Last Updated on June 29, 2026 1:17 am by INDIAN AWAAZ
भारत का आम उद्योग एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है।

अंदलीब अख्तर
दशकों से भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश बना हुआ है। वैश्विक आम उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग आधी मानी जाती है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सैकड़ों किस्मों के आम उगाए जाते हैं। भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में आम केवल एक मौसमी फल नहीं, बल्कि लाखों किसानों की आजीविका, ग्रामीण रोजगार और कृषि आधारित उद्योगों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। बागों से लेकर पैकिंग, प्रसंस्करण, परिवहन और निर्यात तक इसकी पूरी वैल्यू चेन करोड़ों रुपये की आर्थिक गतिविधियों को गति देती है।
लेकिन एक दिलचस्प विरोधाभास यह है कि दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद भारत वैश्विक आम निर्यात बाजार में अपनी वास्तविक क्षमता के अनुरूप स्थान नहीं बना सका है।
इसकी कई वजहें हैं। देश में पैदा होने वाले अधिकांश आमों की खपत घरेलू बाजार में ही हो जाती है, जिससे निर्यात योग्य मात्रा सीमित रह जाती है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजारों के कड़े फाइटोसैनिटरी (पौध स्वास्थ्य) मानक, कोल्ड चेन और आधुनिक लॉजिस्टिक्स की कमी, महंगी हवाई ढुलाई, गुणवत्ता में एकरूपता की चुनौती और बिखरी हुई आपूर्ति श्रृंखला ने भी भारतीय आमों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत कम उत्पादन वाले मेक्सिको, पेरू, थाईलैंड, ब्राज़ील और पाकिस्तान जैसे देश कई प्रीमियम बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बनाने में सफल रहे हैं।
अब यह तस्वीर बदलने लगी है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने कृषि निर्यात की अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता, ब्रांडिंग, भौगोलिक संकेतक (GI), आधुनिक पैक हाउस, कोल्ड चेन, वैज्ञानिक पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन और नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस परिवर्तन के केंद्र में है कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA), जिसने स्वयं को केवल एक निर्यात प्रोत्साहन संस्था तक सीमित नहीं रखा है।
आज APEDA राज्य सरकारों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), निर्यातकों, अनुसंधान संस्थानों और विदेशी खरीदारों के साथ मिलकर पूरे निर्यात तंत्र को मजबूत करने का काम कर रहा है। किसानों को बेहतर कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण देने से लेकर गुणवत्ता प्रमाणन, आधुनिक पैकिंग, विकिरण (इर्रेडिएशन) सुविधाओं, कोल्ड चेन और वैश्विक विपणन तक, संस्था भारतीय आमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
इस रणनीति का उद्देश्य केवल निर्यात बढ़ाना नहीं है। इसका वास्तविक लक्ष्य भारतीय आमों को दुनिया के प्रीमियम फलों की श्रेणी में स्थापित करना और किसानों को बेहतर कीमत दिलाना है।

हाल के महीनों में हुई कई घटनाएं इस दिशा में सकारात्मक संकेत देती हैं।
कुछ ही सप्ताह के भीतर भारत ने मध्य प्रदेश के जीआई-टैग प्राप्त रीवा सुंदरजा आम की पहली व्यावसायिक खेप संयुक्त अरब अमीरात भेजी, आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध बंगनपल्ली आम पहली बार समुद्री मार्ग से सिंगापुर निर्यात किए, आइसलैंड में भारतीय आमों के प्रचार का विशेष अभियान चलाया और अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन में आयोजित वार्षिक मैंगो फेस्टिवल के माध्यम से भारतीय आमों को अमेरिकी उपभोक्ताओं के सामने प्रस्तुत किया।
अलग-अलग देखने पर ये घटनाएं सामान्य निर्यात गतिविधियां लग सकती हैं, लेकिन इन्हें एक साथ देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल नए बाजारों की तलाश नहीं कर रहा, बल्कि अपने आमों को एक वैश्विक प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस अभियान की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक रही मध्य प्रदेश के रीवा सुंदरजा आम की पहली व्यावसायिक निर्यात खेप।
