Last Updated on February 10, 2026 5:43 pm by INDIAN AWAAZ

देवसागर सिंह
अमेरिकी व्यापार विभाग द्वारा पिछले सप्ताहांत जारी किए गए नवीनतम मानचित्र में पीओके (PoK) और अक्साई चिन को भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है। अमेरिका का यह “असामान्य तालमेल” (bonhomie) राष्ट्रपति ट्रंप के भू-राजनीतिक रुख में संभावित बदलाव की अटकलों को हवा दे रहा है।
हालांकि, यह ग्राफिक संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) द्वारा नए व्यापार समझौते की घोषणा के दौरान ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किया गया था, लेकिन इसे प्रशासन की मुहर प्राप्त है, जो इसे महत्वपूर्ण बनाता है। अब तक, अमेरिका आधिकारिक तौर पर इन दोनों क्षेत्रों को विवादित क्षेत्र मानता आया है।
इस बदलाव के पीछे के संभावित कारण
इसके पीछे के अंतर्निहित कारण क्या हो सकते हैं? हाल ही में जब भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लगाया गया, तो भारत ने चीन के साथ अपना वाणिज्य धीरे-धीरे खोलना शुरू कर दिया और रूस के साथ अपनी नजदीकी बढ़ा दी। इससे अमेरिका की चिंताएं बढ़ गईं। कुछ ही हफ्तों में, प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिटेन (UK) और यूरोपीय संघ (EU) के साथ भी व्यापार सौदों पर हस्ताक्षर कर दिए।
अमेरिकी हित भारत को चीन के साथ निरंतर संघर्ष में बनाए रखने में निहित हैं। अमेरिका अपने चीन-विरोधी एजेंडे को केवल भारत और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के माध्यम से ही आगे बढ़ा सकता है। व्यापार विभाग के मानचित्र में यह बदलाव स्पष्ट रूप से भारत को अक्साई चिन का मुद्दा उठाने के लिए लुभाने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन पीओके के मुद्दे को साथ में जोड़े बिना इसका कोई विशेष मतलब नहीं होता। पीओके और अक्साई चिन दोनों ही भारत के लिए भावनात्मक मुद्दे रहे हैं, और भारत का रुख हमेशा से यही रहा है कि ये दोनों क्षेत्र उसके हैं।
भारत की सधी हुई प्रतिक्रिया
हालांकि, भारत अमेरिका के इस “चारे” (bait) को शायद ही निगले। अब तक की चुप्पी को देखते हुए, ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि सरकार इस मोड़ पर इस मुद्दे को दोबारा खोलेगी। ट्रंप अपने नए कार्यकाल में अब तक भारत के साथ व्यवहार में अस्थिर और जोखिम भरे रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि भारत चीन से जुड़े संवेदनशील कदमों पर प्रतिक्रिया देने में सावधानी बरतेगा।
नई दिल्ली ने बहुत पहले एक संसदीय प्रस्ताव के माध्यम से पीओके और अक्साई चिन पर अपनी आधिकारिक स्थिति दोहराई थी, जिसके तहत इन दोनों क्षेत्रों को भारतीय क्षेत्र माना जाता है। यह अलग बात है कि किसी भी सरकार ने सैन्य समाधान की दिशा में कदम नहीं बढ़ाया है।
रणनीतिक चाल या केवल दिखावा?
अमेरिकी प्रशासन के एक सहायक विभाग (trade department) के माध्यम से इन क्षेत्रों को भारत का हिस्सा दिखाकर, अमेरिका ने अपने लिए पीछे हटने का रास्ता (leeway) भी खुला रखा है। यदि वह गंभीर होता, तो विदेश विभाग (State Department) से इसकी आधिकारिक घोषणा होती। इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिका इस मामले को लेकर पूरी तरह गंभीर नहीं है। इसलिए, भारत का मौन रहना सही है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस मानचित्र के जरिए ट्रंप प्रशासन ने भारत को एक अतिरिक्त “प्रलोभन” दिया है—ताकि भारत को रूसी तेल की खरीद बंद करने के लिए राजी किया जा सके। उन्हें लगता है कि ट्रंप वास्तव में यह मानते हैं कि भारत परोक्ष रूप से यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध को वित्तपोषित (funding) कर रहा है, और उनकी शांति योजना के सफल होने के लिए इसे रुकना ही चाहिए।
