
– ललित गर्ग
दशकों से भारतीय समाज महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा करता रहा है। महिलाओं को “समाज का दूसरा आधा हिस्सा” और राष्ट्र के विकास की समान भागीदार बताया जाता है। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और नेतृत्व में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अनेक नीतियाँ और कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। सरकारें बार-बार महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने का वादा करती रही हैं, यहाँ तक कि विधानसभाओं और संसद में 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की बात भी की गई है। समाज गर्व से विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों का उत्सव मनाता है। लेकिन इन उत्साहजनक कथाओं के पीछे एक चिंताजनक सच्चाई छिपी है, जो हमें महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण की स्थिति पर पुनर्विचार करने को मजबूर करती है।
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” के रूप में मान्यता दी। न्यायालय ने स्वीकार किया कि परिवार का प्रबंधन और देखभाल करने में महिलाओं द्वारा किया गया अवैतनिक श्रम अपार आर्थिक और सामाजिक महत्व रखता है और इसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वहीं, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आँकड़े एक भयावह सच्चाई उजागर करते हैं: ग्रामीण भारत में हर चार में से एक महिला और शहरी भारत में हर छह में से एक महिला किसी न किसी प्रकार की हिंसा का शिकार होती है। यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि जिस महिला को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है, वही महिला अपने घर और समाज में असुरक्षा, भेदभाव और हिंसा की छाया में जीती है।
गृहिणियों की मान्यता एक ऐतिहासिक कदम है। पीढ़ियों से घरेलू कामकाज को केवल कर्तव्य, स्नेह या त्याग का विस्तार माना गया है। घर की सफाई, भोजन बनाना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल, परिवार के स्वास्थ्य और मूल्यों का संरक्षण, घरेलू मामलों का प्रबंधन और सामाजिक रिश्तों का पोषण—इन सबको महिलाओं की स्वाभाविक जिम्मेदारी समझा गया। परिणामस्वरूप, इस श्रम को कभी आर्थिक दृष्टि से नहीं आँका गया। वास्तव में यदि परिवार इन सभी कार्यों के लिए अलग-अलग व्यक्तियों को नियुक्त करे तो खर्च बहुत अधिक होगा। इसके बावजूद गृहिणियों को न वेतन मिलता है, न सामाजिक मान्यता। वे सालभर, चौबीसों घंटे काम करती हैं, बिना छुट्टी, पदोन्नति या सेवानिवृत्ति लाभ के।
न्यायालय का यह कथन कि गृहिणियाँ केवल अपने परिवार ही नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देती हैं, एक सामाजिक संदेश है। एक मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामले में न्यायालय ने सुझाव दिया कि गृहिणी की सेवाओं का मूल्य न्यूनतम ₹30,000 प्रति माह आँका जाना चाहिए। यह केवल न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि उस मानसिकता को चुनौती है जो घरेलू कामकाज को कमतर आँकती है। वास्तव में महिलाओं का अदृश्य श्रम अर्थव्यवस्था की नींव है। यदि इस अवैतनिक श्रम को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में शामिल किया जाए तो भारत की आर्थिक तस्वीर बिल्कुल अलग होगी।
लेकिन सवाल यह है कि क्या महिलाएँ वह गरिमा, सुरक्षा और सम्मान पा रही हैं जिसकी वे हकदार हैं? NFHS के आँकड़े बताते हैं कि लगभग 22 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ (18 से 49 वर्ष आयु वर्ग) अपने वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा का अनुभव कर चुकी हैं। यह एक दर्दनाक विरोधाभास है। जिस महिला का श्रम परिवारों को टिकाए रखता है और समाज को मजबूत करता है, वही महिला अक्सर उसी संस्था में हिंसा और शोषण का शिकार होती है जिसे वह पोषित करती है।
कानून और जागरूकता अभियानों के बावजूद हिंसा क्यों जारी है? इसका उत्तर केवल विधि में नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में छिपा है। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित है। महिलाओं को परिवार की रीढ़ कहा जाता है, लेकिन उन्हें बराबर निर्णय लेने की शक्ति और वास्तविक स्वायत्तता नहीं दी जाती।
दहेज प्रथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। शिक्षा और आर्थिक प्रगति के बावजूद दहेज की मांग और उससे जुड़ी अपराध लगातार सामने आते हैं। दहेज उत्पीड़न और दहेज मृत्यु की घटनाएँ बार-बार सुर्खियाँ बनती हैं। यह विडंबना है कि माता-पिता अपनी बेटियों को वर्षों तक शिक्षित और पोषित करते हैं, फिर भी विवाह के समय अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने को मजबूर होते हैं। यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा और समानता पर सीधा आघात है।
इसके अलावा महिलाएँ यौन हिंसा, बाल विवाह, मानव तस्करी, डायन-ब्रांडिंग और लैंगिक पूर्वाग्रह जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करती हैं। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अंधविश्वास और सामाजिक पिछड़ापन इन समस्याओं को और बढ़ाता है। यह दर्शाता है कि केवल आर्थिक विकास सामाजिक प्रगति की गारंटी नहीं दे सकता।
सच्चा सशक्तिकरण केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व या आर्थिक भागीदारी तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ है गरिमा, सुरक्षा, समान अवसर और स्वतंत्र निर्णय लेने की आज़ादी। आय अर्जित करने वाली महिला यदि घर में हिंसा झेलती है तो उसे पूर्णतः सशक्त नहीं कहा जा सकता।
इसलिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्य को मान्यता देना जितना ज़रूरी है, उतना ही महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना भी। शिक्षा, रोजगार, कानूनी जागरूकता और न्याय तक पहुँच विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ाई जानी चाहिए। कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन अपराधियों के लिए निवारक बनेगा और पीड़ितों को न्याय दिलाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय का संदेश स्पष्ट है: राष्ट्र निर्माण केवल संसद, उद्योग, सेना या प्रशासन तक सीमित नहीं है। परिवारों का पोषण और सामाजिक मूल्यों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है—और महिलाएँ इस प्रक्रिया की प्रमुख वास्तुकार हैं। लेकिन यदि वही महिलाएँ हिंसा, भेदभाव और असुरक्षा का सामना करती रहें तो सच्चा राष्ट्र निर्माण अधूरा रहेगा।
भारत के सामने आज चुनौती केवल महिलाओं के श्रम का आर्थिक मूल्य आँकने की नहीं, बल्कि उनके जीवन के अंतर्निहित मूल्य को पहचानने की है। एक ऐसा समाज जो गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानता है, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि वे भय में नहीं, गरिमा में जिएँ; मौन में नहीं, आवाज़ के साथ जिएँ; पीड़िता नहीं, बल्कि समान भागीदार बनकर राष्ट्र का भविष्य गढ़ें।
