Last Updated on June 8, 2026 12:58 am by INDIAN AWAAZ

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) केवल पृथ्वी को गर्म करने वाली ग्रीनहाउस गैसों की चिन्ताजनक मात्रा के लिए ही ज़िम्मेदार नहीं है. इस तकनीक का पर्यावरणीय प्रभाव भी तेज़ी से बढ़ रहा है, जिससे पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को चलाने वाले वैश्विक ढाँचे – यानि डेटा केन्द्रों में वर्ष 2030 तक हर साल 945 टेरावाट-घंटे बिजली की खपत होने की सम्भावना है.
यह आँकड़ा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल वार्षिक बिजली खपत से लगभग तीन गुना अधिक है. इन तीनों देशों में मिलाकर 65 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं.
लेकिन यह समस्या का केवल एक हिस्सा है. डेटा केन्द्रों में इस्तेमाल होने वाली बिजली से कार्बन उत्सर्जन होता है. साथ ही, इसका “जल प्रभाव” भी होता है, क्योंकि शीतलन और ऊर्जा उत्पादन में पानी इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा, बिजली उत्पादन और आपूर्ति श्रृँखलाओं से जुड़ा “भूमि प्रभाव” भी होता है.
स्थिरता को मापने का नया तरीक़ा
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (UNU) के एक नए अध्ययन के अनुसार, इस दशक के अन्त तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी पानी की खपत, 1.3 अरब लोगों की बुनियादी वार्षिक घरेलू ज़रूरतों के बराबर हो सकती है.
वहीं, इसका भूमि प्रभाव साढ़े 14 वर्ग किलोमीटर से अधिक हो सकता है, जोकि जकार्ता महानगरीय क्षेत्र के लगभग दोगुने आकार के बराबर है.

रिपोर्ट में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पर्यावरणीय प्रभाव को मापने के तरीक़े में एक बड़ी कमी उजागर की गई है. आमतौर पर ध्यान ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर रहता है, विशेषकर बड़े मॉडलों को प्रशिक्षित करने से जुड़े उत्सर्जन पर. लेकिन इससे पानी, भूमि और अन्य संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव अक्सर नज़रअन्दाज़ हो जाता है.
एक नज़र में “हरित” लगने वाले समाधान, दूसरे क्षेत्रों में दबाव बढ़ा सकते हैं, ख़ासतौर पर उन इलाक़ों में जहाँ संसाधन पहले से ही सीमित हैं. उदाहरण के लिए, कुछ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत कार्बन उत्सर्जन तो घटा सकते हैं, लेकिन पानी की खपत और भूमि उपयोग बढ़ा सकते हैं.
रोज़मर्रा का उपयोग, सबसे बड़ा कारण
अब तक ज़्यादातर चर्चा उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडलों को प्रशिक्षित करने में लगने वाली ऊर्जा पर केन्द्रित रही है. लेकिन अध्ययन के अनुसार, कुल ऊर्जा माँग का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा इनके रोज़मर्रा के उपयोग पर ख़र्च होता है.
इसका पैमाना बहुत बड़ा है. व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता सेवा के बारे में अनुमान है कि वह हर दिन लगभग 2.5 अरब संकेतों को संसाधित करती है, जिसके लिए हर साल सैकड़ों गीगावाट-घंटे बिजली की ज़रूरत होती है.
ऊर्जा की खपत इस बात पर भी निर्भर करती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कौन-सा काम कराया जा रहा है. एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता चित्र तैयार करने में, साधारण पाठ वर्गीकरण की तुलना में हज़ार गुना से अधिक ऊर्जा लग सकती है. वीडियो तैयार करने में इससे भी अधिक संसाधन लगते हैं.
स्थानीय बोझ, वैश्विक लाभ
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े ढाँचे का पर्यावरणीय असर हर जगह समान नहीं है. इस तकनीक के लाभ दुनिया भर में दिखाई देते हैं, लेकिन इसकी क़ीमत अक्सर कुछ विशेष क्षेत्रों को चुकानी पड़ती है.
कुछ देशों में डेटा केन्द्र पहले ही राष्ट्रीय बिजली खपत का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे ऊर्जा प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है. कुछ जगहों पर नए डेटा केन्द्र पानी की आपूर्ति पर भी भारी दबाव डाल रहे हैं, कई बार तो कुछ ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पहले से सूखे की स्थिति है.

रिपोर्ट में इलैक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती चुनौती को लेकर भी चेतावनी दी गई है. अनुमान है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़ा ढाँचा वर्ष 2030 तक हर साल 25 लाख टन तक इलैक्ट्रॉनिक कचरा पैदा कर सकता है. इसका बड़ा बोझ निम्न-आय वाले उन देशों पर पड़ सकता है, जहाँ सुरक्षित निपटान की क्षमता सीमित है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरणों के लिए ज़रूरी महत्वपूर्ण खनिजों का उत्पादन भी चिन्ता बढ़ाता है, क्योंकि इससे खनन क्षेत्रों में पर्यावरणीय नुक़सान और सामाजिक असमानताएँ बढ़ सकती हैं.
बढ़ती डिजिटल एवं पर्यावरणीय खाई
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से जुड़े ढाँचे का विस्तार नई असमानताएँ भी पैदा कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए ज़रूरी विशेष कम्प्यूटिंग क्षमता का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल दो देशों – संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन में केन्द्रित है. वहीं, 150 से अधिक देशों के पास कोई अहम घरेलू एआई संरचना नहीं है.
यह असन्तुलन आर्थिक अवसरों को सीमित करता है और पर्यावरणीय न्याय से जुड़े सवाल भी उठाता है. कुछ देशों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से होने वाले पर्यावरणीय नुक़सान का बोझ उठाना पड़ता है, लेकिन उसके लाभों और आर्थिक विकास में उन्हें बराबर हिस्सा नहीं मिल पाता.
ज़िम्मेदार कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर
इन गम्भीर निष्कर्षों के बावजूद, UNU के शोधकर्ताओं का कहना है कि यह रिपोर्ट एआई के ख़िलाफ़ नहीं है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करने की अपील करना है कि यह तकनीक, पृथ्वी के संसाधनों की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए विकसित हो.
अध्ययन में “ज़िम्मेदार कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र” की रूपरेखा दी गई है. यह रूपरेखा, पारदर्शिता, शुरूआत से ही दक्षता, समानता, पूरे जीवन-चक्र की ज़िम्मेदारी, वैश्विक सहयोग और टिकाऊ उपयोग जैसे सिद्धान्तों पर आधारित है.
सरकारों से कहा गया है कि वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े ढाँचे को ऊर्जा, जल और भूमि उपयोग की योजनाओं में शामिल करें. कम्पनियों को भी ऐसे तंत्र विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, जिनमें संसाधनों की खपत कम से कम हो.
उपयोगकर्ताओं की भी भूमिका है. वे जहाँ सम्भव हो, कम पर्यावरणीय प्रभाव वाले अनुप्रयोगों का चयन कर सकते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य केवल तकनीकी नवाचार पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि आज लिए जाने वाले नीतिगत और शासन सम्बन्धी निर्णयों पर भी निर्भर करेगा. UN NEWS
