Last Updated on March 6, 2026 2:36 pm by INDIAN AWAAZ

किसान संगठन का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत के गांवों तक पहुंच चुका है और सरकार को किसानों, मजदूरों और निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए।

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Staff Reporter / New Delhi

किसान संगठन All India Kisan Sabha (एआईकेएस) ने पश्चिम एशिया में चल रहे US–Israel war on Iran के कारण भारतीय कृषि और निर्यात पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर केंद्र सरकार की कड़ी आलोचना की है। संगठन ने कहा कि इस युद्ध के कारण लाखों किसानों, कृषि मजदूरों और निर्यातकों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है और सरकार को तुरंत व्यापक राहत पैकेज की घोषणा करनी चाहिए।

नई दिल्ली में जारी एक बयान में एआईकेएस ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है, जिससे भारत के कृषि निर्यात और उत्पादन लागत दोनों प्रभावित हो रहे हैं। संगठन के अनुसार सरकार की प्रतिक्रिया केवल स्थिति पर “नजर रखने” तक सीमित है, जो किसानों के साथ अन्याय है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

एआईकेएस के मुताबिक युद्ध के चलते वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और Brent crude की कीमतें पिछले सप्ताह में बढ़कर लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, बल्कि कृषि क्षेत्र की लागत भी बढ़ जाती है।

संगठन ने यह भी बताया कि आर्थिक दबाव के बीच भारतीय मुद्रा में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। Reserve Bank of India के हस्तक्षेप के बाद 5 मार्च को रुपया लगभग 91.82 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर स्थिर रह सका।

उर्वरक उत्पादन पर पड़ सकता है असर

किसान संगठन ने चेतावनी दी कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर उर्वरक उत्पादन पर पड़ेगा। उर्वरक निर्माण में पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल का उपयोग होता है, इसलिए तेल महंगा होने से उर्वरकों की कीमत बढ़ सकती है।

यदि सरकार उर्वरक सब्सिडी में बढ़ोतरी नहीं करती है तो आने वाले कृषि सीजन में किसानों की उत्पादन लागत और बढ़ सकती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से निर्यात प्रभावित

एआईकेएस के अनुसार युद्ध के कारण Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह मार्ग भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के पश्चिम एशिया को होने वाले निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

संगठन का कहना है कि भारत के लगभग 56 प्रतिशत व्यापारिक निर्यात इस समुद्री मार्ग से होकर जाते हैं। युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही बाधित होने से कृषि उत्पादों का निर्यात रुक गया है और लाखों टन माल बंदरगाहों या समुद्र में फंसा हुआ है।

कृषि निर्यात पर भारी असर

एआईकेएस ने विभिन्न राज्यों के किसानों और निर्यातकों से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर संकट की गंभीरता को रेखांकित किया है।

बासमती चावल:
करीब 4 लाख टन बासमती चावल (लगभग 3,200 करोड़ रुपये मूल्य) निर्यात के रास्ते में फंसा हुआ है। इनमें से लगभग 2 लाख टन बंदरगाहों पर और 2 लाख टन समुद्र में है। चार दिनों में ही किसानों को मिलने वाली कीमतों में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिससे 25 से 30 लाख किसान परिवार प्रभावित हो सकते हैं।

केला:
महाराष्ट्र के सोलापुर से भेजे जाने वाले 1,200 कंटेनर केले कोल्ड स्टोरेज में फंसे हुए हैं। निर्यात रुकने के कारण किसानों को प्रतिदिन प्रति कंटेनर लगभग 8,500 रुपये का डेमरेज शुल्क देना पड़ रहा है।

अंगूर:
करीब 6,000 टन अंगूर के खराब होने का खतरा है। लगभग 300 कंटेनर, जो निर्यात के लिए तैयार थे, अब घरेलू बाजार में कम कीमत पर बेचने पड़ सकते हैं।

प्याज:
नासिक के लगभग 5,400 टन प्याज मुंबई के पास स्थित Jawaharlal Nehru Port Trust बंदरगाह पर पड़े हैं। दुबई सहित खाड़ी बाजारों में निर्यात रुकने से किसानों को भारी नुकसान का खतरा है।

पोल्ट्री क्षेत्र:
खाड़ी देशों के लिए भेजे जाने वाले लगभग 80 लाख अंडे प्रतिदिन निर्यात नहीं हो पा रहे हैं, जिससे घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ गई है और कीमतें गिर रही हैं।

रोजगार पर असर:
संगठन का अनुमान है कि केवल बासमती उत्पादक क्षेत्रों में ही 1.6 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार खतरे में पड़ सकता है, जिससे बड़ी संख्या में भूमिहीन मजदूर प्रभावित होंगे।

एआईकेएस की प्रमुख मांगें

इस संकट को देखते हुए एआईकेएस ने सरकार से तत्काल राहत पैकेज की घोषणा करने की मांग की है।

मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:

  1. प्रभावित किसानों को 50,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की आपात वित्तीय सहायता दी जाए।
  2. NAFED और Food Corporation of India जैसी सरकारी एजेंसियां फंसे हुए कृषि उत्पादों की खरीद करें।
  3. फंसे हुए प्याज और अन्य उत्पादों के लिए 2,500 रुपये प्रति क्विंटल की विशेष सब्सिडी दी जाए।
  4. युद्ध के कारण लगे सभी डेमरेज, वेयरहाउस और पोर्ट शुल्क को पूरी तरह माफ किया जाए।
  5. प्रभावित किसानों के कृषि ऋण और ब्याज पर अस्थायी रोक लगाई जाए।
  6. कृषि मजदूरों और बंदरगाह पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए 10,000 रुपये प्रति माह की सहायता देने हेतु विशेष कोष बनाया जाए।

भविष्य में आंदोलन की चेतावनी

एआईकेएस ने कहा कि यदि सरकार जल्द ठोस कदम नहीं उठाती है तो देश भर के किसान बड़े पैमाने पर आंदोलन कर सकते हैं। संगठन ने चेतावनी दी कि मौजूदा हालात ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकट बन सकते हैं और यह स्थिति 2020–2021 Indian farmers’ protest जैसे बड़े आंदोलन को जन्म दे सकती है।

किसान संगठन का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब भारत के गांवों तक पहुंच चुका है और सरकार को किसानों, मजदूरों और निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए तुरंत कदम उठाने चाहिए।