Last Updated on September 16, 2026 5:23 pm by INDIAN AWAAZ

प्रदीप शर्मा 

नेपाल की प्रलयंकारी बाढ़ ने हिमालयी सीमा में बसे देशों की सरकारों को ग्लोबल वार्मिंग से निरंतर बनती हिमनद झीलों के भयावह खतरों के प्रति सचेत किया है। यह संकट एक देश की सीमाओं से परे पूरे हिमालयी क्षेत्रों में व्याप्त है। ऐसे में निगरानी तंत्र को मजबूत करने और इसके दायरे में आने वाले देशों, राज्यों और शहरों को समय रहते सूचना देने के लिए एक प्रभावी सिस्टम विकसित करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। साल 2013 में केदारनाथ त्रासदी से उपजी तबाही की तस्वीरें आज भी भारतीय जनमानस की स्म़ृतियों में ताजा हैं। पूर्वी हिमालय स्थित सिक्किम में भी चालीस हिमनद झीलों का पता चला है। चिंता की बात यह है कि इसमें से सोलह को अधिक जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इसी तरह हिमाचल प्रदेश में आईआईटी मंडी के एक अध्ययन में लगातार विस्तार ले रही नौ ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई थी। 

कमोबेश उत्तराखंड में भी ऐसी ही स्थिति बनी हुई है जो जलवायु परिवर्तन के चलते तेजी से पिघलते ग्लेशियरों से उपजे संकट की ओर ध्यान खींचती हैं। आईआईटी के अध्ययन के जरिये तीन हजार पांच सौ मीटर से ज्यादा ऊंचाइयों पर दो हजार से अधिक झीलों का पता चला है। बताया जाता है कि ये झीलें तेजी से बन रही हैं और इनकी संख्या एक दशक पहले की तुलना में 710 अधिक हो गई है। इनका क्षेत्रफल भी लगातार बढ़ रहा है। यह वृद्धि 28 फीसदी बढ़ी बतायी जाती है, जिसके चलते कई रिहायशी इलाकों, शिक्षण संस्थाओं, स्वास्थ्य सुविधाओं और अनेक पुलों पर खतरा मंडरा रहा है। ग्लेशियर टूटने और चट्टानें खिसकने से ये झीलें कितना भयावह रूप ले सकती हैं, उसकी बानगी 26 अगस्त को नेपाल में हुई तबाही में नजर आई है। वहां आज भी हजारों लोग लापता हैं। चट्टानों, पानी, कीचड़ आदि का जो सैलाब घाटियों से गुजरा है, उसने बस्तियों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। पनबिजली परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे लोगों की अभी भी तलाश जारी है।

नेपाल हादसे ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है और बताया है कि ऊंचाई वाली जगहों में झील में बर्फ-चट्टानों के गिरने के बाद इन झीलों को रोकने वाले अवरोध टूटते हैं, जिससे नीचे वाले इलाकों में बेहद तीव्र गति से तबाही आ सकती है। दरअसल, लगातार गर्म होते हिमालय में ग्लेशियरों का पीछे हटना, झीलों का बढ़ना, भूस्खलन और अतिवृष्टि की घटनाएं आपस में मिलकर भयावह स्थिति पैदा करती हैं, जिसका मुकाबला सामान्य आपदा प्रबंधन के उपायों से नहीं किया जा सकता। निस्संदेह, लाखों लोगों का जीवन सुरक्षित करने के लिए ग्लेशियर झीलों के फटने का इंतजार नहीं किया जा सकता। जमीनी स्तर पर निगरानी के साथ ही उपग्रहों के जरिये भी इन झीलों पर नजर रखने की सख्त जरूरत है। रियल-टाइम अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को मजबूत करने की आवश्यकता है। इसके अलावा निकासी रास्तों को चिन्हित करने की जरूरत भी है। नीचे नदियों के किनारे बसी बस्तियों व मैदानी इलाकों में बचाव के तौर-तरीकों का नियमित अभ्यास किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पुलों, पनबिजली परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचों की जांच करके उन्हें अधिक सुरक्षित बनाने की भी जरूरत है। साथ ही इन से जुड़े संभावित खतरों का समय रहते मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 

हिमालयी क्षेत्रों में विकास के नये मॉडल पर भी विचार करने की जरूरत है, जो हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता के अनुरूप हो। इसके लिये जरूरी है कि हिमालयी क्षेत्रों में ऊंचाई वाले संवेदनशील इलाकों में पर्यटन, सड़क और निर्माण कार्यों में पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। निस्संदेह, जोखिम वाली घाटियों में जितना कम इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाएगा, किसी प्राकृतिक आपदा में जनधन की हानि उतनी ही कम होगी। अब जबकि वैज्ञानिकों व शोधकर्ताओं ने बचाव के विकल्पों की रूपरेखा सौंप दी है, नीति-नियंताओं को प्राथमिकता के आधार पर इनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा। ध्यान रहे कि यह आसन्न खतरा किसी देश विशेष की सीमा तक सीमित नहीं है। अतः सटीक समयपूर्व चेतावनी देने के लिए विभिन्न देशों के साझे प्रयास जन-धन की हानि टालने वाले साबित हो सकते हैं। इसके लिये मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति अपरिहार्य शर्त है।