अंदलीब अख्तर

भारतीय राजनीति में किसी भी दल को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली ताकत बनने के लिए वर्षों की मेहनत, मजबूत संगठन और व्यापक जनाधार की आवश्यकता होती है। लेकिन नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) का मामला इस स्थापित राजनीतिक परंपरा को चुनौती देता नजर आ रहा है।

एक ऐसी पार्टी, जिसे अपने एकमात्र चुनावी मुकाबले में केवल 822 वोट मिले थे और जिसने महज 1.13 लाख रुपये का चंदा जुटाया था, अब लोकसभा की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बनने की दहलीज पर खड़ी है। यदि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लगभग 20 बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी मिल जाती है, तो भारतीय राजनीति का शक्ति संतुलन अप्रत्याशित रूप से बदल सकता है।

इस घटनाक्रम ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा की है, बल्कि दल-बदल कानून, संसदीय परंपराओं और भाजपा की संभावित भूमिका को लेकर भी व्यापक बहस छेड़ दी है।

नगण्य चुनावी मौजूदगी से राष्ट्रीय सुर्खियों तक

जनवरी 2023 में चुनाव आयोग द्वारा पंजीकृत एक “पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल” (आरयूपीपी) के रूप में अस्तित्व में आई एनसीपीआई की चुनावी यात्रा अब तक बेहद सीमित रही है।

पार्टी ने अपना पहला और अब तक का एकमात्र चुनाव 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लड़ा था। सात उम्मीदवार उतारने की कोशिश के बावजूद चार उम्मीदवारों के नामांकन रद्द हो गए और केवल दो प्रत्याशी मैदान में रह सके।

चावमनु विधानसभा सीट पर पार्टी को 536 वोट मिले, जबकि कैलाशहर सीट पर 286 वोट प्राप्त हुए। इस प्रकार दोनों उम्मीदवारों को कुल मिलाकर केवल 822 वोट मिले। एक निर्दलीय उम्मीदवार, जिसे पार्टी समर्थक माना गया, को जोड़ने पर भी कुल वोट संख्या 1,198 से आगे नहीं बढ़ी।

पार्टी न तो कोई सीट जीत सकी और न ही किसी क्षेत्र में उल्लेखनीय राजनीतिक प्रभाव छोड़ सकी।

वित्तीय दृष्टि से भी पार्टी की स्थिति अत्यंत सीमित रही है। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, एनसीपीआई को अब तक कुल लगभग 1.13 लाख रुपये का चंदा प्राप्त हुआ है। यह राशि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों की तुलना में बेहद मामूली है।

इसके बावजूद यदि प्रस्तावित विलय को मंजूरी मिलती है, तो बिना कोई लोकसभा सीट जीते एनसीपीआई सीधे 20 सांसदों वाली पार्टी बन जाएगी।

लोकसभा का राजनीतिक गणित बदल सकता है

प्रस्तावित विलय का असर केवल एक पार्टी की हैसियत तक सीमित नहीं रहेगा। करीब 20 सांसदों के साथ एनसीपीआई लोकसभा में भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके के बाद पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। इसके साथ ही वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर भी प्रमुख सहयोगी दलों में शामिल हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति संसदीय राजनीति में बेहद असामान्य है। आमतौर पर किसी दल को इतने सांसदों तक पहुंचने के लिए वर्षों की चुनावी मेहनत करनी पड़ती है, जबकि यहां एक ऐसा दल अचानक राष्ट्रीय शक्ति केंद्र के रूप में उभर रहा है जिसका जनाधार लगभग नगण्य रहा है।

यह घटनाक्रम एनडीए को संसद में अतिरिक्त ताकत भी प्रदान कर सकता है, जिससे सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों के पारित होने में अपेक्षाकृत अधिक सुविधा मिल सकती है।

पति-पत्नी की जोड़ी के हाथ में पार्टी की कमान

एनसीपीआई की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू पार्टी का नेतृत्व है। पार्टी अध्यक्ष उत्तिया कुंडू और कोषाध्यक्ष शेउली कुंडू—पति-पत्नी की यह जोड़ी पार्टी के संचालन के केंद्र में है। संगठनात्मक ढांचे और पार्टी दस्तावेजों के अनुसार, पार्टी के अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय इन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं।

हालांकि विवाद तब गहरा गया जब पार्टी के संस्थापक शांतनु डे ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि उन्हें प्रस्तावित विलय की कोई जानकारी नहीं थी।

डे का आरोप है कि पार्टी नेतृत्व ने संगठन के अन्य पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिए बिना यह फैसला किया। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर इस विषय पर कोई व्यापक चर्चा नहीं हुई और न ही संविधान सम्मत प्रक्रिया अपनाई गई।

संस्थापक और वर्तमान नेतृत्व के बीच इस मतभेद ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

दल-बदल कानून पर उठ रहे सवाल

राजनीतिक विवाद के साथ-साथ इस पूरे मामले ने संवैधानिक और कानूनी बहस को भी जन्म दिया है। संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है, राजनीतिक दलों के विलय और सांसदों के समूहगत स्थानांतरण के लिए कुछ स्पष्ट शर्तें निर्धारित करती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय इस मामले में निर्णायक होगा। यह देखा जाएगा कि क्या टीएमसी के बागी सांसद दल-बदल कानून के तहत संरक्षण पाने की पात्रता रखते हैं या नहीं।

विशेषज्ञों के अनुसार, चूंकि जिन सांसदों का विलय प्रस्तावित है वे किसी स्थापित संसदीय दल के बजाय एक ऐसे संगठन में शामिल हो रहे हैं जिसकी संसद में पहले कोई मौजूदगी नहीं थी, इसलिए यह मामला भविष्य के राजनीतिक घटनाक्रमों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

भाजपा की भूमिका पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

इस पूरे प्रकरण का सबसे विवादास्पद पहलू भाजपा की कथित भूमिका को लेकर उठे सवाल हैं। राजनीतिक चर्चाओं को उस समय और बल मिला जब खबरें सामने आईं कि कई बागी टीएमसी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठकें की थीं। इन बैठकों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी की खबरों ने विपक्षी दलों के संदेह को और मजबूत किया।

कांग्रेस ने इस मामले में सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि भाजपा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने टीएमसी में टूट को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने कहा कि बेहद सीमित जनाधार वाली पार्टी का अचानक एनडीए की प्रमुख सहयोगी बन जाना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

कांग्रेस का तर्क है कि यह घटनाक्रम मतदाताओं के जनादेश की भावना के विपरीत है और स्थापित राजनीतिक दलों को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।

हालांकि भाजपा ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि टीएमसी के भीतर असंतोष और विभाजन पूरी तरह उस पार्टी का आंतरिक मामला है। उनका दावा है कि भाजपा का इन घटनाओं से कोई संबंध नहीं है और विपक्ष राजनीतिक कारणों से अनावश्यक आरोप लगा रहा है।

भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा

एनसीपीआई का यह उभार भारतीय राजनीति की सबसे असाधारण घटनाओं में से एक बन सकता है। समर्थकों के अनुसार, यह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा राजनीतिक पुनर्संरेखण (री-अलाइनमेंट) का वैध प्रयास है। वहीं आलोचकों का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक जनादेश, राजनीतिक नैतिकता और दल-बदल कानून की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय पर टिकी हैं। यदि विलय को मंजूरी मिलती है, तो केवल 822 वोट हासिल करने वाली एक छोटी-सी पार्टी का सीधे 20 सांसदों वाली संसदीय ताकत में बदल जाना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे अनोखी राजनीतिक कहानियों में दर्ज होगा।