Last Updated on January 6, 2026 6:26 pm by INDIAN AWAAZ


— ललित गर्ग

एक समय था जब दुनिया के बड़े हिस्से में बेटी का जन्म बोझ माना जाता था। गर्भ में ही उसके जीवन का अंत कर दिया जाता था, और यदि वह जन्म ले भी लेती, तो भेदभाव, उपेक्षा और वंचना उसका भाग्य बन जाती। सदियों से चली आ रही इस रूढ़ और अमानवीय सोच ने समाज, सभ्यता और प्रकृति—तीनों को गहरे घाव दिए। लेकिन आज उसी दुनिया में सोच का एक निर्णायक बदलाव दिखाई दे रहा है। एक नई चेतना आकार ले रही है। गैलप इंटरनेशनल जैसी वैश्विक संस्थाओं के सर्वे बताते हैं कि 44 देशों में अब बड़ी संख्या में माता-पिता के लिए बच्चे का लिंग मायने नहीं रखता—उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि संतान बेटा है या बेटी। यह बदलाव केवल आँकड़ों का खेल नहीं, बल्कि मानव चेतना में घटित हो रहा एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। बेटियों को लेकर बदलती धारणा, दरअसल मानवता के विकसित दर्शन का प्रतिबिंब है।

हालाँकि तस्वीर का एक पहलू उजला है, तो दूसरा अब भी चिंताजनक। बीते 25 वर्षों में दुनिया ने लगभग 70 लाख बच्चियों को बचाया है—यह मानवीय प्रगति का निर्विवाद प्रमाण है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आज भी हर साल दस लाख से अधिक बच्चियाँ गर्भ में ही मार दी जाती हैं और पिछले 45 वर्षों में यह संख्या पाँच करोड़ से भी अधिक हो चुकी है। यानी लिंग भेद का दानव पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है। फिर भी उम्मीद इसलिए मजबूत है क्योंकि यह भेदभाव धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकार्यता खो रहा है—और यही किसी भी वास्तविक क्रांति की सबसे ठोस नींव होती है।

भारत में यह संघर्ष और भी जटिल रहा है। शिक्षा की कमी, कठोर पितृसत्तात्मक सोच, अंधविश्वास और सामाजिक भ्रांतियों ने लंबे समय तक बेटियों के अस्तित्व को खतरे में रखा। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई देता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पुत्र-प्राथमिकता 1999 में 33 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 15 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट केवल आँकड़ों की नहीं, बल्कि मानसिकता के परिवर्तन का संकेत है। फिर भी 15 प्रतिशत का स्तर भी कम नहीं है, क्योंकि इसका सीधा असर लिंग अनुपात पर पड़ता है।

आज भारत का लिंग अनुपात प्रति 1,000 लड़कों पर 943 लड़कियों का है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जन्म के समय लड़कों-लड़कियों का प्राकृतिक अनुपात लगभग 105:100 होता है, जो पाँच वर्ष की उम्र तक संतुलित हो जाना चाहिए। यदि इसके बाद भी प्रति 1,000 लड़कों पर 57 लड़कियाँ कम हैं, तो यह प्रकृति की नहीं, समाज की हस्तक्षेपकारी भूमिका का प्रमाण है। 57 का अंतर बहुत बड़ा है। मौजूदा सुधार की गति से इस खाई को पाटने में 25 वर्ष से अधिक समय लग सकता है। इसलिए जरूरी है कि बेटियों के संरक्षण और सशक्तिकरण के प्रयासों का दायरा और रफ्तार—दोनों बढ़ाई जाएँ। यह न केवल सामाजिक न्याय के लिए, बल्कि सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है।

इस परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली आधार शिक्षा बनी है। जहाँ-जहाँ लड़कियों को समान शिक्षा के अवसर मिले, उन्होंने न केवल अपनी क्षमता सिद्ध की, बल्कि समाज की दिशा भी बदली। भारत और दुनिया के कई देशों में छात्रवृत्ति, डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने बेटियों के लिए नए रास्ते खोले हैं। ग्रामीण क्षेत्रों तक में लड़कियों का स्कूल नामांकन बढ़ा है, उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी मजबूत हुई है और वे विज्ञान, तकनीक, खेल, प्रशासन और उद्यमिता में अपनी पहचान बना रही हैं। नीति स्तर पर भी दृष्टिकोण बदला है—संरक्षण से आगे बढ़कर वास्तविक सशक्तिकरण की ओर।

दुनिया भर में महिलाएँ आज राजनीति, प्रशासन और कॉरपोरेट नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में हैं। वे राष्ट्राध्यक्ष हैं, सेनाओं का नेतृत्व कर रही हैं, वैज्ञानिक खोजों की अगुआई कर रही हैं और वैश्विक नीतियों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। यह परिवर्तन एक बुनियादी सत्य को सिद्ध करता है—अवसर मिलने पर प्रतिभा लिंग नहीं पहचानती। गैलप सर्वे में दिखाई देने वाली लिंग-तटस्थता इसी सामाजिक स्वीकारोक्ति का प्रमाण है कि बेटियाँ भी उतनी ही सक्षम हैं।

फिर भी, इस बदलती सोच के बीच महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध, शोषण और हिंसा की भयावह सच्चाइयों पर आत्ममंथन जरूरी है। वैश्विक सूचकांकों में भारत महिलाओं की सुरक्षा और न्याय के मामले में 177 देशों में 128वें स्थान पर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय औसत दर 66.4 है, जबकि दिल्ली में यह 144.4 तक पहुँच जाती है। यह भी चिंताजनक है कि लगभग 90 प्रतिशत यौन शोषण परिचित लोगों द्वारा किया जाता है। इसलिए कानून और योजनाएँ आवश्यक तो हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। असली बदलाव संस्कृति में आता है—घरों के भीतर, भाषा में और परंपराओं में।

मीडिया, साहित्य और सिनेमा की भूमिका भी निर्णायक है। वे या तो रूढ़ छवियों को मजबूत कर सकते हैं या नई सोच को जन्म दे सकते हैं। आज सकारात्मक प्रस्तुतियाँ बढ़ रही हैं, जो बेटियों को आत्मनिर्भर, साहसी और सक्षम नेतृत्वकर्ता के रूप में दिखाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ पहल भी इसी सोच से प्रेरित है—लिंग अनुपात सुधारने और सामाजिक मानसिकता बदलने के लिए।

आज स्पष्ट है कि समानता केवल अधिकारों की सूची नहीं, बल्कि अवसरों की वास्तविक उपलब्धता है। बेटियों को बचाना पहला कदम था; उन्हें आगे बढ़ने, उड़ान भरने और नेतृत्व करने देना अगला। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, संपत्ति अधिकार, डिजिटल पहुँच और निर्णय-निर्माण में भागीदारी—यही समानता के असली स्तंभ हैं।

यदि इन मोर्चों पर प्रयास निरंतर और समन्वित रहे, तो आने वाले वर्षों में न केवल लिंग अनुपात सुधरेगा, बल्कि समाज अधिक संतुलित, संवेदनशील और उत्पादक बनेगा। एक समय था जब बेटी को गर्भ में ही समाप्त कर दिया जाता था; आज वही दुनिया उसके जन्म का उत्सव मनाना सीख रही है। यह परिवर्तन भले ही अधूरा हो, लेकिन निर्णायक है। संकेत स्पष्ट हैं—आने वाला दौर वास्तव में बेटियों का है।