Last Updated on September 9, 2026 3:51 pm by INDIAN AWAAZ

ओ.पी. पाल
दुनिया इस वर्ष 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस अपनी 60वीं वर्षगांठ मना रही है। प्रत्येक वर्ष मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं है, बल्कि यह मानव अधिकार, व्यक्तिगत सशक्तिकरण और सामाजिक विकास के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करने वाला एक अवसर है। ऐतिहासिक रूप से साक्षरता का अर्थ केवल अक्षर ज्ञान, पढ़ना-लिखना और बुनियादी अंकगणित सीख लेना माना जाता था। किंतु आज के तेजी से बदलते डिजिटल युग में साक्षरता की यह पारंपरिक परिभाषा अपर्याप्त हो चुकी है। वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), बिग डेटा, रोबोटिक्स और डिजिटल तकनीकों ने शिक्षा के पूरे ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन ला दिया है। आज का विद्यार्थी केवल सूचनाओं को याद रखने (रटंत प्रणाली) तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसे यह सीखना होगा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सही जानकारी कैसे खोजें, एआई उपकरणों का नैतिक प्रयोग कैसे करें और समस्याओं का रचनात्मक समाधान कैसे निकालें। शिक्षा का यह नया परिदृश्य न केवल वैश्विक स्तर पर, बल्कि भारत में भी एक नई दिशा तय कर रहा है, जहाँ एक तरफ तकनीकी नवाचारों के जरिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सुलभ बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ संस्कार, अनुशासन और जीवन मूल्यों को बनाए रखने की चुनौती भी सामने है।
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 2026 पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि भारत ने निरक्षरता के कलंक को मिटाने और डिजिटल क्रांति को अपनाने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। एआई शिक्षा ने सीखने की गति को पंख दिए हैं और संभावनाओं के नए द्वार खोले हैं। हालाँकि, हमें यह याद रखना होगा कि तकनीक केवल एक साधन है, साध्य नहीं। शिक्षा की असली सफलता इस बात में निहित है कि हम इस तकनीक का उपयोग बच्चों में चरित्र निर्माण, ज्ञानवर्धन और सामाजिक दायित्वबोध पैदा करने के लिए कैसे करते हैं। यदि हम एआई के ज्ञान को भारतीय संस्कारों, समान अवसरों और नैतिक मूल्यों के साथ जोड़कर आगे बढ़ेंगे, तो भारत न केवल पूर्ण साक्षर बनेगा, बल्कि वैश्विक ज्ञान-अर्थव्यवस्था का विश्वगुरु भी बनेगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के साल 2023-24 के आँकड़ों के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर 80.9 फीसदी तक पहुँच चुकी है, जो 2011 में 74 फीसदी थी। भारत में पुरुष 84.7 फीसदी और महिला साक्षरता 70.3 फीसदी के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम हो रहा है, जिसमें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने प्रमुख भूमिका निभाई है।
21वीं सदी में साक्षरता का बदलता स्वरूप
एआई का प्रवेश डिजिटल युग में एआई शिक्षा का पर्याय बनता जा रहा है। एआई आधारित शैक्षणिक उपकरण कक्षाओं को नया जीवन दे रहे हैं। इससे पहले पारंपरिक कक्षाओं में शिक्षक के लिए हर छात्र की गति के अनुसार पढ़ाना कठिन होता था। लेकिन आज एआई संचालित ‘अडैप्टिव लर्निंग’ प्लेटफॉर्म प्रत्येक बच्चे की क्षमता और सीखने की गति का विश्लेषण करते हैं तथा उसके अनुकूल अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराते हैं। एआई प्लेटफॉर्म शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों, जैसे कॉपियां जांचने, मूल्यांकन करने और दैनिक पाठ योजनाएँ बनाने में सहायता करते हैं, जिससे शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तिगत मार्गदर्शन और उनके चरित्र निर्माण पर अधिक समय दे पाते हैं। भारत जैसे बहुभाषी देश में एआई आधारित रियल-टाइम अनुवाद उपकरण (जैसे भाषिणी) कठिन से कठिन विषयों को क्षेत्रीय भाषाओं में तुरंत अनुवादित कर देते हैं, जिससे ग्रामीण और दूरदराज के बच्चे भी ज्ञान की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
