-चौथाई का ही सुधारात्मक उपचार किया गया है। इसका मतलब है कि बड़ी आबादी अब भी असुरक्षित पानी पीने को मजबूर है। यह स्थिति विकास के दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि इतनी बुनियादी आवश्यकता की गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं की जा सकती, तो हमारी उपलब्धियां अधूरी ही मानी जाएंगी।
यह संकट केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं है; शहरों में भी स्थिति चिंताजनक है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, पुरानी पाइपलाइन व्यवस्था और अपर्याप्त सीवेज प्रबंधन शहरों में जल प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। कई जगहों पर पेयजल पाइपलाइनें सीवेज लाइनों के बेहद करीब से गुजरती हैं। समय के साथ पाइपलाइनें जर्जर हो जाती हैं और उनमें सीवेज का पानी रिसने लगता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा होता है। हाल के वर्षों में कई शहरों में दूषित पानी के कारण बीमारियों और मौतों के मामले सामने आए हैं। इंदौर जैसे शहर, जिन्हें स्वच्छता के लिए बार-बार सम्मानित किया गया है, वहां भी इस समस्या की गंभीरता सामने आई है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते आए हैं कि अधिकांश बीमारियों की जड़ पाचन तंत्र से जुड़ी होती है, और दूषित पानी इसका प्रमुख कारण है। डायरिया, उल्टी, टाइफाइड, हैजा और पीलिया जैसी जलजनित बीमारियां आज भी लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर होता है, क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कमजोर होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी इस संकट को और गहरा कर देती है। इस प्रकार, दूषित पानी केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि एक बड़ा जनस्वास्थ्य संकट है।
जल प्रदूषण के कई कारण हैं। इनमें सबसे प्रमुख है बिना उपचार के औद्योगिक कचरे का नदियों और जल स्रोतों में छोड़ा जाना। इसके अलावा, शहरों का अनुपचारित सीवेज भी जल स्रोतों को प्रदूषित करता है। प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि देश की कई नदियों के जल की गुणवत्ता निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरती। इससे स्पष्ट है कि हमारे जल स्रोत प्रदूषण के जाल में फंसते जा रहे हैं। इसके साथ ही, भूजल का अत्यधिक दोहन भी स्थिति को गंभीर बना रहा है। भारत दुनिया में भूजल के सबसे बड़े उपयोगकर्ताओं में से एक है, और इसके अत्यधिक दोहन के कारण कई क्षेत्रों में फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ रही है।
अनियोजित और अनियंत्रित विकास ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। बढ़ते शहर, फैलते उद्योग और बढ़ती जनसंख्या जल संसाधनों पर भारी दबाव डाल रहे हैं, लेकिन जल प्रबंधन प्रणाली इस गति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाई है। कई शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो पर्याप्त नहीं हैं या प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं, जिसके कारण बड़ी मात्रा में गंदा पानी सीधे नदियों और झीलों में पहुंच रहा है। जब इन्हीं प्रदूषित स्रोतों से पेयजल की आपूर्ति होती है, तो दूषण अवश्यंभावी हो जाता है।
प्रदूषित पानी का असर केवल मानव स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। नदियों और झीलों में बढ़ता प्रदूषण जलीय जीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है और कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। इसके अलावा, जब प्रदूषित पानी का उपयोग सिंचाई में होता है, तो यह मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करता है और अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार, जल प्रदूषण एक जटिल और बहुआयामी समस्या है।
इस संकट से निपटने के लिए केवल नीतियों की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है। सबसे पहले, जल गुणवत्ता की नियमित और पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। नमूनों की जांच तभी सार्थक है, जब प्रदूषण मिलने पर तुरंत सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। इसके अलावा, जल आपूर्ति और सीवेज प्रणाली के बीच सुरक्षित दूरी बनाए रखना अनिवार्य किया जाना चाहिए। जिन शहरों में पाइपलाइनें पुरानी हो चुकी हैं, वहां चरणबद्ध तरीके से उनका नवीनीकरण जरूरी है।
औद्योगिक प्रदूषण पर कड़ा नियंत्रण भी अत्यंत आवश्यक है। उद्योगों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी अनुपचारित कचरा जल स्रोतों में न छोड़ा जाए। इसके लिए सख्त नियमों के साथ-साथ मजबूत निगरानी तंत्र की भी आवश्यकता है। साथ ही, स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय करना भी जरूरी है, क्योंकि जल आपूर्ति और उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी अक्सर उन्हीं पर होती है।
यह समझना आवश्यक है कि स्वच्छ पानी कोई विलासिता नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। जैसे भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य को बुनियादी जरूरत माना जाता है, उसी तरह सुरक्षित पेयजल को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि देश वास्तव में स्वस्थ और समृद्ध बनना चाहता है, तो जल गुणवत्ता सुनिश्चित करना उसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में होना चाहिए।
आगे बढ़ते हुए, जल प्रबंधन को केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसे जनआंदोलन का रूप देना होगा, जिसमें आम जनता की सक्रिय भागीदारी हो। सामुदायिक स्तर पर जल परीक्षण, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और जागरूकता अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब तक समाज, प्रशासन और सरकार मिलकर प्रयास नहीं करेंगे, तब तक दूषित पानी का यह संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाएगा।
अंततः, स्वच्छ जल की रक्षा करना ही जीवन की रक्षा करना है—और यह जिम्मेदारी हम सभी की है।