अपनी प्राकृतिक मिठास, सुगंध और रेशारहित गूदे के लिए प्रसिद्ध इस जीआई-टैग प्राप्त किस्म ने किसानों को भी बेहतर आर्थिक लाभ दिलाया। जहां स्थानीय बाजार में इसकी कीमत लगभग 100 से 110 रुपये प्रति किलोग्राम थी, वहीं निर्यातकों ने करीब 150 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य चुकाया। यानी किसानों को प्रति किलो 40 से 50 रुपये अतिरिक्त आय प्राप्त हुई। इससे यह भी साबित हुआ कि यदि भारतीय कृषि उत्पादों की सही ब्रांडिंग और गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए, तो वे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कहीं अधिक मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।
इसी प्रकार आंध्र प्रदेश से बंगनपल्ली आम की पांच मीट्रिक टन की पहली व्यावसायिक समुद्री खेप सिंगापुर भेजना भी भारतीय निर्यात रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
अब तक प्रीमियम आमों का अधिकांश निर्यात हवाई मार्ग से होता था, जिससे लागत काफी अधिक रहती थी। समुद्री परिवहन न केवल अपेक्षाकृत सस्ता है, बल्कि बड़े पैमाने पर निर्यात को भी संभव बनाता है और कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद करता है। वैज्ञानिक पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन, आधुनिक पैकेजिंग और कोल्ड चेन व्यवस्था के कारण आम पूरी गुणवत्ता के साथ सिंगापुर पहुंचे। वहां के आयातकों ने इनके स्वाद, समान रूप से पकने की क्षमता और लंबी शेल्फ लाइफ की सराहना की।
इस पहल का सीधा लाभ किसानों को भी मिला। घरेलू बाजार में जहां बंगनपल्ली आम लगभग 25–26 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहे थे, वहीं निर्यात मूल्य करीब 50 रुपये प्रति किलोग्राम रहा। इससे किसानों की आय लगभग दोगुनी हो गई।
भारत अब केवल पारंपरिक खाड़ी देशों या एशियाई बाजारों तक सीमित नहीं रहना चाहता।
इसी सोच के तहत APEDA और भारतीय दूतावास ने आइसलैंड में पहली बार भारतीय आमों का विशेष प्रचार अभियान चलाया। यहां दशहरी, चौसा, लंगड़ा और केसर जैसी प्रमुख किस्मों का प्रदर्शन किया गया। आइसलैंड भले ही छोटा बाजार हो, लेकिन उत्तरी यूरोप में भारतीय कृषि उत्पादों की पहचान बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, विशेषकर ऐसे समय में जब भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच आर्थिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है।
भारतीय आमों की वैश्विक ब्रांडिंग का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण हाल ही में अमेरिका में देखने को मिला।
वॉशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने APEDA, वाणिज्य विभाग और ड्यूपॉन्ट सर्किल बिजनेस इम्प्रूवमेंट डिस्ट्रिक्ट के सहयोग से वार्षिक मैंगो फेस्टिवल का आयोजन किया। इस आयोजन में सैकड़ों अमेरिकी उपभोक्ताओं ने अल्फांसो, केसर, दशहरी, लंगड़ा और बंगनपल्ली जैसी प्रीमियम भारतीय किस्मों का स्वाद चखा। बड़ी संख्या में लोगों ने इच्छा जताई कि भारतीय आम अमेरिका के सुपरमार्केट में अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध होने चाहिए।
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने कहा कि यह महोत्सव अब एक प्रमुख वार्षिक आकर्षण बन चुका है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि APEDA और स्वीकृत इर्रेडिएशन सुविधाओं की बदौलत अमेरिका को भारतीय आमों का निर्यात लगातार बढ़ रहा है।
वॉशिंगटन का यह आयोजन इस बात का संकेत है कि भारत की रणनीति अब केवल आम निर्यात तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य दुनिया के बड़े उपभोक्ता बाजारों में ‘ब्रांड इंडिया’ की पहचान मजबूत करना, नए ग्राहकों तक पहुंच बनाना और भारतीय आमों के लिए दीर्घकालिक मांग तैयार करना भी है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब अधिक आम पैदा करना नहीं है, क्योंकि उत्पादन के मामले में वह पहले ही दुनिया में अग्रणी है। वास्तविक चुनौती यह है कि वह अपने उच्च गुणवत्ता वाले आमों का अधिक से अधिक मूल्यवर्धित निर्यात करे, नए बाजारों में स्थायी स्थान बनाए और इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ किसानों तक पहुंचे।
यदि वर्तमान रणनीति इसी गति से आगे बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में भारतीय आम केवल दुनिया का सबसे अधिक उत्पादित फल नहीं रहेगा, बल्कि वह भारत के सबसे सफल कृषि निर्यात ब्रांडों में भी शामिल हो सकता है।
