Last Updated on March 8, 2026 12:53 am by INDIAN AWAAZ


— ललित गर्ग

मानव सभ्यता के विकास की कहानी में यदि किसी शक्ति نے सृजन में सर्वाधिक योगदान दिया है, तो वह नारी शक्ति है। वह जीवन की दात्री है, संस्कृति की वाहक है और समाज की संवेदनशील आत्मा है। भारतीय परंपरा ने नारी को कभी केवल एक सामाजिक भूमिका तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे “माँ” के रूप में सर्वोच्च पूजनीय स्थान दिया है। “मातृ देवो भव” की पावन अभिव्यक्ति से लेकर “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” (जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं) के उद्घोष तक, हमारी संस्कृति नारी के प्रति एक अद्वितीय श्रद्धा को दर्शाती है। यही कारण है कि भारत में धरती, गाय और मातृभूमि तक को “माँ” कहकर संबोधित किया जाता है।

परंतु विडंबना यह है कि जिस समाज ने नारी को देवी का दर्जा दिया, वही समाज आज भी महिलाओं के साथ असुरक्षा, भेदभाव और हिंसा का गवाह बन रहा है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं है; यह महिलाओं की वास्तविक स्थिति पर गहरे आत्म-मंथन का अवसर प्रदान करता है। दुनिया भर में किए गए अध्ययन स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि यद्यपि महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन समानता, सुरक्षा और स्वतंत्रता की यात्रा अभी भी पूर्णता से बहुत दूर है।

वैश्विक अंतराल और आर्थिक भागीदारी

‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 के अनुसार, अब तक वैश्विक लैंगिक अंतराल का केवल 68.8 प्रतिशत ही भरा जा सका है, जिसका अर्थ है कि लगभग एक-तिहाई अंतर अभी भी मौजूद है। सबसे बड़ी असमानता आर्थिक भागीदारी के क्षेत्र में है, जहाँ समानता केवल 61 प्रतिशत तक पहुँची है। ये आँकड़े संकेत देते हैं कि जहाँ महिलाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगभग समानता हासिल कर ली है, वहीं आर्थिक अवसरों और राजनीतिक नेतृत्व में उनकी भागीदारी अब भी सीमित है। वैश्विक स्तर पर वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या केवल 42 प्रतिशत है, और शीर्ष प्रबंधन पदों पर उनका प्रतिनिधित्व लगभग एक-तिहाई ही बना हुआ है।

भारत की स्थिति: उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ

भारत की स्थिति भी एक मिश्रित तस्वीर पेश करती है। एक ओर भारतीय महिलाएँ अंतरिक्ष विज्ञान, सेना, राजनीति और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर श्रम बाजार में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। हालिया आँकड़ों के अनुसार, भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर लगभग 32 प्रतिशत है, और एक बड़ी संख्या में महिलाएँ घरेलू जिम्मेदारियों के कारण रोजगार से बाहर हैं। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ द्वारा रिपोर्ट किए गए ये आँकड़े केवल संख्या नहीं हैं; ये सामाजिक संरचना, मानसिकता और अवसरों की असमानता की गहरी हकीकतों को उजागर करते हैं।

आज कई देशों में महिलाएँ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और वैज्ञानिक के रूप में नेतृत्व कर रही हैं। भारत में भी राष्ट्रपति और लड़ाकू पायलटों के रूप में उनकी उपस्थिति इस बदलाव को दर्शाती है। फिर भी, यह सत्य है कि दुनिया के बहुत कम देशों में महिलाएँ शीर्ष राजनीतिक पदों पर हैं और ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का मुद्दा आज भी अनसुलझा है। इसके अतिरिक्त, युद्ध और संकट की स्थितियाँ महिलाओं को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। 2024 के अध्ययनों के अनुसार, लगभग 67 करोड़ महिलाएँ हिंसक संघर्षों से प्रभावित क्षेत्रों में रह रही थीं।

परिवर्तन के पाँच स्तंभ और भविष्य की राह

आधुनिक युग की उभरती चुनौतियाँ—जैसे जलवायु परिवर्तन, युद्ध, आतंकवाद और डिजिटल असमानता—महिलाओं के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में करोड़ों महिलाएँ और लड़कियाँ अत्यधिक गरीबी में धकेली जा सकती हैं। इतिहास गवाह है कि जब भी समाज पर संकट आया, महिलाओं ने असाधारण साहस दिखाया। कित्तूर चेनम्मा, बेगम हजरत महल, रानी अवंती बाई लोधी, सरोजिनी नायडू और दुर्गा भाभी जैसी वीरांगनाओं ने सिद्ध किया कि नारी केवल करुणा का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस और प्रतिरोध का साक्षात स्वरूप भी है।

आज दहेज, कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और मानव तस्करी जैसी कुरीतियाँ कानून के साथ-साथ सामाजिक मानसिकता का भी प्रश्न हैं। समस्या की जड़ उस सोच में है जिसने सदियों से नारी को “अबला” कहकर उसकी क्षमताओं को सीमित करने का प्रयास किया।

निष्कर्ष: सशक्तिकरण से आत्म-निर्भरता तक

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 का वैश्विक संदेश है: “सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिकार, समानता और सशक्तिकरण।” सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल अधिकार देना नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता और सम्मान सुनिश्चित करना है।

शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल साक्षरता, आर्थिक स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी—ये पाँच स्तंभ महिला सशक्तिकरण की असली नींव हैं। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उज्ज्वला योजना, नारी शक्ति वंदन अधिनियम और ग्रामीण क्षेत्रों में आवास निर्माण जैसे कदमों ने महिलाओं की गरिमा को मजबूत किया है।

अंततः, नारी के प्रति दृष्टिकोण बदलना अनिवार्य है। दुनिया को महिलाओं के प्रति उपेक्षा और दमन को समाप्त कर एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ उनकी पहचान सुरक्षित हो। नारी को भी अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानना होगा। आज की नारी केवल अधिकार माँगने वाली नहीं, बल्कि बदलाव की सूत्रधार (Creator of Change) है। इस दिवस की सार्थकता तभी होगी जब नारी का सम्मान केवल एक दिन का उत्सव न रहकर पूरे वर्ष की निरंतर सामाजिक चेतना बन जाए। तभी भारतीय संस्कृति का वह आदर्श चरितार्थ होगा: “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” (जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं)।