
— प्रदीप शर्मा
वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय बढ़ती अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रही है। अमेरिका–इस्राइल–ईरान तनाव, ऊर्जा कीमतों में उछाल और वैश्विक व्यापार मार्गों में बाधाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे हालात में केवल आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आम नागरिकों को महंगाई के दबाव से राहत देना भी उतना ही जरूरी है।
बाहरी संकटों के साथ घरेलू स्तर पर भी चिंता बढ़ी है। केंद्रीय बैंक ने अल-नीनो के प्रभाव और कमजोर मानसून की आशंका जताई है, जिससे आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। इससे खुदरा कीमतों पर दबाव और बढ़ने की संभावना है।
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकार का वर्तमान फोकस विकास दर को गति देना है, लेकिन यदि इसके साथ महंगाई नियंत्रण के प्रयास मजबूत नहीं हुए तो आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। पेट्रोलियम उत्पादों और घरेलू व व्यावसायिक एलपीजी की कीमतों में हालिया वृद्धि ने पहले से दबाव झेल रहे परिवारों की चिंताओं को और बढ़ाया है।
हालांकि, भारत के पास कुछ मजबूत आधार भी हैं—घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे में निवेश और तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था। ये कारक वैश्विक अस्थिरता के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। फिर भी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयात बिल और रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं।
ऐसे समय में नीति-निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक वृद्धि और मुद्रास्फीति नियंत्रण के बीच संतुलन स्थापित करना है। राजकोषीय अनुशासन, कमजोर वर्गों को राहत और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से ही विकास और मूल्य स्थिरता दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। सरकार और केंद्रीय बैंक को ऐसे व्यावहारिक कदम उठाने होंगे, जिससे विकास की गति भी बनी रहे और आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो।
