Last Updated on September 24, 2026 3:20 am by INDIAN AWAAZ
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों की रिपोर्ट पर विपक्ष ने उठाए सवाल, भाजपा ने कहा- असहमति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा

Staff Reporter नई दिल्ली
चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और निर्देशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। दोनों ने कुछ मामलों में ऐसे फैसलों पर भी सवाल उठाए, जिन्हें उन्होंने अपनी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने की बात कही।
रिपोर्ट में मतदाता सूची तैयार करने, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटा तक पहुंच तथा आयोग की आईटी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण और जमीनी स्तर के निर्वाचन अधिकारियों की पहुंच सीमित होने को लेकर भी चिंता जताई।
रिपोर्ट में क्या सामने आया
Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार, SIR के दौरान नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में एक नया सवाल जोड़ा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने पहले ही इस बदलाव पर नियमों में संशोधन की जरूरत जताई थी, जबकि सुखबीर सिंह संधू ने बाद में इसे “अनधिकृत और अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की।
रिपोर्ट में चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि क्या निर्वाचन क्षेत्रों के स्तर पर मतदाता सूची संभालने वाले अधिकारियों की पहुंच केंद्रीय आईटी व्यवस्था के कारण सीमित हो रही है।
रिपोर्ट में गोवा का उदाहरण भी दिया गया है, जहां 97 मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित अपीलों की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में अपनी आपत्तियां लिखित रूप में दर्ज कीं और इनमें से कई संचार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजे गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, मई से अगस्त के बीच आयोग की तीनों सदस्यों वाली पूर्ण बैठक भी नहीं हुई और 9 सितंबर को चार महीने बाद पूर्ण बैठक हुई।
विपक्ष ने सरकार और CEC को घेरा
रिपोर्ट सामने आने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे अपने पुराने “वोट चोरी” आरोपों से जोड़ते हुए चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि रिपोर्ट से चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते हैं। उन्होंने इस मुद्दे को उत्तर प्रदेश में अपने पुराने चुनाव संबंधी आरोपों से भी जोड़ा।
DMK प्रमुख एम. के. स्टालिन ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए SIR को तत्काल रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की जांच कराने की मांग की।
विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी आयोग में कथित मतभेदों को गंभीर बताते हुए चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग की। कई नेताओं ने इस पूरे मामले में संसदीय अथवा स्वतंत्र जांच की मांग भी उठाई।
भाजपा का पलटवार
भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आयोग के भीतर अलग-अलग मत होना अपने आप में किसी संस्थागत संकट का प्रमाण नहीं है।
भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति और विचार-विमर्श लोकतांत्रिक संस्थान के कामकाज का हिस्सा है। उन्होंने जोर दिया कि अंतिम रूप से SIR सहित आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
चुनाव आयोग ने भी Indian Express की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 10 महीने के दौरान अलग-अलग मुद्दों पर टिप्पणियों और आपत्तियों को पूरी तस्वीर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आयोग के अनुसार, इस अवधि में लिए गए फैसले और चुनावी सुधार तीनों सदस्यों की सहमति से हुए।
अब बहस संस्थागत प्रक्रिया पर
रिपोर्ट ने इसलिए केवल SIR की प्रक्रिया को ही नहीं, बल्कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था को भी बहस के केंद्र में ला दिया है। Indian Express के अनुसार, आयोग के दो सदस्यों द्वारा बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज किया जाना मतदाता सूची, आईटी व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवालों को सामने लाता है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि आंतरिक विचार-विमर्श और मतभेद संस्थागत प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। यही अंतर अब राजनीतिक विवाद का मुख्य आधार बन गया है।
फिलहाल विवाद का केंद्र दो सवाल हैं—क्या दर्ज की गई आपत्तियों का चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर कोई व्यापक प्रभाव पड़ा और क्या मतदाता सूची तथा उसकी डिजिटल व्यवस्था से जुड़े मुद्दों की स्वतंत्र समीक्षा की जरूरत है।
