
अंदलीब अख्तर
दुनिया की अर्थव्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ विकासशील देशों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल विकास की गति बनाए रखना नहीं, बल्कि उस विकास की लागत को वहन करना भी बन गया है। सड़कें, ऊर्जा परियोजनाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक विस्तार और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधन सीमित और महंगे होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ने इस चुनौती को नए दृष्टिकोण से सामने रखा है।
संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूएनसीटैड) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में विकासशील देशों को विदेशों से लगभग 1.5 ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय संसाधन प्राप्त हुए। इनमें लगभग आधी राशि इक्विटी निवेश के रूप में और बाकी ऋण के रूप में आई। पहली नजर में यह राशि बड़ी दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को हासिल करने के लिए इन देशों को हर वर्ष अतिरिक्त 4.3 ट्रिलियन डॉलर की आवश्यकता है।
रिपोर्ट बताती है कि विकासशील देशों के पास घरेलू स्तर पर उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का आकार लगभग 11.9 ट्रिलियन डॉलर है, लेकिन बाहरी पूंजी अब भी उनकी वित्तीय व्यवस्था, निवेश लागत और आर्थिक प्राथमिकताओं पर असमान रूप से प्रभाव डालती है। इसका अर्थ यह है कि घरेलू अर्थव्यवस्थाएँ मजबूत होने के बावजूद वैश्विक पूंजी प्रवाह का प्रभाव कम नहीं हुआ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस वित्तीय अंतर को कम करने के लिए हर वर्ष लगभग 230 अरब डॉलर अतिरिक्त ऋण और उतनी ही अतिरिक्त इक्विटी निवेश की आवश्यकता होगी। लेकिन समस्या केवल पूंजी जुटाने की नहीं है, बल्कि उसकी लागत और उसकी शर्तों की भी है।

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि पिछले दशक में विकासशील देशों में विदेशी वित्तीय संसाधनों का योगदान घटा है। वर्ष 2014 में पूंजी निर्माण में बाहरी संसाधनों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत थी, जो 2024 तक घटकर केवल 11 प्रतिशत रह गई। यह गिरावट दर्शाती है कि विकासशील देश अधिक घरेलू संसाधनों पर निर्भर बनने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह परिवर्तन आसान नहीं है।
वित्तीय संसाधनों का वितरण भी असमान बना हुआ है। 2014 से 2024 के बीच एशिया और प्रशांत क्षेत्र को कुल बाहरी वित्त का 70 प्रतिशत से अधिक मिला, जबकि अफ्रीका को केवल 10 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ। इससे क्षेत्रीय विकास असंतुलन और गहरा हो सकता है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा अंततः निवेशकों के पास वापस चला जाता है। वर्ष 2024 में लगभग 1.07 ट्रिलियन डॉलर लाभांश, रॉयल्टी और ब्याज भुगतान के रूप में विदेशी निवेशकों को लौटाया गया। यह उसी वर्ष प्राप्त नई पूंजी का लगभग 72 प्रतिशत था। यानी विकासशील देशों में आने वाला वित्त हमेशा स्थानीय विकास में स्थायी रूप से परिवर्तित नहीं हो पाता।
सबसे अधिक चिंता ऋण की बढ़ती लागत को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों से पूंजी जुटाने के लिए आज भी अधिक जोखिम प्रीमियम चुकाना पड़ता है। 2014 से 2024 के बीच इन देशों में ब्याज भुगतान 102 प्रतिशत बढ़ गया, जबकि सरकारी राजस्व केवल 39 प्रतिशत बढ़ा।
इसका सीधा असर सरकारी खर्च की क्षमता पर पड़ा है। 2018 से 2024 के बीच 99 विकासशील देशों को बढ़ती ब्याज लागत के कारण वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ा। इन देशों की कुल आबादी लगभग 5.5 अरब है। इसका असर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों पर पड़ रहा है।
आख़िर ऋण महंगा क्यों हो रहा है? रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि से वैश्विक निवेश सुरक्षित बाजारों की ओर बढ़ता है और विकासशील देशों के लिए पूंजी जुटाना महंगा हो जाता है।
इसके अलावा, वैश्विक निवेशकों का जोखिम को लेकर बदलता दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आर्थिक अनिश्चितता या भू-राजनीतिक तनाव के समय निवेशक विकासशील देशों से निवेश कम कर देते हैं।
मुद्रा विनिमय दर भी एक बड़ा कारक है। चूँकि बाहरी ऋण का बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा में होता है, इसलिए डॉलर मजबूत होने पर स्थानीय मुद्रा में ऋण चुकाने का बोझ बढ़ जाता है।
रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन को भी ऋण लागत बढ़ाने वाला नया कारक बताया गया है। प्राकृतिक आपदाओं की आशंका वाले देशों के लिए अब उधार लेना और अधिक महंगा हो रहा है क्योंकि निवेशक जोखिम का मूल्यांकन नए तरीके से कर रहे हैं।
भारत के लिए क्या मायने हैं?
भारत जैसे बड़े विकासशील देश के लिए यह पूरी बहस बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले वर्षों में भारत ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, डिजिटल वित्तीय ढाँचे, विनिर्माण विस्तार और घरेलू पूंजी बाजारों को मजबूत करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि, डॉलर की मजबूती और निवेश प्रवाह में बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत ने बुनियादी ढाँचा, हरित ऊर्जा, विनिर्माण, शहरीकरण और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में बड़े निवेश लक्ष्य निर्धारित किए हैं। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सस्ती और दीर्घकालिक पूंजी तक पहुँच आवश्यक होगी। इसी कारण भारत एक ओर घरेलू वित्तीय संसाधनों और बॉन्ड बाजार को मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक मंचों पर विकासशील देशों के लिए अधिक न्यायसंगत वित्तीय व्यवस्था और कम लागत वाले विकास वित्त की मांग भी कर रहा है।
रिपोर्ट में एक काल्पनिक परिदृश्य भी प्रस्तुत किया गया है। इसके अनुसार यदि विकासशील देश विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समान ब्याज दरों पर ऋण प्राप्त कर सकें तो वे हर वर्ष लगभग 500 अरब डॉलर की बचत कर सकते हैं। इस राशि से लाखों स्कूल बनाए जा सकते हैं, स्वास्थ्य केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, करोड़ों बच्चों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराया जा सकता है और बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाएँ शुरू की जा सकती हैं।
अंततः सवाल केवल पूंजी जुटाने का नहीं है, बल्कि ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाने का है जो विकासशील देशों को विकास और कर्ज के बीच कठिन चुनाव करने के लिए मजबूर न करे। यदि पूंजी की लागत कम नहीं हुई और वित्तीय ढाँचे अधिक संतुलित नहीं बने, तो सतत विकास के लक्ष्य केवल घोषणाओं तक सीमित रह सकते हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि विकासशील दुनिया विकास की राह पर आगे बढ़ती है या बढ़ते कर्ज के बोझ तले धीमी पड़ जाती है।
