रिचा पांडे

तमिलनाडु के विरुधुनगर में कक्षा 6 का 11 वर्षीय छात्र, फरीदाबाद में कक्षा 11 की एक छात्रा, दिल्ली में 10 वर्षीय बच्ची और विशाखापत्तनम में यूकेजी का एक मासूम बच्चा—ये सभी उन परेशान करने वाली घटनाओं की कड़ी का हिस्सा बन गए हैं, जिनमें बच्चों से जुड़ी त्रासदियों के साथ कथित तौर पर बदमाशी, अपमान या स्कूल में कठोर दंड की बातें सामने आई हैं। विरुधुनगर में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, 11 वर्षीय बच्चे का सहपाठियों ने कथित तौर पर मजाक उड़ाया और अधूरा गृहकार्य करने को लेकर उसे फटकार लगाई गई।

फरीदाबाद में एक छात्रा के परिवार ने आरोप लगाया कि उसे दंड के तौर पर कई घंटों तक खड़ा रखा गया था। दिल्ली में एक बच्ची को किताब न लाने पर कथित तौर पर धूप में खड़ा किया गया। वहीं विशाखापत्तनम में एक छोटे बच्चे को कक्षा में कथित रूप से अपमान और थप्पड़ का सामना करना पड़ा। इन सभी मामलों की जांच अभी जारी है, लेकिन वे एक बेहद गंभीर सवाल जरूर उठाते हैं—क्या भारतीय स्कूल बच्चों को डर, अपमान और भावनात्मक तनाव से बचाने के लिए पर्याप्त कदम उठा रहे हैं?

इन घटनाओं की जांच अपने स्तर पर हो रही है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अपमान और हानिकारक अनुशासनात्मक तरीकों के संकट में बदलने से पहले स्कूल क्या कर सकते हैं?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का संकट व्यापक होता जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2023 में यह संख्या 13,892 थी। देश में दर्ज कुल आत्महत्याओं में छात्रों की हिस्सेदारी 8.5 प्रतिशत रही। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 1,071 आत्महत्याओं का कारण परीक्षा में असफलता बताया गया। ये आंकड़े यह साबित नहीं करते कि बदमाशी, सजा या स्कूल का दबाव आत्महत्या का कारण बनते हैं। लेकिन ये निश्चित रूप से स्कूलों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करने चाहिए, जिसमें कभी-कभी बच्चे की भावनात्मक सेहत की तुलना में शैक्षणिक प्रदर्शन और अनुशासन को अधिक महत्व मिल जाता है।

अक्सर स्कूलों में बदमाशी की घटनाओं से निपटने का तरीका एक तय प्रक्रिया तक सीमित रह जाता है—बदमाशी करने वाले बच्चे की पहचान करना, उसे सजा देना, जिस बच्चे को निशाना बनाया गया उससे बात करना और फिर मामले को समाप्त मान लेना। लेकिन बदमाशी शायद ही कभी केवल एक घटना से शुरू होकर वहीं खत्म होती है। यह कक्षा में मौजूद शक्ति-संतुलन, साथियों के दबाव, पूर्वाग्रह, अलग-थलग किए जाने और ऐसी संस्कृति से बढ़ सकती है, जिसमें दूसरे बच्चे का मजाक उड़ाना महज मनोरंजन समझा जाता है।

गंभीर अनुशासनहीनता के मामलों में सजा आवश्यक हो सकती है, लेकिन सजा और रोकथाम एक ही बात नहीं हैं। जब स्कूल केवल किसी एक बच्चे की पहचान कर उसे दंडित करते हैं, तो वे घटना पर तो कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन उस वातावरण और संस्कृति को संबोधित नहीं कर पाते, जिसने उस व्यवहार को जन्म दिया। रोकथाम के लिए बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि अपमान, बहिष्कार और क्रूर व्यवहार क्यों नुकसानदेह हैं। साथ ही, उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि परेशानी में वे किससे मदद मांग सकते हैं और जब कुछ गलत हो रहा हो तो वे बिना डर के अपनी बात कह सकें।

इसलिए मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को स्कूल जीवन का नियमित हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्कूलों में उम्र के अनुरूप साप्ताहिक मानसिक स्वास्थ्य कक्षाएं शुरू की जा सकती हैं, जहां बच्चे अपनी भावनाओं को पहचानना और व्यक्त करना, अस्वीकृति और पढ़ाई के दबाव से निपटना, जरूरत पड़ने पर मदद मांगना तथा अपने और अपने साथियों में मानसिक तनाव के संकेतों को पहचानना सीखें। परामर्श की व्यवस्था केवल किसी त्रासदी के बाद सक्रिय नहीं होनी चाहिए। छात्रों को स्कूल में परामर्शदाताओं तक आसान पहुंच और बदमाशी या किसी अन्य प्रकार के मानसिक तनाव की गोपनीय शिकायत के सुरक्षित माध्यम उपलब्ध होने चाहिए।

