Last Updated on July 29, 2026 9:01 pm by INDIAN AWAAZ

आर. सूर्यामूर्ति / नई दिल्ली

करीब सात वर्ष पहले नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) को लेकर देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद अब केंद्र सरकार एक बार फिर ऐसा विधेयक लेकर आई है, जिसने जन्म प्रमाणपत्र को भारत की पहचान व्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा लोकसभा में पेश पंजीकरण जन्म एवं मृत्यु (संशोधन) विधेयक, 2026 का उद्देश्य जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण के नियमों को अधिक सख्त बनाना है। सरकार का कहना है कि नागरिक पंजीकरण प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने और फर्जी पंजीकरण रोकने के लिए कड़े सत्यापन की आवश्यकता है।

हालांकि सरकार इसे प्रशासनिक सुधार बताते हुए आधिकारिक रिकॉर्ड की गुणवत्ता बढ़ाने का प्रयास कह रही है, लेकिन विधि विशेषज्ञों और नागरिक अधिकारों से जुड़े जानकारों का मानना है कि इसके प्रभाव केवल नगर निकायों के रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहेंगे। उनका कहना है कि जन्म प्रमाणपत्र अब केवल एक नागरिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि कानूनी पहचान का मूल आधार बनता जा रहा है। ऐसे में प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाने से गरीब, वंचित और हाशिये पर रहने वाले तबकों पर असमान रूप से असर पड़ सकता है।

विलंबित पंजीकरण के लिए होगी दो-स्तरीय मंजूरी

प्रस्तावित संशोधन पंजीकरण जन्म एवं मृत्यु अधिनियम, 1969 की धारा 13 में बदलाव करता है और विलंब से किए जाने वाले पंजीकरण के लिए चरणबद्ध स्वीकृति प्रणाली लागू करता है।

विधेयक के अनुसार यदि जन्म या मृत्यु की सूचना घटना के एक वर्ष बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो उसका सत्यापन और अनुमोदन जिला मजिस्ट्रेट, उपमंडल मजिस्ट्रेट अथवा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट करेंगे।

यदि पंजीकरण दो वर्ष से अधिक विलंब से कराया जाता है, तो सत्यापन के बाद प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के आधार पर ही पंजीकरण संभव होगा।

मौजूदा कानून में एक वर्ष से अधिक की देरी पर मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती है, लेकिन दो वर्ष और कई दशकों की देरी के मामलों में कोई अलग व्यवस्था नहीं है। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से विलंबित पंजीकरण अधिक पारदर्शी और कठोर होगा तथा समय पर पंजीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

विधेयक के साथ प्रस्तुत उद्देश्य एवं कारण विवरण में कहा गया है कि 2023 में हुए संशोधनों के बाद राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से मिले सुझावों के आधार पर विलंबित पंजीकरण संबंधी प्रावधानों को “और अधिक सख्त” बनाने का निर्णय लिया गया है।

इसके अलावा विधेयक में निरस्त हो चुकी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 का उल्लेख किया गया है, ताकि कानून को नई आपराधिक न्याय प्रणाली के अनुरूप बनाया जा सके।

अब केवल जन्म प्रमाणपत्र नहीं, पहचान की बुनियाद

सरकार का तर्क है कि आज जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र आधुनिक प्रशासन की आधारशिला बन चुके हैं।

वर्तमान में जन्म प्रमाणपत्र स्कूल में प्रवेश, पासपोर्ट, आधार नामांकन, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, उत्तराधिकार, मतदाता सूची और अनेक सरकारी सेवाओं के लिए प्रमुख दस्तावेज़ के रूप में उपयोग किया जाता है।

2023 के संशोधनों के बाद जन्म प्रमाणपत्र को जन्म तिथि और जन्म स्थान के प्रमाण के रूप में कई सरकारी कार्यों के लिए एकल दस्तावेज़ का दर्जा दिया जा चुका है। ऐसे में सरकार का कहना है कि विलंबित पंजीकरण की सख्त जांच फर्जी पहचान, दोहरी पहचान और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर रोकने के लिए आवश्यक है।

लेकिन यही बढ़ती महत्ता इस विधेयक को राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी बनाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जन्म प्रमाणपत्र शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय समावेशन और सरकारी योजनाओं तक पहुंच का अनिवार्य माध्यम बन चुका है, तो अतिरिक्त प्रक्रियात्मक बाधाएं सीधे नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं।

CAA, NRC और NPR की बहस फिर चर्चा में

यह विधेयक ऐसे समय आया है जब देश अभी भी CAA, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) को लेकर हुई व्यापक बहस को भूला नहीं है।

दिसंबर 2019 में संसद द्वारा CAA पारित किए जाने के बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों का आरोप था कि यदि इसे राष्ट्रीय स्तर पर NRC और NPR के साथ लागू किया गया तो करोड़ों लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं।

