Last Updated on November 18, 2025 8:45 pm by INDIAN AWAAZ

ललित गर्ग
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस वर्षों से विश्वभर में महिलाओं के अधिकारों, संघर्षों और आकांक्षाओं को सामने लाने का मंच रहा है। इसी भावना के साथ अब दुनिया के तीस से अधिक देश ‘अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस’ भी मनाते हैं। इसका पहला आयोजन 19 नवम्बर 1999 को त्रिनिदाद और टोबैगो में डॉ. जेरोम टीलकसिंह द्वारा किया गया था।
इसके बावजूद पुरुषों की समस्याएँ आज भी सामाजिक अपेक्षाओं और मौन के बोझ तले दबकर रह जाती हैं। यह दिवस केवल पुरुषों का उत्सव नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं, संघर्षों और अदृश्य सच्चाइयों को समझने का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि समाज एकल लिंग की नहीं, बल्कि पुरुष और महिला—दोनों की संतुलित भलाई पर टिका है।
साल 2025 की थीम “मेन्स ऐंड बॉयज़ का उत्सव” इस गहरी सच्चाई की ओर संकेत करती है। आज का पुरुष एक अनोखे मोड़ पर खड़ा है—उससे परंपरागत जिम्मेदारियों के साथ-साथ आधुनिक संवेदनशीलताओं को भी अपनाने की अपेक्षा की जाती है। वह रक्षक भी रहे और कोमल भावनाओं को व्यक्त भी करे। यह दोहरा दबाव एक आंतरिक संघर्ष पैदा करता है, जिसके बारे में समाज शायद ही कभी सोचता है।
पुरुष को ‘मजबूत’, ‘अटूट’ और ‘बिना समस्या का’ मानकर उसकी वास्तविक ज़रूरतों और कमजोरियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। कई पुरुष ज़िम्मेदारियों से दबे रहते हैं, लेकिन सहानुभूति से वंचित। वे पीड़ा सहते हैं, लेकिन अभिव्यक्ति से रोके जाते हैं।
पुरुषों के इस मौन के गंभीर परिणाम भी हैं। घरेलू हिंसा, झूठे आरोप, पितृत्व अधिकारों से वंचित होना, कार्यस्थल पर उत्पीड़न और भावनात्मक उपेक्षा—ये सब वास्तविक समस्याएँ हैं, लेकिन अक्सर मज़ाक समझकर खारिज कर दी जाती हैं। “पुरुष दर्द नहीं महसूस करते” जैसी धारणाएँ उनकी सच्चाई मिटा देती हैं।
आँकड़े बताते हैं कि पुरुषों में अवसाद और आत्महत्या की दर महिलाओं से अधिक है, फिर भी यह चिंता शायद ही कभी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनती है। यह उपेक्षा न केवल अनुचित है, बल्कि समाज की भावनात्मक संतुलन को भी खतरे में डालती है।
हाल के वर्षों में ‘ऑल इंडिया मेन्स एसोसिएशन’ ने पुरुष कल्याण मंत्रालय की स्थापना की मांग की है। उत्तर प्रदेश के कई विधायकों ने राष्ट्रीय पुरुष आयोग बनाने की वकालत की है, यह तर्क देते हुए कि कई पुरुष एकतरफा कानूनों और सामाजिक उपहास के कारण चुपचाप पीड़ा सहते हैं। उनका सवाल सरल है—यदि महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के लिए संस्थान हैं, तो पुरुषों को यह सुविधा क्यों नहीं?
पुरुष परिवार और समाज दोनों के अभिन्न स्तंभ हैं—वे पिता हैं, पति हैं, बेटे हैं, भाई हैं, मित्र हैं। उनके कंधों पर घरों और समुदायों की जिम्मेदारियाँ टिकी होती हैं। विज्ञान, कला, श्रम, विकास और सामाजिक प्रगति में उनके योगदान अपार हैं, फिर भी उनके त्याग को अक्सर मान्यता नहीं मिलती।
घरेलू हिंसा से पीड़ित पुरुष एक और अनकहा विषय है। सरकारी सर्वेक्षण इस पर मौन हैं, लेकिन ‘सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन’ और ‘माई नेशन’ की रिपोर्टें बताती हैं कि शादी के शुरुआती तीन वर्षों में 90 प्रतिशत से अधिक पुरुष कम से कम एक प्रकार की घरेलू प्रताड़ना का सामना करते हैं। उनकी पीड़ा भी उतनी ही वास्तविक है और उसे भी न्याय मिलना चाहिए। वे वर्चस्व नहीं, गरिमा चाहते हैं—अपनी पीड़ा कह पाने और सुने जाने का अधिकार।
अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस हमें मर्दानगी की नई समझ विकसित करने का अवसर देता है। लैंगिक समानता तब तक अधूरी है जब तक पुरुषों की समस्याओं को भी समान संवेदना के साथ नहीं देखा जाता। महिलाओं को सशक्त बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी पुरुषों पर थोपे गए कठोर सामाजिक ढाँचों को बदलना भी है।
एक संतुलित समाज तभी बन सकता है जब दोनों लिंग एक-दूसरे के सहयोगी माने जाएँ—प्रतिद्वंद्वी नहीं। पुरुषों को कठोरता की अपेक्षा से मुक्त कर उन्हें भावनात्मक अस्तित्व के रूप में समझना होगा। उनकी आँखों के आँसू कमजोरी नहीं, संवेदना का प्रतीक हैं।
यह दिवस हमें प्रेरित करता है कि पुरुषों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत हो, सकारात्मक पुरुष आदर्शों को पहचाना जाए और एक ऐसा समावेशी समाज बनाया जाए जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों बिना भय और पूर्वाग्रह के विकसित हो सकें।
पुरुष सदियों से परिवारों और राष्ट्रों के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते आए हैं—वे रक्षा करते हैं, सहते हैं, त्याग करते हैं और आगे बढ़ाते हैं। लेकिन वे भी सहानुभूति, समर्थन और सम्मान के हकदार हैं।
एक सच्चा मानवीय और संतुलित समाज तब ही उभरेगा, जब हम पुरुषों के मौन दर्द को भी उसी करुणा से सुनें, जिस करुणा से हम महिलाओं की पीड़ा को सुनते हैं। तभी हम ऐसे विश्व की ओर बढ़ पाएँगे जो हर व्यक्ति की गरिमा और मानवता का सम्मान करता है—लिंग से परे।
