Last Updated on September 24, 2025 5:55 pm by INDIAN AWAAZ

प्रवीण कुमार
जब-जब शांतिपूर्ण जनसंघर्ष को अनसुना किया जाता है तो लोकतंत्र की सड़कें सुलगने लगती हैं। बुधवार को कुछ ऐसा ही हुआ लद्दाख की राजधानी लेह में। लद्दाख, जिसे केंद्र सरकार ने 2019 में “विकास” और “सुरक्षा” के नाम पर केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील किया था, आज उसी व्यवस्था की चुप्पी के खिलाफ जल रहा है।
एक आंदोलन जो पांच साल शांति से चला…
भारत देश में सोनम वांगचुक एक ऐसा नाम है जिसे गांधीवादी रास्ते का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने लद्दाख की आत्मनिर्भरता, क्लाइमेट जस्टिस और क्षेत्रीय पहचान के लिए वर्षों तक अहिंसात्मक संघर्ष किया। 15 दिन की भूख हड़ताल, लेह से दिल्ली तक पदयात्रा, बार-बार की शांतिपूर्ण अपीलें, इन सभी ने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर्श उदाहरण पेश किया। लेकिन सत्ता ने उन्हें सुनने की जरूरत नहीं समझी।
हिंसा का जिम्मेदार कौन?
ऐसे में जब युवा सड़कों पर उतरते हैं, सीआरपीएम की गाड़ी और भाजपा दफ्तर जलते हैं तो ये सिर्फ एक “कानून-व्यवस्था” की समस्या नहीं होती। यह एक राजनीतिक और नैतिक विफलता का संकेत भी है। वही युवा जो आज हिंसक हो रहे हैं, कल तक वही छात्र थे जो सोनम वांगचुक के साथ धरने पर बैठे थे। सवाल यह है कि क्या सरकार ने जानबूझकर इस आंदोलन को उपेक्षित कर हिंसा की ज़मीन तैयार की है? क्या यह सत्ता की वही पुरानी रणनीति है जब तक आंदोलन शांतिपूर्ण हो, उसे नजरअंदाज करो। जब आग लगे, तभी …..
राजनीतिक वादे और जनविश्वास
साल 2019 में जब जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे से वंचित कर दो हिस्सों में बांटा गया था, तब सरकार ने वादा किया था कि स्थिति सामान्य होते ही राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा। अब छह साल बीत चुके हैं। लेह-लद्दाख की जनता पूछ रही है कि आखिर सरकार की नजरों में स्थिति सामान्य होगी? क्या ‘सामान्य स्थिति’ का अर्थ केवल सैनिकों की तैनाती और पर्यटन है? क्या जनभावनाओं का गला घोंटकर राज्य की परिभाषा तय की जा रही है?
भाजपा के खिलाफ गुस्सा क्यों?
भाजपा न सिर्फ केंद्र की सत्ताधारी पार्टी है, बल्कि यही वो दल है जिसने 2019 के बदलावों को “ऐतिहासिक सुधार” बताया था। अब जब उसी सुधार के परिणामस्वरूप लद्दाख में जनता की आवाज़ सड़कों पर फूटी है, भाजपा मौन है। भाजपा दफ्तर को जलाना भले ही गलत हो, लेकिन उसे सिर्फ “अपराध” के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह उस राजनीतिक विश्वासघात का प्रत्यक्ष प्रतीक है जिसे लद्दाख की जनता बड़ी शिद्दत से महसूस कर रही है।
सोनम वांगचुक की अपील
वांगचुक का अनशन तोड़ना और हिंसा को ‘बेवकूफी’ कहना उनकी जिम्मेदारीपूर्ण नेतृत्व की मिसाल है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या अब यह आंदोलन वांगचुक के हाथ से कही निकल तो नहीं गया है? क्या शांतिपूर्ण आंदोलनों की उम्र अब इतनी ही रह गई है कि सरकार उन्हें थकाकर हिंसा की ओर धकेल दे?
“नया कश्मीर” बनने की राह पर तो नहीं लद्दाख?
लद्दाख की भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील है, पर्यावरणीय चुनौतियां गंभीर हैं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी नगण्य है। ऐसे में अगर लद्दाख की जनता को केंद्र की सत्ता उपेक्षित करती रही, तो सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं लद्दाख नया कश्मीर बनने की राह पर नहीं चल निकला है? क्या ये इलाका भी “राजनीतिक प्रयोगशाला” बनकर तो नहीं रह जाएगा?
लोकतंत्र का असली इम्तिहान
बहरहाल, लद्दाख की हिंसा किसी अस्थायी उत्तेजना का परिणाम नहीं है। यह उसी पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो वर्षों तक नजरअंदाज की गई। अब भी समय है कि सरकार लद्दाख की जनता को सिर्फ “पर्यटक आकर्षण” या “सीमा सुरक्षा बफर ज़ोन” न समझे, बल्कि एक जीवंत, जागरूक और राजनीतिक अधिकारों से लैस समुदाय के रूप में सम्मान दे। अगर अब भी आंखें बंद रहीं, तो अगली आगजनी सिर्फ भाजपा दफ्तर तक सीमित नहीं रहेगी, वह पूरे लोकतंत्र को झुलसा सकती है।
