Last Updated on June 15, 2026 11:38 am by INDIAN AWAAZ

असद मिर्ज़ा
जून 2026 में घोषित अमेरिका–ईरान रूपरेखा समझौता मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। यह समझौता लगभग 100 दिनों तक चले विनाशकारी संघर्ष के बाद सामने आया है और इसका प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा तथा रणनीतिक हितों पर भी पड़ सकता है।
मध्य जून 2026 में व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) की घोषणा की गई, जिस पर शुक्रवार को स्विट्ज़रलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर प्रस्तावित हैं। यह समझौता हाल के वर्षों के सबसे अस्थिर कूटनीतिक दौर का परिणाम माना जा रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी और इज़राइली संयुक्त हमलों से शुरू हुए इस युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कभी सैन्य दबाव तो कभी समझौते की कोशिशों के बीच अपनी नीति बदलते हुए दिखाई।
ट्रंप की ईरान नीति में बदलाव
कई महीनों तक ट्रंप प्रशासन ने “मैक्सिमम प्रेशर 2.0” रणनीति अपनाई। इसके तहत ईरानी बंदरगाहों पर कठोर नौसैनिक नाकेबंदी लागू की गई और ईरानी सैन्य रडार तथा ड्रोन ठिकानों पर मिसाइल हमले किए गए। ट्रंप ने स्पष्ट कहा था कि जब तक पूर्ण और सत्यापित परमाणु एवं बैलिस्टिक समझौता नहीं हो जाता, तब तक ईरान की जमी हुई संपत्तियों का एक डॉलर भी जारी नहीं किया जाएगा।
लेकिन जैसे-जैसे युद्ध का आर्थिक प्रभाव बढ़ा, वैश्विक ऊर्जा संकट गहराया और कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले से गंभीर क्षति हुई, ट्रंप के रुख में बदलाव आया। जून के मध्य तक उन्होंने अपने पूर्व रुख से हटते हुए ईरान की 25 अरब डॉलर की जमी हुई संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी करने की अनुमति दे दी। इसमें तकनीकी वार्ता शुरू होने से पहले 12 अरब डॉलर की अग्रिम राशि और ईरानी तेल बिक्री पर अस्थायी राहत भी शामिल थी।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर समझौते को “पूर्ण” बताते हुए दुनिया से “इंजन चालू करने और तेल बहने देने” का आह्वान किया, जो उनके पहले के सख्त बयानों से अलग था।
स्विट्ज़रलैंड समझौते की रूपरेखा
तेहरान में 17 घंटे चली वार्ताओं के दौरान मुख्य रूप से पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में यह प्रारंभिक समझौता तैयार हुआ। इसमें 60 दिनों का क्रियान्वयन ढांचा निर्धारित किया गया है।
- पहला, ईरान 30 दिनों के भीतर समुद्री क्षेत्रों में बिछाई गई बारूदी बाधाओं को हटाएगा और 60 दिनों तक किसी प्रकार का ट्रांजिट शुल्क नहीं लिया जाएगा।
- दूसरा, अमेरिका अपनी पूर्ण नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा और ईरान क्षेत्रीय सहयोगी समूहों की गतिविधियों को रोकेगा।
- तीसरा, तेहरान वर्तमान स्तर से आगे यूरेनियम संवर्धन नहीं करेगा तथा उच्च संवर्धित भंडार को कम करने की प्रक्रिया अपनाएगा।
- चौथा, अमेरिका विदेशों में जमा 25 अरब डॉलर प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण और क्रेडिट व्यवस्था के माध्यम से जारी करेगा तथा नए प्रतिबंधों पर रोक लगाएगा।
क्षेत्रीय प्रभाव: व्हाइट हाउस और यरूशलम के बीच मतभेद
हालाँकि समझौते से तत्काल युद्धविराम संभव हुआ है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता पर सवाल बने हुए हैं। अमेरिका और इज़राइल के बीच सार्वजनिक मतभेद उभरकर सामने आए हैं। मुख्य विवाद क्षेत्रीय नियंत्रण के दायरे को लेकर है।
समझौते के मसौदे में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी नेटवर्क को शामिल नहीं किया गया है। इसका ध्यान केवल परमाणु सीमाओं और समुद्री आवागमन की स्वतंत्रता पर केंद्रित है।
