Last Updated on September 15, 2025 6:23 pm by INDIAN AWAAZ

स्टाफ रिपोर्टर / नई दिल्ली |

आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर दिए गए अंतरिम फ़ैसले को अधूरा और असंतोषजनक बताते हुए निराशा जताई है।

बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. एस.क्यू.आर. इलियास ने कहा कि यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने संशोधन की कुछ धाराओं पर रोक लगाई है, लेकिन मुस्लिम समाज, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और न्यायप्रिय नागरिकों को उम्मीद थी कि संविधान के मूल प्रावधानों के ख़िलाफ़ जाने वाली सभी धाराओं पर रोक लगेगी। उन्होंने कहा कि आंशिक राहत ज़रूर मिली है, लेकिन व्यापक संवैधानिक चिंताओं को संबोधित न किए जाने से निराशा हुई है।

डॉ. इलियास ने आगे कहा कि कई महत्वपूर्ण धाराएँ, जो स्पष्ट रूप से समुदाय की समझ और अधिकारों के विरुद्ध हैं, अंतरिम आदेश में स्थगित नहीं की गईं। अंतिम निर्णय आना बाक़ी है, लेकिन सरकारी अमलों के पक्षपातपूर्ण रवैये को देखते हुए यह आशंका है कि इन धाराओं का दुरुपयोग किया जाएगा।

बोर्ड का कहना है कि यह पूरा संशोधन अधिनियम वक़्फ़ संपत्तियों को कमज़ोर करने और हड़पने की सोची-समझी रणनीति है। इसीलिए इसकी पूर्ण वापसी और पुराने वक़्फ़ अधिनियम की बहाली आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरे अधिनियम पर रोक न लगाने के कारण कई हानिकारक धाराएँ लागू रहेंगी, जिनमें यूज़र वक़्फ़ की मान्यता समाप्त करना और वक़्फ़ डीड को अनिवार्य करना शामिल है, जो इस्लामी क़ानून के सिद्धांतों के विपरीत है।

डॉ. इलियास ने बताया कि बोर्ड का “सेव वक़्फ़ अभियान” पूरी ताक़त से जारी रहेगा। 1 सितंबर 2025 से शुरू हुआ दूसरा चरण धरनों, प्रदर्शनों, वक़्फ़ मार्च, ज्ञापन सौंपने, नेतृत्व गिरफ्तारी, गोलमेज़ बैठकों, अंतरधार्मिक संवादों और प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चलाया जा रहा है। यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन 16 नवंबर 2025 को दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली के साथ अपने चरम पर पहुँचेगा, जिसमें पूरे देश से लोग शामिल होंगे।


अभी हमारी लड़ाई समाप्त नहीं हुई है:मौलाना अरशद मदनी

जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने अदालत के फ़ैसले का स्वागत किया और इसके लिए अदालत का शुक्रिया अदा किया कि नए क़ानून की जिन धाराओं को लेकर पूरे देश के मुसलमानों की ओर से चिंताएँ और गंभीर आशंकाएँ जताई जा रही थीं, अदालत ने उन्हें गंभीरता से महसूस किया और उनमें से तीन धाराओं पर अंतरिम रोक लगा दी।

मौलाना मदनी ने कहा कि अभी हमारी लड़ाई समाप्त नहीं हुई है। जमीयत उलमा-ए-हिंद इस काले क़ानून के निरस्तीकरण तक अपनी क़ानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेगी। यह नया वक़्फ़ क़ानून देश के संविधान पर सीधा हमला है, जो नागरिकों और अल्पसंख्यकों को न केवल समान अधिकार प्रदान करता है बल्कि उन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता भी देता है। यह क़ानून मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी छीन लेने की संविधान-विरोधी एक ख़तरनाक साज़िश है।

इसलिए जमीयत उलमा-ए-हिंद ने वक़्फ़ कानून 2025 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। हमें यक़ीन है कि सुप्रीम कोर्ट इस काले क़ानून को समाप्त करके हमें पूर्ण संवैधानिक न्याय देगा, इंशा अल्लाह।

अंत में मौलाना मदनी ने अपने वक़ीलों, विशेष रूप से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल का शुक्रिया अदा किया और कहा कि हमारे वक़ीलों ने ठोस बहस करके अदालत को यह समझाने में सफलता पाई कि वक़्फ़ क़ानून में किए गए संशोधन न केवल वक़्फ़ संपत्तियों के लिए ख़तरनाक हैं बल्कि ये असंवैधानिक भी हैं और इस तरह मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता पर गहरी चोट पहुँचाई गई है।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से मिले कुछ प्रमुख राहतें

1. संपत्ति अधिकारों का संरक्षण:
अदालत ने कहा कि वक़्फ़ संपत्तियों को अंतिम फ़ैसले तक न तो बेदख़ल किया जाएगा और न ही राजस्व रिकॉर्ड में कोई बदलाव होगा। अदालत ने उस प्रावधान पर रोक लगाई जिसके तहत किसी सरकारी अधिकारी की रिपोर्ट पर वक़्फ़ स्वामित्व निर्भर था।

2. मनमाने अधिकारों पर रोक:
अदालत ने धारा 3सी को निलंबित कर दिया और स्पष्ट किया कि कोई भी सरकारी अधिकारी अकेले यह तय नहीं कर सकता कि वक़्फ़ बनाने का अधिकारी कौन है। साथ ही, उस शर्त पर भी रोक लगाई गई जिसमें कहा गया था कि जाँच के दौरान संपत्ति को वक़्फ़ मानना बंद किया जा सकता है। अब वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के अंतिम फ़ैसले तक किसी भी वक़्फ़ संपत्ति में कोई बदलाव नहीं होगा।

3. शक्तियों का पृथक्करण:
अदालत ने कहा कि राजस्व अधिकारी को संपत्ति के स्वामित्व का निर्धारण करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है।

4. गैर-मुस्लिम सदस्यों की भागीदारी:
धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की आशंका को देखते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्रीय वक़्फ़ परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्य 22 में से 4 से अधिक नहीं होंगे और राज्य वक़्फ़ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्य 11 में से अधिकतम 3 ही हो सकते हैं।

5. पाँच वर्ष से मुस्लिम होने की शर्त:
अदालत ने उस धारा पर भी रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि वक़्फ़ बनाने वाला व्यक्ति कम-से-कम पाँच वर्ष से मुस्लिम होने का प्रमाण दे। यह आदेश तब तक प्रभावी रहेगा जब तक सरकार इस विषय पर नियम नहीं बनाती।