Last Updated on June 25, 2026 5:58 pm by INDIAN AWAAZ

अगर पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, तो फिर क्या है? सरकार की सफाई के बाद देशभर में छिड़ी बहस, नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेजों पर उठे नए सवाल

अंदलीब अख्तर
विदेश मंत्रालय (MEA) की एक कानूनी व्याख्या ने देशभर में नागरिकता, पहचान और सरकारी दस्तावेजों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। वर्षों से भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता और पहचान के सबसे विश्वसनीय दस्तावेजों में पासपोर्ट को गिनते रहे हैं, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट कानूनी रूप से नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल एक यात्रा दस्तावेज है। इस बयान के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया।

विवाद का केंद्र एक बुनियादी सवाल है—यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो आखिर भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता किस दस्तावेज से साबित करेंगे?

सरकार ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार पासपोर्ट का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम बनाना और विदेशों में धारक की राष्ट्रीयता की पुष्टि करना है। सरकार का कहना है कि पासपोर्ट का निर्गमन पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत होता है, जबकि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत किया जाता है। इसलिए दोनों का कानूनी दायरा अलग-अलग है।

अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि पासपोर्ट जारी करने से पहले व्यापक जांच-पड़ताल की जाती है, जिसमें दस्तावेजों का सत्यापन और पुलिस जांच शामिल होती है। इसके बावजूद पासपोर्ट को अंतिम और निर्णायक नागरिकता प्रमाणपत्र नहीं माना जा सकता।

क्यों भड़की बहस?

सरकार की इस व्याख्या के बाद सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ आ गई। लोगों ने पूछा कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो फिर सरकार इतनी विस्तृत जांच-पड़ताल के बाद इसे जारी क्यों करती है?

प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने सरकार के तर्क को “असंगत” बताते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकार ऐसे लोगों को भी पासपोर्ट जारी कर सकती है जिनकी भारतीय नागरिकता को लेकर वह पूरी तरह आश्वस्त न हो।

कई राजनीतिक नेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया। राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने पूछा कि जब आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अब पासपोर्ट को भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा रहा, तो आखिर नागरिकता साबित करने वाला दस्तावेज कौन-सा है?

कानूनी स्थिति क्या कहती है?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की बात तकनीकी रूप से सही है। पासपोर्ट और नागरिकता दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। पासपोर्ट किसी व्यक्ति को विदेश यात्रा की अनुमति देने वाला दस्तावेज है, जबकि नागरिकता व्यक्ति की संवैधानिक और कानूनी स्थिति को निर्धारित करती है।

सरकार ने इस संदर्भ में बॉम्बे हाईकोर्ट के 2013 के एक फैसले का भी उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया था कि केवल पासपोर्ट का होना किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने भी इस विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जनता की समझ और कानून की व्याख्या में अंतर है। उनके अनुसार एक कानून दस्तावेज को नियंत्रित करता है, जबकि दूसरा नागरिकता की कानूनी स्थिति को।

फिर भी सबसे विश्वसनीय दस्तावेज क्यों माना जाता है पासपोर्ट?

हालांकि कानूनी रूप से पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह सबसे विश्वसनीय सरकारी दस्तावेजों में से एक है। दुनिया भर में वीजा आवेदन, अंतरराष्ट्रीय यात्रा, बैंकिंग और पहचान सत्यापन के लिए पासपोर्ट को व्यापक मान्यता प्राप्त है।

कानूनी विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है तो उसका पासपोर्ट आवेदन खारिज किया जा सकता है। इसका अर्थ यह है कि पासपोर्ट जारी करने से पहले सरकार को यह संतुष्ट होना पड़ता है कि आवेदक भारतीय नागरिक है।

यही कारण है कि कई विशेषज्ञ पासपोर्ट को नागरिकता का मजबूत साक्ष्य तो मानते हैं, भले ही किसी कानूनी विवाद में यह अंतिम निर्णयकारी दस्तावेज न हो।

पहचान दस्तावेजों का उलझा हुआ जाल

इस विवाद ने भारत की पहचान और दस्तावेज प्रणाली की जटिलताओं को भी उजागर किया है। आधार कार्ड पहचान का प्रमाण है, लेकिन नागरिकता का नहीं। मतदाता पहचान पत्र मतदान का अधिकार दर्शाता है, लेकिन उसकी वैधता भी समय-समय पर सवालों के घेरे में आती रही है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति देता है, लेकिन नागरिकता साबित नहीं करता।

ऐसे में आम नागरिकों के सामने यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि आखिर कौन-सा दस्तावेज उनकी भारतीय नागरिकता को निर्विवाद रूप से स्थापित करता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में दस्तावेजों की एक “सर्कुलर वेरिफिकेशन” प्रणाली विकसित हो गई है, जहां एक दस्तावेज प्राप्त करने के लिए दूसरे दस्तावेज की आवश्यकता पड़ती है और इससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

नागरिकता का वास्तविक प्रमाण क्या है?

कानूनी रूप से जन्म प्रमाणपत्र को नागरिकता से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। हालांकि नागरिकता कानूनों में हुए संशोधनों के कारण यह भी हर मामले में पर्याप्त नहीं है।

1 जुलाई 1987 के बाद जन्म लेने वाले व्यक्तियों को यह भी साबित करना पड़ सकता है कि जन्म के समय उनके माता-पिता में से कम से कम एक भारतीय नागरिक था। वहीं 3 दिसंबर 2004 के बाद जन्म लेने वालों के लिए दोनों माता-पिता की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

जिन लोगों को प्राकृतिककरण या पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त हुई है, उनके लिए सरकार द्वारा जारी नागरिकता प्रमाणपत्र सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

ई-पासपोर्ट की ओर बढ़ता भारत

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत तेजी से ई-पासपोर्ट व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। सरकार के अनुसार अब तक लगभग 1.47 करोड़ ई-पासपोर्ट जारी किए जा चुके हैं।

इन पासपोर्टों में रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) चिप और एंटीना लगा होता है, जिसमें धारक की व्यक्तिगत और बायोमेट्रिक जानकारी सुरक्षित रहती है। सरकार का दावा है कि इससे जालसाजी की संभावनाएं कम होती हैं, सुरक्षा बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर आव्रजन प्रक्रिया तेज होती है।

वर्तमान में जारी किए जा रहे सभी नए पासपोर्ट चिप-आधारित ई-पासपोर्ट हैं।

बहस केवल पासपोर्ट की नहीं

पासपोर्ट विवाद ने केवल एक दस्तावेज की कानूनी स्थिति पर सवाल नहीं खड़े किए हैं, बल्कि यह भारत की नागरिकता और पहचान व्यवस्था की जटिलताओं को भी सामने लाया है। कानून भले ही पासपोर्ट को केवल यात्रा दस्तावेज मानता हो, लेकिन आम भारतीय की नजर में यह उसकी राष्ट्रीय पहचान और भारतीय नागरिकता का सबसे मजबूत प्रतीक बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद ने सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती रख दी है—देश के करोड़ों नागरिकों को यह स्पष्ट और सरल जवाब देना कि आखिर भारतीय नागरिकता का अंतिम और सर्वमान्य प्रमाण क्या है।

जब तक इस सवाल का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, पासपोर्ट पर छिड़ी यह बहस केवल कानूनी व्याख्याओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नागरिकता और पहचान से जुड़ी व्यापक चिंताओं को भी जन्म देती रहेगी।