इससे इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने असहमति जताई। ट्रंप की संयम बरतने की चेतावनी के बावजूद, इज़राइली वायुसेना ने 14 जून को उत्तरी इज़राइल पर रॉकेट हमलों के बाद बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हिज़्बुल्लाह ठिकानों पर जवाबी हवाई कार्रवाई की।
इन घटनाओं ने कूटनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का खतरा पैदा कर दिया। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू को “बहुत कठिन व्यक्ति” बताया और क्षेत्रीय तनाव तुरंत रोकने की अपील की। दूसरी ओर, ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़िर क़ालिबाफ़ ने कहा कि कूटनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका इज़राइल को कितना नियंत्रित कर पाता है।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व
फ़ारस की खाड़ी और व्यापक मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थिरता भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल भारत पर होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बाधित होने का गंभीर प्रभाव पड़ा, क्योंकि वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी मार्ग से गुजरता है।
आर्थिक स्थिरता:
खाड़ी क्षेत्र में समुद्री यातायात सामान्य होने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा, घरेलू महँगाई पर नियंत्रण मिलेगा और राजकोषीय दबाव घट सकता है।
चाबहार बंदरगाह परियोजना को गति:
अमेरिका–ईरान तनाव कम होने से ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित चाबहार बंदरगाह परियोजना को नई ऊर्जा मिल सकती है। नौसैनिक प्रतिबंधों में राहत और नए प्रतिबंधों पर रोक से भारत बुनियादी ढाँचा विकास तेज कर सकता है और मध्य एशिया व अफ़ग़ानिस्तान तक अपनी पहुँच मजबूत कर सकता है।
कूटनीतिक संतुलन की चुनौती:
भारत के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती बनी रहेगी। एक ओर वह अमेरिका समर्थित स्थिरता का स्वागत करता है और ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध रखता है, वहीं दूसरी ओर इज़राइल के साथ तकनीकी और रक्षा सहयोग भी बढ़ा रहा है।
अनिश्चित भविष्य
स्विट्ज़रलैंड समझौते ने यह संकेत दिया है कि मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था अब किसी एक महाशक्ति के नियंत्रण में नहीं रही। इज़राइल द्वारा अमेरिकी चेतावनियों के बावजूद स्वतंत्र सैन्य कार्रवाई और ईरान द्वारा समुद्री दबाव के माध्यम से आर्थिक रियायतें हासिल करने की क्षमता ने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल दिया है।
जुलाई में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला ख़ामेनेई के प्रस्तावित अंतिम संस्कार कार्यक्रमों के बीच 60 दिन की तकनीकी वार्ताएँ शुरू होने जा रही हैं और पूरा क्षेत्र अभी भी संवेदनशील स्थिति में बना हुआ है।
राष्ट्रपति ट्रंप की कल्पना वाली “सुंदर शांति” इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या व्हाइट हाउस अपने सबसे करीबी सहयोगी पर समझौते के पालन का दबाव बना पाता है या फिर असममित संघर्षों की अधूरी चुनौतियाँ क्षेत्र को फिर व्यापक युद्ध की ओर धकेल देती हैं।
इसके अलावा, परमाणु निरीक्षण, इज़राइल की भूमिका और आर्थिक शर्तों जैसे कई मूल मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। इसलिए इस समझौते का भविष्य इस सप्ताह प्रस्तावित औपचारिक हस्ताक्षर और अंतिम समझौते की जटिल वार्ताओं पर निर्भर करेगा।
Asad Mirza is senior journalist and coulmnist
