Last Updated on April 17, 2026 8:44 am by INDIAN AWAAZ

16 अप्रैल, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करने का निर्णय लिया है, जिसमें कहा गया है कि 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम के तहत उत्तराधिकार और वसीयत संबंधी प्रावधान महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका लखनऊ की वकील पौलोमी पाविनी शुक्ला और आयशा जावेद द्वारा, अपने संगठन ‘न्याया नारी फाउंडेशन’ की ओर से दायर की गई थी। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण और अधिवक्ता निहाल अहमद ने पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि शरीयत के तहत उत्तराधिकार और वसीयत के प्रावधान “आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ” नहीं हैं। इसके बाद पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए नोटिस जारी करने का निर्णय लिया।
भूषण ने कहा, “यह कहना कि महिलाओं को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा या उससे भी कम हिस्सा मिलेगा, स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। यह एक सिविल मामला है, न कि अनुच्छेद 25 के तहत कोई आवश्यक धार्मिक प्रथा।” उन्होंने यह भी बताया कि वसीयत के मामले में भी एक मुस्लिम अपनी संपत्ति के एक-तिहाई (1/3) से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता। इस प्रकार, मुस्लिम अपने स्वयं अर्जित संपत्ति के बारे में भी अपनी इच्छा के अनुसार पूरी तरह वसीयत नहीं कर सकते।
