Last Updated on June 16, 2026 5:18 pm by INDIAN AWAAZ

प्रवीण कुमार

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आने की आहट तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर शुरू हुई नाराज़गी अब सीधे पार्टी के अस्तित्व और नेतृत्व की लड़ाई में बदलती दिख रही है। पार्टी के बाग़ी सांसद अब सिर्फ अलग रास्ता नहीं चुन रहे, बल्कि ममता बनर्जी के नेतृत्व को खुली चुनौती देते हुए टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा ठोकने की तैयारी में हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बाग़ी खेमे की रणनीति केवल संसद में अलग पहचान बनाने तक सीमित नहीं है। उनकी कोशिश खुद को “असली टीएमसी” के रूप में स्थापित करने और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर वैधानिक दावा पेश करने की है। अगर ऐसा होता है तो आने वाले दिनों में मामला चुनाव आयोग से लेकर अदालतों तक पहुंच सकता है।

20 सांसदों के एनसीपीआई में विलय की घोषणा के बाद बाग़ी नेता अरूप चक्रवर्ती का बयान इस संघर्ष की दिशा का साफ संकेत दे रहा है। उनका कहना है कि उन्होंने टीएमसी नहीं छोड़ी है, बल्कि वे उस पार्टी को सुधारने निकले हैं जो नेतृत्व की गलतियों के कारण जनता का भरोसा खो चुकी है। चक्रवर्ती का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह था कि उनका गुट पार्टी के चुनाव चिह्न के लिए भी लड़ाई लड़ेगा। मतलब यह कि बंगाल की राजनीति में यह सिर्फ एक चुनाव चिह्न का विवाद नहीं, बल्कि पार्टी की वैधता और विरासत पर कब्ज़े की लड़ाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले डेढ़ दशक में ममता बनर्जी ने कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन यह संकट अलग है। पहली बार पार्टी के भीतर से एक संगठित समूह न केवल नेतृत्व पर सवाल उठा रहा है, बल्कि पार्टी की पहचान को भी चुनौती दे रहा है। बाग़ी सांसद लगातार आरोप लगा रहे हैं कि चुनावी हार के बाद नेतृत्व आत्ममंथन से बच रहा है। यही वजह है कि अब असंतोष खुले विद्रोह का रूप ले चुका है।

टीएमसी नेतृत्व इस पूरी कवायद को संविधान की 10वीं अनुसूची के खिलाफ बता रहा है। पार्टी का तर्क है कि केवल सांसदों का समूह अलग होकर किसी अन्य दल में शामिल हो जाए तो उसे दल-बदल कानून से स्वतः राहत नहीं मिल जाती। दूसरी ओर बाग़ी खेमा अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी कर चुका है। उनका दावा है कि पार्टी की मूल विचारधारा और जनाधार अब उनके साथ है। ऐसे में कानूनी लड़ाई का केंद्र यह होगा कि वास्तविक राजनीतिक उत्तराधिकार किसके पास है।

दिल्ली में सांसदों की बगावत और कोलकाता में विधायकों की नाराज़गी मिलकर टीएमसी नेतृत्व के लिए दोहरी चुनौती बन गई है। विधानसभा में भी बड़ी संख्या में विधायक अलग राजनीतिक पहचान की राह पर आगे बढ़ चुके हैं। यानी लड़ाई सिर्फ संसद की सीटों या विधानसभा की संख्या तक सीमित नहीं रही। अब सवाल यह है कि बंगाल की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी का वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में रहेगा।

कभी ‘खेला होबे’ टीएमसी का सबसे बड़ा चुनावी नारा था। लेकिन अब यही नारा बाग़ी खेमे के लिए सत्ता और संगठन पर कब्ज़े की लड़ाई का प्रतीक बनता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले सप्ताहों में यह संघर्ष और तेज़ होगा। चुनाव आयोग, अदालतें, संसद और विधानसभा चारों मोर्चों पर लड़ाई एक साथ चल सकती है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि अगर बाग़ी गुट चुनाव चिह्न और पार्टी के नाम पर दावा पेश करता है तो क्या टीएमसी वैसी ही स्थिति में पहुंच सकती है जैसी कभी कई अन्य क्षेत्रीय दलों के विभाजन के समय देखी गई थी? फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में शुरू हुआ यह ‘खेला’ अब केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि सत्ता, संगठन और राजनीतिक विरासत की निर्णायक जंग बन चुका है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)