Last Updated on August 18, 2025 6:08 pm by INDIAN AWAAZ

R. Suryamurthy

भारत की प्रमुख स्टील निर्माता कंपनी JSW स्टील और दक्षिण कोरिया की अग्रणी स्टील कंपनी POSCO ग्रुप ने एक संभावित संयुक्त उद्यम के तहत 6 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) क्षमता वाले एक एकीकृत स्टील प्लांट की स्थापना की योजना बनाई है। इसके लिए दोनों कंपनियों के बीच एक ग़ैर-बाध्यकारी समझौता (non-binding agreement) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

यह साझेदारी JSW स्टील की भारत में मज़बूत मौजूदगी और परिचालन क्षमता को POSCO की उन्नत स्टील निर्माण तकनीक के साथ जोड़ने का प्रयास है। यह प्रस्तावित परियोजना न केवल भारत की औद्योगिक उत्पादन क्षमता को सशक्त बनाएगी, बल्कि देश के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी मजबूती देगी।

ओडिशा हो सकता है संभावित स्थल

दोनों कंपनियां फिलहाल एक विस्तृत व्यवहार्यता अध्ययन (feasibility study) करेंगी, जिसमें निवेश की शर्तें, संसाधनों की उपलब्धता और परियोजना के व्यावसायिक पहलुओं का मूल्यांकन होगा। ओडिशा को संभावित साइट के रूप में चिन्हित किया गया है, क्योंकि वहां प्राकृतिक संसाधनों की भरपूर उपलब्धता और रणनीतिक परिवहन सुविधाएं मौजूद हैं।

वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए साझा प्रयास

JSW स्टील के संयुक्त प्रबंध निदेशक एवं सीईओ जयंत आचार्य ने इस साझेदारी को ऐतिहासिक बताते हुए कहा,

“यह साझेदारी JSW की निष्पादन क्षमता और घरेलू उपस्थिति को POSCO की तकनीकी विशेषज्ञता के साथ जोड़ती है। हमारा उद्देश्य एक ऐसा स्टील हब बनाना है जो घरेलू जरूरतों के साथ-साथ निर्यात के लिए भी तैयार हो।”

वहीं, POSCO होल्डिंग्स के प्रतिनिधि निदेशक और अध्यक्ष ली जू-ताए ने कहा,

“यह सहयोग पारस्परिक विश्वास और दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर आधारित है। भारत वैश्विक स्टील मांग का भविष्य है और यह परियोजना भारत की औद्योगिक प्रगति में हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।”

भारत को मिलेगा वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का अवसर

यदि यह परियोजना अपने अंतिम चरण तक पहुंचती है, तो यह भारत को वैश्विक विनिर्माण और निर्यात केंद्र के रूप में स्थापित करने में एक अहम भूमिका निभा सकती है। यह न केवल स्टील उत्पादन को बढ़ावा देगा बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देगा।

निष्कर्ष

JSW और POSCO जैसे दो दिग्गजों का यह सहयोग भारत के औद्योगिक भविष्य और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है। साथ ही, यह परियोजना भारत को उसकी आत्मनिर्भरता के सपने की ओर एक कदम और आगे ले जाएगी।