
AMN / BIZ DESK
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने वित्तीय क्षेत्र में बाजार दक्षता (Market Efficiency) को बढ़ाने, अनुपालन (Compliance) आवश्यकताओं को सरल बनाने और नियामक ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से कई सुधारों को मंजूरी दी है। कल मुंबई में आयोजित 214वीं बैठक में, सेबी बोर्ड ने मृतक निवेशकों के नाम पर मौजूद प्रतिभूतियों (Securities) को उनके कानूनी वारिसों और दावेदारों को स्थानांतरित (Transmission) करने की प्रक्रिया को बेहद सरल बना दिया।
यह निर्णय छोटे मूल्य के दावों के लिए एक नई ‘क्विक ट्रांसमिशन प्रोसेसिंग’ (QTP) श्रेणी शुरू करने के लिए लिया गया है, ताकि कम दस्तावेजों के साथ तेजी से प्रसंस्करण सुनिश्चित किया जा सके। नियामक ने सरलीकृत दस्तावेज़ीकरण सीमाओं को भी बढ़ाया है, कुछ मामलों में अनिवार्य पैन (PAN) जमा करने की आवश्यकता को हटा दिया है, और सत्यापन को आसान बनाने के लिए क्यूआर (QR) कोड-सक्षम मृत्यु प्रमाणपत्रों को स्वीकार किया है।
सेबी ने इस वर्ष 1 अगस्त से स्टॉक एक्सचेंजों के माध्यम से ओपन-मार्केट शेयर बायबैक (Shares Buyback) को फिर से शुरू करने को भी मंजूरी दी है, जो संशोधित समयसीमा और सख्त अनुपालन मानदंडों के साथ लागू होगा।
बोर्ड ने म्यूचुअल फंडों को अस्थायी तरलता (Liquidity) की कमी से निपटने के लिए इंट्राडे उधार (Intraday Borrowings) लेने की भी अनुमति दी है। अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) को ‘गरुड़’ (GARUDA) ढांचे के तहत तेजी से मंजूरी प्रक्रिया का लाभ मिलेगा, जिससे फंड लॉन्च करने की समयसीमा घटकर दस कार्य दिवस (Working Days) रह जाएगी।
इसके अतिरिक्त, सेबी ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ढांचे के अनुरूप सिक्योरिटाइज्ड डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Securitised Debt Instruments) के सुधारों और पुनर्वित्त (Refinancing) व पूल्ड फाइनेंसिंग विकल्पों के माध्यम से म्यूनिसिपल बॉन्ड मार्केट को मजबूत करने के उपायों को मंजूरी दी है।
नियामक ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए SME (लघु और मध्यम उद्यम) पूंजी जुटाने के ढांचे (Capital-Raising Framework) की समीक्षा को भी मंजूरी दे दी है। साथ ही, हितों के टकराव (Conflict-of-Interest) और प्रकटीकरण (Disclosure) मानदंडों को कड़ा करने के लिए अपने सदस्यों और कर्मचारियों के लिए एक नई आचार संहिता (Code of Conduct) को अपनाया है।
सेबी ने कहा कि इन सुधारों का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, निवेशकों की सुविधा में सुधार करना और भारत के पूंजी बाजार पारिस्थितिकी तंत्र (Capital Markets Ecosystem) को और मजबूत करना है।
