Last Updated on January 3, 2026 1:08 am by INDIAN AWAAZ

— ललित गर्ग
ऑनलाइन बाज़ारों और त्वरित सेवाओं के इस दौर में गिग वर्कर्स शहरी जीवन की वह अदृश्य रीढ़ बन चुके हैं, जिनके बिना “दस मिनट में डिलीवरी” और “वन-क्लिक सुविधा” की कल्पना भी संभव नहीं है। हर मौसम, हर समय और हर जोखिम में ये युवा श्रमिक उपभोक्ताओं को बाज़ार जाने की झंझट से मुक्त करते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊँची इमारत जिनके श्रम पर खड़ी है, वही सबसे अधिक असुरक्षा, शोषण और उपेक्षा का शिकार हैं।
नए साल की पूर्व संध्या पर गिग वर्कर्स की हड़ताल ने भले ही राष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था को ठप न किया हो, लेकिन इसने देश का ध्यान उनकी दयनीय कार्यस्थितियों की ओर अवश्य खींचा। यह विरोध किसी राजनीतिक उकसावे का परिणाम नहीं था, बल्कि बढ़ते काम के दबाव, घटती आय, नौकरी की अनिश्चितता और सम्मान से वंचित जीवन के विरुद्ध एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। मोटरसाइकिलों पर ट्रैफिक को चीरते, भारी बैग उठाकर ऊँची इमारतों की सीढ़ियाँ चढ़ते ये युवा कठोर समय-सीमा के दबाव में काम करते हैं, जहाँ मामूली देरी भी आर्थिक दंड में बदल जाती है। दुर्घटना, बीमारी या तकनीकी खराबी का सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ता है। ग्राहकों की असंवेदनशीलता, अपमानजनक व्यवहार, कठोर रेटिंग प्रणाली और गाली-गलौज उनकी रोज़मर्रा की हकीकत बन चुकी है। 12 से 14 घंटे काम करने के बावजूद अधिकांश की आय मात्र 700 से 800 रुपये तक सीमित रहती है, वह भी बिना पर्याप्त बीमा या सामाजिक सुरक्षा के—जो एक संरचनात्मक शोषण की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।
गिग वर्कर्स वे श्रमिक हैं जो स्थायी नौकरी के बजाय अस्थायी, लचीले और कार्य-आधारित काम करते हैं। उबर, स्विगी, ज़ोमैटो जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म इनके काम का माध्यम हैं। इन्हें नियमित वेतन के बजाय प्रति कार्य भुगतान मिलता है और स्थायी रोजगार अनुबंध नहीं होता। ‘स्वतंत्र’ कहलाने के बावजूद इन्हें स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना सुरक्षा या पेंशन जैसे बुनियादी अधिकार प्राप्त नहीं हैं। अनियमित आय, अत्यधिक कार्यभार, कम भुगतान और लंबे कार्य घंटे इनके प्रमुख संकट हैं। व्यवहार में यह व्यवस्था पारंपरिक नौ-से-पाँच नौकरी से कहीं अधिक असुरक्षित सिद्ध हो रही है।
निस्संदेह, गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। आज भारत में लगभग 1.25 करोड़ गिग वर्कर्स हैं, जिनकी संख्या 2030 तक 2.35 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। लेकिन बढ़ती बेरोज़गारी के बीच शिक्षित युवा मजबूरी में इस व्यवस्था में प्रवेश कर रहे हैं। जनसांख्यिकीय लाभांश पर गर्व करने वाले देश में युवाओं को अस्थायी, असुरक्षित और गरिमा-विहीन काम में फँसाना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। यह ऐसे विकास मॉडल को उजागर करता है जो रोजगार की गुणवत्ता के बजाय केवल संख्या पर केंद्रित है।
गिग अर्थव्यवस्था का मूल विरोधाभास यही है कि कंपनियाँ श्रमिकों से पूरा श्रम तो लेती हैं, लेकिन उन्हें औपचारिक कर्मचारी मानने से इंकार कर देती हैं। “स्वतंत्र ठेकेदार” का लेबल लगाकर न्यूनतम वेतन, बीमा और सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारियों से बचा जाता है। एल्गोरिदमिक निगरानी, रेटिंग सिस्टम और प्रोत्साहन आधारित नियंत्रण एक अदृश्य पिंजरा बनाते हैं—जहाँ स्वतंत्रता केवल दिखावटी होती है। हड़ताल के दौरान बोनस और ऑर्डर बढ़ाकर एकजुटता को तोड़ा जाता है, जैसा कि 31 दिसंबर को रिकॉर्ड ऑर्डरों से स्पष्ट हुआ।
हाल के श्रम सुधारों में पहली बार गिग वर्कर्स को कानूनी परिभाषा दी गई है और सामाजिक सुरक्षा कोष जैसी पहल की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम वास्तविक बदलाव लाएँगे या केवल काग़ज़ी रह जाएँगे। न्यूनतम आय की गारंटी, कार्य घंटे की सीमा, बीमा और प्रभावी शिकायत निवारण के बिना सुधार अधूरे रहेंगे।
31 दिसंबर की हड़ताल नैतिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह उचित थी। गिग वर्कर्स ने स्पष्ट किया कि वे केवल “डिलीवरी बॉय” नहीं, बल्कि अधिकारों वाले श्रमिक नागरिक हैं। डिजिटल भारत की असली परीक्षा इसी में है कि वह अपने सबसे तेज़ी से दौड़ते श्रमिकों को कितनी सुरक्षा, सम्मान और स्थिरता देता है। सुविधा अगर श्रमिक की गरिमा की कीमत पर मिले, तो ऐसा विकास टिकाऊ नहीं हो सकता।
