
बेंगलुरु: चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देशभर में चल रहे विवाद के बीच कर्नाटक में Form 7 के कथित बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया है कि राज्य में पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए पहले से भरे हुए Form 7 का इस्तेमाल किया जा रहा है।
शिवकुमार ने दावा किया कि उनकी टीम ने 70 प्रतिशत से अधिक बूथों में ऐसे मामले चिन्हित किए हैं, जहां कथित तौर पर विभिन्न भाजपा नेताओं द्वारा बिना पहचान-पत्र के Form 7 एकत्र किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई एजेंसियों के माध्यम से पहले से प्रिंट किए गए Form 7 उपलब्ध कराए गए और इन्हें भाजपा तथा उसके सहयोगी दलों के नेताओं को दिया जा रहा है।
उनके अनुसार, इन प्री-प्रिंटेड फॉर्म में पहले से ही पात्र मतदाताओं के नाम, EPIC नंबर और बूथ संबंधी विवरण दर्ज हैं। शिवकुमार ने सवाल उठाया कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं या अन्य लोगों को मतदाताओं से संबंधित इतनी विशिष्ट जानकारी कैसे उपलब्ध हुई।
Form 7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को हटाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। मौजूदा विवाद ऐसे फॉर्म के कथित रूप से बड़ी संख्या में दाखिल किए जाने से जुड़ा है। शिवकुमार ने इस मामले की जांच और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब SIR, Form 6 और चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। हाल में चुनाव आयोग ने कुछ राज्यों में ऑनलाइन Form 6 में जोड़े गए अतिरिक्त SIR घोषणा-पत्र को वापस लेने का फैसला किया था। यह मुद्दा इसलिए भी विवादित हुआ क्योंकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की थी।
कर्नाटक में शिवकुमार ने 1 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय पहुंचकर इस मामले में कार्रवाई की मांग की और बाद में अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ कार्यालय के बाहर धरना भी दिया। उन्होंने कथित तौर पर बड़े पैमाने पर Form 7 दाखिल किए जाने की जांच और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की है।
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