Last Updated on July 9, 2026 4:55 pm by INDIAN AWAAZ

आफ़रीन हुसैन

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर के सूरज नगर में 11 वर्षीय बच्ची के साथ हुई दरिंदगी और उसकी निर्मम हत्या ने पूरे राज्य ही नहीं, बल्कि देश की संवेदनाओं को झकझोर दिया है। हर सुर्खी के पीछे एक ऐसा परिवार है जिसकी दुनिया हमेशा के लिए उजड़ चुकी है। उस मासूम के माता-पिता के लिए अपनी बेटी को इस तरह खो देने का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। न कोई भाषण, न कोई नारा, न कोई विरोध मार्च और न ही कोई राजनीतिक आश्वासन उनकी बेटी को वापस ला सकता है।

घटना के बाद राजनीतिक दलों के नेताओं का पीड़ित परिवार के घर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। भाजपा नेताओं ने शोकाकुल माता-पिता से मुलाकात कर उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री ने मोमबत्ती मार्च निकालकर बच्ची को श्रद्धांजलि दी और दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की। दूसरी ओर विपक्षी नेताओं ने राज्य में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताया।

हर राजनीतिक दल ने अपनी-अपनी भाषा में इस घटना पर प्रतिक्रिया दी। किसी ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया, तो किसी ने विपक्ष पर इस दुखद घटना का राजनीतिक लाभ उठाने का आरोप लगाया। टीवी चैनलों पर बहसें तेज हो गईं, सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया और राजनीतिक बयानबाज़ी ने सार्वजनिक विमर्श पर कब्ज़ा कर लिया।

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अब भी अनुत्तरित है—क्या किसी ने उस बच्ची के माता-पिता की ख़ामोशी को सुना?

उनकी बेटी अब कभी वापस नहीं आएगी। जिस घर में कभी उसकी खिलखिलाहट गूंजती थी, वहां अब असहनीय सन्नाटा पसरा है। उनके दुख को न कैमरों की फ्लैश माप सकती है और न राजनीतिक भाषण। न्याय, यदि मिलता भी है, तो वह दोषियों को सजा दे सकता है, लेकिन उनकी बेटी की खोई हुई ज़िंदगी वापस नहीं लौटा सकता।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले का मुख्य आरोपी पुलिस मुठभेड़ में मारा गया है। कुछ लोग इसे त्वरित न्याय मान सकते हैं, जबकि कुछ यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या मामले के सभी पहलुओं की विधिसम्मत जांच पूरी हो सकी। इस पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक सच्चाई नहीं बदलती—पीड़ित परिवार का नुकसान कभी पूरा नहीं हो सकता।

स्थानीय लोगों का गुस्सा भी पूरी तरह जायज़ है। इलाके के लोगों ने जवाबदेही तय करने, पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। उनका आक्रोश केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय है। राज्य का हर माता-पिता आज एक ही सवाल पूछ रहा है—अगर यह एक बच्ची के साथ हो सकता है, तो क्या हमारे बच्चों के साथ भी ऐसा हो सकता है?

किसी भी समाज का मूल्यांकन इस बात से नहीं होता कि किसी त्रासदी के बाद उसके नेता कितनी तीखी बहस करते हैं, बल्कि इससे होता है कि वह ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कितने प्रभावी कदम उठाता है। मोमबत्ती मार्च का अपना महत्व है। राजनीतिक नेताओं की संवेदनात्मक यात्राएं भी आवश्यक हो सकती हैं। निंदा के बयान भी ज़रूरी हैं। लेकिन इनमें से कोई भी बेहतर पुलिस व्यवस्था, तेज़ और निष्पक्ष जांच, समयबद्ध न्यायिक प्रक्रिया तथा महिलाओं और बच्चों की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकता।

इस मासूम बच्ची की स्मृति राजनीतिक टकराव नहीं, बल्कि सार्थक बदलाव की हकदार है। उसके माता-पिता केवल सरकारों या राजनीतिक दलों से ही नहीं, बल्कि पूरे समाज से संवेदना, सम्मान और न्याय के अधिकारी हैं।

जब कैमरे चले जाएंगे, नारे थम जाएंगे और राजनीतिक बयान भी ख़ामोश हो जाएंगे, तब भी उस बच्ची के माता-पिता हर सुबह उसी कड़वी सच्चाई के साथ जागेंगे कि उनकी बेटी अब कभी घर नहीं लौटेगी। यही वह त्रासदी है जिसे न कोई राजनीतिक जीत मिटा सकती है, न कोई जनसभा और न ही कोई भाषण।