Last Updated on January 7, 2026 4:12 pm by INDIAN AWAAZ

आफरीन हुसैन
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन–SIR) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में तीखी बहस छेड़ दी है। यह विवाद केवल SIR की वैधानिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इस कदम की टाइमिंग को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
ममता बनर्जी पहले कह चुकी हैं कि वह SIR को “खून बहने की कीमत पर भी” बंगाल में लागू नहीं होने देंगी। इसके बावजूद, जब यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, तब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने से राजनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ गई है। विपक्ष पूछ रहा है कि यदि यह प्रक्रिया जनविरोधी थी तो शुरुआत में ही अदालत का रुख क्यों नहीं किया गया। जब राज्य में भ्रम और चिंता फैल चुकी थी, तब तक इंतज़ार क्यों किया गया।
विपक्षी दलों का आरोप है कि यदि SIR वास्तव में अल्पसंख्यकों, प्रवासी मजदूरों और गरीब मतदाताओं के हितों के खिलाफ था, तो तत्काल कानूनी कार्रवाई अपेक्षित थी। उनका कहना है कि देरी ने एक संवैधानिक मुद्दे को राजनीतिक तमाशे में बदल दिया है और यह कदम जनहित से अधिक चुनावी गणित से जुड़ा दिखता है।
कांग्रेस नेताओं ने ममता बनर्जी की मंशा पर खुलकर सवाल उठाए हैं। वरिष्ठ कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने इसे “लेट-स्टेज ड्रामा” करार देते हुए कहा कि जब पूरी प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी हो, तब अदालत जाना राजनीतिक दिखावा लगता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने कहा कि यदि चिंता वास्तविक होती तो शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल की जनता को लंबे समय तक असमंजस और डर में रखा गया और अब अचानक मुख्यमंत्री खुद को उनका रक्षक बताने लगी हैं। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा कि समस्या SIR नहीं, बल्कि चुनाव से पहले तय की गई उसकी जल्दबाज़ी भरी समय-सीमा है, जिससे घबराहट फैली और अब उसी घबराहट का राजनीतिक लाभ उठाया जा रहा है।
वहीं तृणमूल कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के फैसले का बचाव करते हुए इसे सोची-समझी रणनीति बताया है। पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा कि तृणमूल ही जनता और प्रशासनिक अन्याय के बीच खड़ी है और यह कदम देरी नहीं बल्कि रणनीतिक प्रतिरोध है। वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने दावा किया कि सरकार ने प्रवासी मजदूरों और कमजोर वर्ग के मतदाताओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के बाद ही अदालत जाने का फैसला किया। राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह चुपचाप मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश कर रही है, जिसे ममता बनर्जी ने उजागर किया है।
भाजपा ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नाटक बताते हुए खारिज कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि पहले खून-खराबे की धमकी, फिर चुप्पी और अब अदालत का सहारा लेना—यह सुशासन नहीं बल्कि “चुनावी कोरियोग्राफी” है। भाजपा प्रवक्ता शमिक भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि भ्रम पैदा करना तृणमूल की राजनीति का हिस्सा है और SIR फर्जी मतदान पर चोट करता है, जिससे सत्तारूढ़ दल असहज है।
अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है, तो कानूनी फैसला न्यायपालिका करेगी। लेकिन बंगाल की सड़कों और राजनीतिक गलियारों में मंशा पर फैसला पहले ही सुनाया जा रहा है। सवाल यह नहीं कि SIR वैध है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई है या फिर सही समय पर गढ़ी गई राजनीतिक कथा।