स्कूलों को यह भी नए सिरे से विचार करना होगा कि अनुशासन का अर्थ क्या है। यदि किसी बच्चे ने गृहकार्य पूरा नहीं किया है तो उससे जवाबदेही तय की जानी चाहिए, लेकिन गलती सुधारने और पूरी कक्षा के सामने बच्चे को शर्मिंदा करने के बीच स्पष्ट अंतर है। शिक्षकों के प्रशिक्षण और पेशेवर विकास में ऐसे व्यावहारिक तरीकों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनसे वे अपेक्षाएं स्पष्ट कर सकें, अनुशासनहीनता से निपट सकें और कक्षा का अनुशासन बनाए रखते हुए बच्चे की गरिमा को ठेस न पहुंचाएं।

स्कूलों को बच्चों को यह समझने के अवसर भी देने चाहिए कि उनके व्यवहार का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है। यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि सहानुभूति अपने आप विकसित हो जाएगी। कहानियां, भूमिका-अभिनय, कक्षा में संवाद और सामूहिक गतिविधियां बच्चों को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि किसी को अलग-थलग करना, चिढ़ाना या सबके सामने अपमानित करना कितना नुकसान पहुंचा सकता है।

जाति, लिंग, दिव्यांगता, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और भाषा जैसे विषयों पर बातचीत भी जरूरी है। इससे बच्चों को उन पूर्वाग्रहों को पहचानने में मदद मिल सकती है, जिन्हें अक्सर स्कूल के रोजमर्रा के जीवन में सामान्य व्यवहार के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है।

माइंडफुलनेस जैसे सरल अभ्यासों के लिए भी स्कूलों में जगह बनाई जा सकती है। स्कूल के दिन की शुरुआत में कुछ मिनट सांस पर ध्यान देने, शांत बैठने या निर्देशित एकाग्रता के लिए दिए जाएं तो इससे बच्चों की सभी समस्याएं हल नहीं होंगी। लेकिन उन्हें कुछ क्षण रुकने, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने और अधिक जागरूकता के साथ दिन की शुरुआत करने का अवसर जरूर मिल सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे बच्चों को यह संदेश जाता है कि उनकी भावनाएं मायने रखती हैं।

स्कूलों को उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, जिसमें धारणाओं पर सवाल उठाना, तथ्यों की जांच करना और रूढ़ियों को चुनौती देना शामिल है। बच्चों को यह समझना चाहिए कि कोई व्यवहार सिर्फ इसलिए स्वीकार्य नहीं हो जाता क्योंकि “सब ऐसा करते हैं” या उसे मजाक अथवा परंपरा का नाम दे दिया गया है। उन्हें यह आत्मविश्वास भी मिलना चाहिए कि जब सामूहिक व्यवहार क्रूरता की सीमा पार करने लगे तो वे उस पर सवाल उठा सकें।

बदमाशी विरोधी नियम और कड़े अनुशासनात्मक प्रावधान जरूरी हैं, लेकिन केवल नियमों के जरिए बदमाशी या अनुचित दंड की समस्या खत्म नहीं की जा सकती। बदमाशी और अपमान केवल व्यक्तिगत अनुशासनहीनता के मामले नहीं हैं। वे स्कूल की समग्र संस्कृति से भी प्रभावित होते हैं।

एक सुरक्षित स्कूल वह है, जहां बच्चों को भरोसा हो कि उनकी चिंताओं को सुना जाएगा और उन्हें गंभीरता से लिया जाएगा। ऐसा स्कूल वह है जहां शिक्षक नियम लागू करते समय छात्रों को अपमानित नहीं करते, जहां मदद मांगने पर बच्चे का मजाक नहीं उड़ाया जाता और जहां दूसरों के प्रति सम्मान रोजमर्रा के स्कूल जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होता है।

यदि स्कूल चाहते हैं कि बच्चे आगे चलकर आत्मविश्वासी, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनें, तो इसकी शुरुआत कक्षाओं को ऐसी जगह बनाने से करनी होगी जहां बच्चे स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और महत्वपूर्ण महसूस करें।

रिचा पांडे अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) के रवि जे. मथाई सेंटर फॉर एजुकेशनल इनोवेशन से जुड़ी शिक्षा शोधकर्ता और शिक्षिका हैं। उन्होंने मुंबई के टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस) से शिक्षा के क्षेत्र में पीएचडी की है। उनके शोध के प्रमुख क्षेत्रों में बाल साहित्य, शैक्षणिक समानता, समावेशन और सीखने की प्रक्रिया शामिल हैं।