Last Updated on June 14, 2026 10:19 pm by INDIAN AWAAZ

– शोभा शुक्ला (CNS)
एक सड़क दुर्घटना ने न केवल एक परिवार की दुनिया बदल दी, बल्कि भारत में महिलाओं के अदृश्य श्रम को लेकर न्यायिक विमर्श की दिशा भी बदल दी।
25 नवंबर 2001 को पंजाब में एक सड़क दुर्घटना में तीन बच्चों की मां और गृहिणी रेशमा की मृत्यु हो गई। संयोग से यही दिन दुनिया भर में महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। लेकिन उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह मामला एक दिन देश में महिलाओं के घरेलू और देखभाल संबंधी श्रम के मूल्यांकन का ऐतिहासिक आधार बनेगा।
रेशमा के निधन के बाद उनके पति और बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) में मुआवजे की मांग की। दिसंबर 2003 में न्यायाधिकरण ने केवल 2.42 लाख रुपये का मुआवजा तय किया। परिवार को यह राशि अपर्याप्त लगी और उन्होंने 2004 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
करीब दो दशक बाद, दिसंबर 2024 में उच्च न्यायालय ने मुआवजा बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया। साथ ही भुगतान में देरी होने पर ब्याज दर बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए। लेकिन परिवार अब भी संतुष्ट नहीं था। उनका कहना था कि अदालतों ने रेशमा के घरेलू और देखभाल संबंधी योगदान के वास्तविक मूल्य को समझा ही नहीं।
आखिरकार मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
11 जून 2026 को आए ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने मुआवजा बढ़ाकर 62.77 लाख रुपये कर दिया। यह राशि बीमा कंपनी को भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
लेकिन यह फैसला सिर्फ मुआवजा बढ़ाने तक सीमित नहीं था। इसने एक लंबे समय से अनदेखे सत्य को कानूनी मान्यता दी।
घरेलू और देखभाल संबंधी श्रम भी आर्थिक मूल्य रखता है
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि बिना वेतन के किया जाने वाला घरेलू और देखभाल का काम भी एक स्वतंत्र आर्थिक योगदान है और इसकी गणना मुआवजे में की जानी चाहिए।
अदालत ने कहा कि किसी गृहिणी के घरेलू श्रम का न्यूनतम मूल्यांकन 30,000 रुपये प्रति माह के आधार पर किया जाना चाहिए। यदि महिला घर के बाहर भी काम करती हो, तो घरेलू श्रम का मूल्य उसकी आय के अतिरिक्त जोड़ा जाएगा।
यह फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी परिवर्तनकारी है।
36 पृष्ठों के अपने निर्णय में न्यायमूर्ति करोल और न्यायमूर्ति सिंह की पीठ ने कहा कि गृहिणियां वास्तव में “राष्ट्र निर्माता” हैं और उन्हें उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की—
“यह विडंबना है कि गृहिणी को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि वास्तविकता में पूरे परिवार का संचालन उसी पर निर्भर होता है।”
यह टिप्पणी केवल न्यायिक टिप्पणी नहीं बल्कि उस सामाजिक सोच को चुनौती है, जिसने महिलाओं के श्रम को सदियों तक ‘कर्तव्य’ मानकर उसका मूल्यांकन करने से इंकार किया।
न्याय मिलने में 24 वर्ष – क्या यह भी अन्याय नहीं?
इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू न्याय में हुई असाधारण देरी पर अदालत की चिंता थी।
रेशमा के परिवार को अंतिम निर्णय पाने में 24 वर्ष लग गए।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अध्ययन में पाया कि मोटर दुर्घटना मामलों में औसतन छह वर्ष न्यायाधिकरण स्तर पर और लगभग आठ वर्ष उच्च न्यायालयों में लंबित रहते हैं।
अदालत ने कहा—
“किसी प्रियजन की क्षति की भरपाई पूरी तरह संभव नहीं, लेकिन न्यायसंगत मुआवजा पीड़ित परिवार को कुछ राहत दे सकता है। जब इस प्रक्रिया में दशकों लग जाएं तो पीड़ा और गहरी हो जाती है।”
यह टिप्पणी भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा करती है—क्या विलंबित न्याय वास्तव में न्याय कहलाता है?
क्या महिला की कीमत उसके जाने के बाद तय होगी?
रेशमा के मामले में अदालत ने उनके अदृश्य श्रम को स्वीकार किया, लेकिन एक असहज प्रश्न आज भी हमारे सामने है—
क्या एक महिला की कीमत जानने के लिए उसकी मृत्यु जरूरी है?
महिलाओं का घरेलू श्रम, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, परिवार का भावनात्मक संतुलन—ये सभी कार्य आर्थिक व्यवस्था को चलाने में मौन लेकिन निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी इन्हें अक्सर “काम” नहीं माना जाता।
यह असमानता प्राकृतिक नहीं है। यह उस सामाजिक संरचना का परिणाम है जिसने पुरुष अधिकारों को सामान्य और महिलाओं के श्रम को अदृश्य बना दिया।
बचपन से महिलाओं को समझौता करना, कम अपेक्षा रखना और अपनी मेहनत को ‘कर्तव्य’ मानना सिखाया जाता है। लेकिन बदलाव तब शुरू होता है जब इन मान्यताओं पर सवाल उठते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में वह पहला महत्वपूर्ण सवाल उठाया है।
लेकिन वास्तविक बदलाव तब होगा जब महिलाओं को सम्मान, पहचान और श्रम का मूल्य उनके जीवनकाल में मिले—न कि उनके जाने के बाद।
हिंदी की एक कहावत है—
“जिए पर न दें कौरा, मरे पर झले चौरा।”
महिलाओं और लड़कियों को उनके जीवन भर किए गए अथक श्रम का सम्मान जीवित रहते मिलना चाहिए। यही सच्चा न्याय होगा। और शायद रेशमा का मामला इसी बदलाव की शुरुआत है।
