Last Updated on February 13, 2026 11:16 pm by INDIAN AWAAZ

RAMZAN IFTAR MARKETING IN AURANGABAD MAHARSHTRA, PIC: MUNAWAR PATHAN

डॉ. शहला शेख और डॉ. संजय कालरा

पवित्र माह रमज़ान अगले सप्ताह से आरंभ होने वाला है। यह दुनिया भर के मुसलमानों के लिए इबादत, आत्मचिंतन और रोज़े का पावन समय होता है। रमज़ान से पहले शाबान का महीना आता है, जो तैयारी का समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने खानपान और दिनचर्या को व्यवस्थित करते हैं तथा आने वाले महीने के लिए योजना बनाते हैं। चिकित्सकों के लिए भी यह उपयुक्त समय है कि वे अपने मधुमेह रोगियों के उपचार की समीक्षा कर लें और रमज़ान के दौरान आवश्यक बदलाव की तैयारी करें। रमज़ान के बाद शव्वाल का महीना आता है, जिसकी शुरुआत ईद-उल-फितर से होती है और महीने भर के रोज़ों का समापन होता है।

मधुमेह (डायबिटीज) में न तो अत्यधिक उपवास उचित है और न ही अत्यधिक भोजन। यह एक संतुलन का विषय है, जिसे सावधानीपूर्वक निभाना आवश्यक है। यद्यपि धार्मिक दृष्टि से मधुमेह के रोगियों को रोज़े से छूट दी गई है, फिर भी अनेक रोगी रमज़ान में रोज़ा रखना पसंद करते हैं। विश्व स्तर पर करोड़ों मुसलमान मधुमेह से प्रभावित हैं और उनमें से बड़ी संख्या छूट होने के बावजूद रोज़े रखती है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह के कई रोगी रमज़ान के दौरान उपवास करते हैं।

चुनौतियाँ और जोखिम

रमज़ान के दौरान मधुमेह रोगियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रोज़े के कारण दैनिक दिनचर्या में अचानक परिवर्तन हो जाता है। दिन में दो ही बार भोजन की अनुमति होती है—एक सूर्योदय से पहले (सहरी) और दूसरा सूर्यास्त के बाद (इफ्तार)। इससे भोजन के समय रात में स्थानांतरित हो जाते हैं और रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

इफ्तार में प्रायः अधिक कार्बोहाइड्रेट, संतृप्त वसा और मीठे पेय पदार्थों का सेवन किया जाता है, जिससे रक्त शर्करा का स्तर बढ़ सकता है। वहीं दिनभर लंबे उपवास के कारण रक्त शर्करा का स्तर बहुत कम होने (हाइपोग्लाइसीमिया) का खतरा रहता है।

नींद के पैटर्न में बदलाव, शारीरिक गतिविधि में कमी और दवाओं के अनियमित सेवन की संभावना भी जोखिम बढ़ाती है। लगातार 14 से 18 घंटे तक उपवास रखने से हाइपोग्लाइसीमिया, हाइपरग्लाइसीमिया, कीटोएसिडोसिस, निर्जलीकरण तथा हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है, विशेषकर गर्म मौसम या शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्तियों में।

पूर्व तैयारी और संवाद

सुरक्षित और सार्थक उपवास के लिए पूर्व तैयारी अनिवार्य है। मरीज और चिकित्सक के बीच खुला और स्पष्ट संवाद आवश्यक है। यदि मरीज स्वयं चर्चा न करे तो चिकित्सक को चाहिए कि वे रमज़ान से एक से दो महीने पहले बातचीत प्रारंभ करें। उद्देश्य रोज़े से हतोत्साहित करना नहीं, बल्कि सुरक्षित ढंग से रोज़ा रखने के लिए मार्गदर्शन देना होना चाहिए।

चिकित्सकीय मूल्यांकन

रमज़ान से छह से आठ सप्ताह पहले रोगी का संपूर्ण चिकित्सकीय मूल्यांकन किया जाना चाहिए। इसमें मधुमेह का प्रकार, अवधि, वर्तमान नियंत्रण स्तर, पूर्व में हाइपोग्लाइसीमिया का इतिहास, स्वयं रक्त शर्करा जांच की आदत, वर्तमान दवाएँ, गर्भावस्था, गुर्दा या हृदय रोग, शारीरिक श्रम की मात्रा और पूर्व रमज़ान का अनुभव शामिल होना चाहिए।

पिछले वर्ष सफलतापूर्वक रोज़ा रखने का अर्थ यह नहीं कि इस वर्ष भी स्थिति समान रहेगी। जिन रोगियों की मधुमेह अनियंत्रित है या जिन्हें बार-बार रक्त शर्करा में उतार-चढ़ाव होता है, उन्हें रोज़ा न रखने की सलाह दी जानी चाहिए।

शिक्षा और जागरूकता

रमज़ान केंद्रित चिकित्सकीय शिक्षा का उद्देश्य रोगियों को जोखिमों से अवगत कराना और उनसे बचाव के उपाय सिखाना है। रोगी को हाइपोग्लाइसीमिया और हाइपरग्लाइसीमिया के लक्षणों की पहचान होनी चाहिए तथा रक्त शर्करा की नियमित जांच का महत्व समझना चाहिए। कुछ लोग यह मानते हैं कि उंगली से रक्त लेकर शर्करा जांचने से रोज़ा टूट जाता है, जबकि ऐसा नहीं है। ऐसी भ्रांतियों को दूर करना आवश्यक है।

आहार और व्यायाम

रोगियों को संतुलित भोजन लेने की सलाह दी जानी चाहिए। सहरी में जटिल कार्बोहाइड्रेट (धीरे ऊर्जा देने वाले) और इफ्तार में सीमित मात्रा में सरल कार्बोहाइड्रेट लेना उचित है। कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स और अधिक फाइबर वाले खाद्य पदार्थ बेहतर विकल्प हैं। अत्यधिक तले-भुने और मीठे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। मिठाई या खजूर सीमित मात्रा में ली जा सकती है, बशर्ते रक्त शर्करा की नियमित निगरानी की जाए।

उपवास के दौरान कठोर व्यायाम से बचना चाहिए, जबकि हल्का या मध्यम व्यायाम किया जा सकता है। सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच पर्याप्त पानी और बिना शक्कर वाले पेय लेना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।

दवाओं में समायोजन

रमज़ान से पहले सभी दवाओं की समीक्षा आवश्यक है। आवश्यकता अनुसार दवाओं की खुराक और समय में परिवर्तन किया जा सकता है। कुछ मामलों में लंबी अवधि तक प्रभावी रहने वाली दवाओं का चयन लाभकारी हो सकता है। नई दवा शुरू करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।

कब रोज़ा तोड़ना चाहिए

यदि रक्त शर्करा का स्तर अत्यधिक कम या बहुत अधिक हो जाए, या कमजोरी, चक्कर, पसीना, अत्यधिक प्यास या निर्जलीकरण के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत रोज़ा तोड़ देना चाहिए और चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

रमज़ान केवल आध्यात्मिक उन्नति का अवसर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की व्यापक जांच और सुधार का भी उपयुक्त समय है। सही मार्गदर्शन, पूर्व तैयारी और नियमित निगरानी से मधुमेह के रोगी भी सुरक्षित और संतुलित ढंग से रोज़ा रख सकते हैं। सक्रिय और संवेदनशील स्वास्थ्य सेवा इस पवित्र महीने को आध्यात्मिक तथा शारीरिक दोनों रूप से लाभकारी बना सकती है।

This is only medical advice and nothing to infringe in religious belief.