सरकार की नीतियां और एआई शिक्षा को प्रोत्साहन
भारत सरकार ने देश में शिक्षा के डिजिटलीकरण और एआई के समावेश के लिए ठोस और व्यापक नीतियां लागू की हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि देश के युवाओं को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने हेतु छठी कक्षा से ही ‘कोडिंग’, ‘कम्प्यूटेशनल थिंकिंग’ और ‘एआई साक्षरता’ को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। केंद्र सरकार का यह कार्यक्रम 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के गैर-साक्षर व्यक्तियों को बुनियादी साक्षरता देने के साथ-साथ डिजिटल व वित्तीय साक्षरता से सशक्त बना रहा है। यदि वैश्विक स्तर पर विकसित देशों अमेरिका, जापान, फिनलैंड या सिंगापुर आदि राष्ट्र से तुलना करें, तो वहाँ डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और 100 फीसदी साक्षरता का स्तर काफी समय पहले हासिल किया जा चुका है। उन देशों में एआई का उपयोग एडवांस रिसर्च और स्वचालन में बड़े पैमाने पर हो रहा है। ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भारत एक रोल मॉडल बन चुका है, जिसने कम लागत में विशाल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करके करोड़ों बच्चों को डिजिटल साक्षरता से जोड़ा है।
सतही ज्ञान और कॉपी-पेस्ट संस्कृति
एआई चैटबॉट्स के आने से छात्र बिना सोचे-समझे उत्तर पाने के आदी हो रहे हैं, जिससे उनकी विश्लेषणात्मक और आलोचनात्मक सोच प्रभावित हो सकती है। सच्ची शिक्षा का उद्देश्य व्यापार नहीं, बल्कि मनुष्य का सर्वांगीण विकास है। भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा भी यही सिखाती है कि विद्या वह है जो मुक्त करे और जीवन को सुदृढ़ बनाए। जब तकनीक का उपयोग केवल परीक्षा में अंक लाने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, अनुशासन और आत्मविश्वास विकसित करने के लिए किया जाता है, तभी शिक्षा का व्यावसायीकरण रुकता है।
संस्कार, नैतिकता और एआई
संतुलन ही सफलता की कुंजी है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कितना भी सक्षम क्यों न हो जाए, वह शिक्षक या मानवीय मूल्यों का स्थान कभी नहीं ले सकता। एआई बच्चे को गणित का कठिन सवाल हल करना सिखा सकता है, लेकिन वह बच्चे को ईमानदारी, करुणा, नागरिक कर्तव्य और अनुशासन नहीं सिखा सकता। इसलिए आधुनिक शिक्षा का आदर्श मॉडल, प्राचीन संस्कार+आधुनिक तकनीक (एआई) का संगम होना चाहिए। शिक्षकों की भूमिका आज और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। शिक्षक अब केवल ‘सूचना देने वाले’ नहीं रहे, बल्कि वे एआई के दौर में बच्चों के ‘मार्गदर्शक’ और ‘नैतिक दिशा-निर्देशक’ की भूमिका निभा रहे हैं।
शिक्षा का व्यावसायीकरण बनाम ज्ञानवर्धन
डिजिटल क्रांति और एआई के प्रवेश के साथ ही शिक्षा क्षेत्र में व्यावसायीकरण और वास्तविक ज्ञानवर्धन के बीच की बहस तेज हो गई है। एड-टेक कंपनियों के बाजारवादी रुख की दृष्टि से कई निजी एड-टेक कंपनियाँ और कोचिंग संस्थान एआई और डिजिटल टूल्स को केवल एक ‘ब्रांडिंग’ या ‘बिक्री के साधन’ की तरह पेश कर रहे हैं। महँगे डिजिटल कोर्स और एआई टूल्स के कारण सामाजिक-आर्थिक असमानता पैदा होने का खतरा रहता है। केवल मशीनों पर निर्भरता से बच्चों में सामाजिक संपर्क, सहानुभूति और व्यावहारिक अनुभवों की कमी हो सकती है।