सरकार ने उस समय इन आशंकाओं को लगातार खारिज करते हुए कहा था कि CAA केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों को शीघ्र नागरिकता देने का प्रावधान है। साथ ही NPR को नियमित जनगणना प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया था और यह भी कहा गया था कि देशव्यापी NRC लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

इसके बावजूद विरोध प्रदर्शनों ने एक बड़ी चिंता को उजागर किया—भारत में दशकों तक करोड़ों लोगों के जन्म का पंजीकरण ही नहीं हुआ था।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि प्रवासी मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक, बेघर लोग, आदिवासी समुदाय, विस्थापित आबादी और ग्रामीण परिवार अक्सर प्रशासनिक कमियों के कारण आवश्यक दस्तावेज़ों से वंचित रह जाते हैं। कई लोगों के लिए वर्षों बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाना आज भी जटिल सरकारी प्रक्रियाओं, अधूरे रिकॉर्ड और स्थानीय अधिकारियों के बीच भटकने जैसा है।

ऐसे में नए विधेयक को केवल प्रशासनिक संशोधन के बजाय सरकारी दस्तावेज़ीकरण व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।

हालांकि विधेयक में CAA, NRC या NPR का कहीं उल्लेख नहीं है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब जन्म प्रमाणपत्र पहचान का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बनता जा रहा है, तब विलंबित पंजीकरण को कठिन बनाना स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील विषय बन जाता है।

पहुंच बनाम प्रक्रिया का सवाल

नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि नागरिक रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना आवश्यक है। डिजिटलीकरण, ऑनलाइन पंजीकरण और संस्थागत प्रसव में वृद्धि के कारण पिछले एक दशक में भारत में जन्म पंजीकरण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

इसके बावजूद दूरदराज़ के गांवों, आदिवासी इलाकों, संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों और प्रवासी आबादी में विलंबित पंजीकरण अब भी आम है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन मामलों में देरी अक्सर धोखाधड़ी नहीं, बल्कि गरीबी, अशिक्षा, भौगोलिक कठिनाइयों, जागरूकता की कमी और प्रशासनिक विफलताओं का परिणाम होती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि दो वर्ष बाद पंजीकरण के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य होने से आवेदकों पर अतिरिक्त खर्च, समय और अनिश्चितता का बोझ बढ़ सकता है। इससे पहले से ही दबाव झेल रही न्यायिक व्यवस्था पर भी अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका है, यदि इसके साथ सरल डिजिटल सत्यापन और समयबद्ध प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

विशेषज्ञ यह भी इंगित करते हैं कि विधेयक में वास्तविक कारणों से विलंबित पंजीकरण कराने वालों के लिए न तो दस्तावेज़ी प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रावधान है और न ही शिकायत निवारण तंत्र की व्यवस्था।

विधेयक में यह भी कहा गया है कि इन संशोधनों के लिए भारत की संचित निधि से किसी अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता नहीं होगी, यानी मौजूदा प्रशासनिक तंत्र ही इन नई जिम्मेदारियों को निभाएगा।

दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता और समावेशन के बीच संतुलन की चुनौती

यह विधेयक सरकार की व्यापक डिजिटल प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें विश्वसनीय नागरिक पंजीकरण डेटाबेस को कल्याणकारी योजनाओं, जनसंख्या नियोजन और पहचान सत्यापन का आधार बनाया जा रहा है।

फर्जी पंजीकरण रोकने और सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाने की आवश्यकता पर लगभग सभी सहमत हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सख्त सत्यापन प्रणाली और प्रत्येक नागरिक को कानूनी पहचान तक समान एवं आसान पहुंच—दोनों उद्देश्यों को एक साथ हासिल किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में लाखों लोगों के लिए जन्म का विलंबित पंजीकरण किसी धोखाधड़ी का परिणाम नहीं, बल्कि गरीबी, पलायन, भौगोलिक कठिनाइयों और संस्थागत कमजोरियों की देन है। यदि इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो कड़े नियम दस्तावेज़ीकरण की खाई को पाटने के बजाय और गहरा कर सकते हैं।

संसद में इस विधेयक पर होने वाली बहस इसलिए केवल जन्म और मृत्यु के पंजीकरण तक सीमित नहीं रहेगी। यह उस व्यापक नीति-चर्चा का हिस्सा बन सकती है, जो CAA आंदोलन के बाद से लगातार उठती रही है—आखिर भारत एक भरोसेमंद और मजबूत दस्तावेज़ीकरण प्रणाली कैसे विकसित करे, बिना इस जोखिम के कि कानूनी पहचान प्राप्त करना जटिल नौकरशाही प्रक्रिया पर निर्भर हो जाए।

ऐसे समय में जब जन्म प्रमाणपत्र नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ों, सरकारी सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं का प्रमुख प्रवेश द्वार बनता जा रहा है, चुनौती केवल समय पर जन्म पंजीकरण सुनिश्चित करने की नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की है कि प्रशासनिक सख्ती के नाम पर वही नागरिक व्यवस्था से बाहर न रह जाएं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से सरकारी रिकॉर्ड में शामिल होने में सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।