
प्रदीप शर्मा
आखिरकार केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) हटाते हुए प्रख्यात जलवायु कार्यकर्ता Sonam Wangchuk को रिहा कर दिया है। वे पिछले वर्ष सितंबर से जोधपुर जेल में बंद थे। उनकी गिरफ्तारी को लेकर विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने लगातार सवाल उठाए थे। सरकार का कहना है कि यह फैसला लद्दाख में शांति, स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया गया है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले ही केंद्र को अपने कमजोर आधार का एहसास हो गया और रिहाई का निर्णय लेना पड़ा।
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वांगचुक लंबे समय से लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर आंदोलनरत रहे हैं। उन्होंने कई बार अनशन और पदयात्रा के माध्यम से अपनी आवाज उठाई। हालांकि सितंबर 2025 में आंदोलन के दौरान हिंसा भड़कने के बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था।
गृह मंत्रालय ने एनएसए की धारा 14 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए लेह जिला मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके आधार पर 26 सितंबर 2025 से वांगचुक हिरासत में थे। मंत्रालय के अनुसार, वे हिरासत की अवधि का लगभग आधा समय पूरा कर चुके थे।
इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वाले एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यावरण कार्यकर्ता पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाना उचित था? नागरिक संगठनों ने यह भी मुद्दा उठाया कि लद्दाख के ठंडे क्षेत्र से उन्हें 1400 किलोमीटर दूर राजस्थान की गर्म जलवायु वाली जेल में क्यों रखा गया।
इस बीच, Supreme Court of India ने भी वांगचुक की गिरती सेहत को देखते हुए उनकी हिरासत की समीक्षा का संकेत दिया था। उनकी पत्नी ने स्वास्थ्य जांच और नियमित मेडिकल रिपोर्ट की मांग की थी। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि हिरासत के आदेश में कानूनी खामियां पाई जाती हैं, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
सरकार का पक्ष है कि आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था बिगड़ने और हिंसा भड़कने के कारण एनएसए लगाने के पर्याप्त आधार थे। 24 सितंबर 2025 को लेह में हालात बिगड़ गए थे, जहां पुलिस कार्रवाई में कई लोगों की जान गई और अनेक घायल हुए। यह वांगचुक की पिछले पांच वर्षों में पांचवीं भूख हड़ताल थी, जिसका उद्देश्य लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित कराना था।
वहीं विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस, यह सवाल उठा रहे हैं कि करीब 170 दिनों तक हिरासत में रखने की जवाबदेही कौन तय करेगा। उनका आरोप है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का दुरुपयोग किया गया और लद्दाख के पर्यावरण व अधिकारों की आवाज उठाने की कीमत वांगचुक को चुकानी पड़ी।
यह पूरा घटनाक्रम एक व्यापक बहस को जन्म देता है—लोकतंत्र में आंदोलनों की क्या भूमिका है और क्या सख्त कानूनों का इस्तेमाल असहमति की आवाज को दबाने के लिए किया जा रहा है?
