Last Updated on October 13, 2026 3:12 pm by INDIAN AWAAZ
दूध से लेकर घी, गोबर और गोमूत्र तक की बाजार में मांग; उत्तर भारत के किसानों के लिए कमाई का नया अवसर बन रही देशी नस्ल की गिर गाय

रिपोर्ट: पंकज यादव
गुजरात के गिर क्षेत्र के जंगलों से निकलकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान की गोशालाओं तक पहुंची गिर गाय आज देशभर के पशुपालकों के बीच आकर्षण का केंद्र बनती जा रही है। अपनी विशिष्ट शारीरिक बनावट, शांत स्वभाव, दूध उत्पादन की क्षमता और विभिन्न मौसमी परिस्थितियों के अनुकूल ढलने की खूबी के कारण इस देशी नस्ल की मांग लगातार बढ़ रही है।
गिर गाय की लोकप्रियता की कहानी केवल दूध तक सीमित नहीं है। इसके दूध से तैयार होने वाले दही, छाछ, मक्खन और घी के अलावा गोबर तथा गोमूत्र से जुड़े उत्पाद भी बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं। यही वजह है कि कई किसान इसे पशुपालन के क्षेत्र में कमाई के एक नए अवसर के रूप में देख रहे हैं।
170 रुपये किलो तक बिक रहा गिर गाय का दूध
उत्तर भारत में आमतौर पर भैंस के दूध की कीमत गाय के दूध से अधिक होती है। स्थानीय डेयरियों में जहां भैंस का दूध करीब 80 से 85 रुपये प्रति किलो और सामान्य नस्ल की गाय का दूध 55 से 60 रुपये प्रति किलो तक मिल जाता है, वहीं दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सटे हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में गिर गाय का दूध 120 से 170 रुपये प्रति किलो तक बिकने की बात सामने आ रही है।
इस ऊंची कीमत की प्रमुख वजहों में गिर गाय के दूध को लेकर उपभोक्ताओं की बढ़ती दिलचस्पी और ए-2 दूध के रूप में इसकी बाजार में होने वाली ब्रांडिंग शामिल है।
ए-2 दूध में बीटा-केसीन प्रोटीन का एक विशेष प्रकार पाया जाता है। गिर गाय के दूध को अक्सर ए-2 दूध के रूप में बेचा जाता है, हालांकि दूध की वास्तविक संरचना अलग-अलग पशुओं के अनुसार बदल सकती है। ए-2 दूध के सभी स्वास्थ्य संबंधी दावे वैज्ञानिक रूप से निर्णायक तौर पर प्रमाणित नहीं हैं।
इसके बावजूद देशी नस्लों के दूध के प्रति बढ़ते आकर्षण ने गिर गाय के दूध को प्रीमियम बाजार में जगह दिलाई है। किसानों और डेयरी संचालकों के लिए यह एक ऐसा बाजार है, जहां दूध की गुणवत्ता, नस्ल की पहचान और ग्राहकों का भरोसा कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दूध ही नहीं, घी और छाछ से भी हो रही अच्छी कमाई
गिर गाय के व्यवसाय में कमाई का दायरा केवल दूध बेचने तक सीमित नहीं है। इसके दूध से तैयार होने वाले छाछ, मक्खन और घी की भी बाजार में मांग है।
गुरुग्राम जिले के सोहना के पास स्थित एक गिर गाय की गोशाला में छाछ करीब 70 रुपये प्रति लीटर बेचे जाने की जानकारी है। वहीं, गिर गाय के दूध से तैयार घी की कीमत लगभग 4,500 रुपये प्रति किलो बताई जाती है।
इसके अलावा गोबर और गोमूत्र से जुड़े उत्पाद भी कुछ बाजारों में बेचे जा रहे हैं। कारोबार से जुड़े लोगों के अनुसार, गिर गाय के गोबर से भरी एक ट्रैक्टर-ट्रॉली की कीमत लगभग 50,000 से 60,000 रुपये तक हो सकती है, जबकि गोमूत्र 15 से 20 रुपये प्रति लीटर के भाव से बेचे जाने की बात कही जाती है।
हालांकि, इन उत्पादों की वास्तविक कीमत उनकी मात्रा, गुणवत्ता, प्रसंस्करण, स्थानीय मांग और बिक्री के तरीके पर निर्भर करती है।
कई किसान गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल पारंपरिक कृषि पद्धतियों में भी करते हैं। गोबर से जैविक खाद तथा अन्य कृषि उत्पाद तैयार किए जाते हैं। लेकिन फसल की पैदावार कई गुना बढ़ाने या गंभीर बीमारियों का इलाज करने जैसे दावों को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए।
कम खर्च और बेहतर प्रबंधन से बढ़ सकती है पशुपालन की आमदनी
गिर गाय की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे इसकी उपयोगिता और बाजार में मिल रही पहचान दोनों महत्वपूर्ण हैं। इस नस्ल को सामान्यतः शांत स्वभाव, विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में अनुकूलन और दूध उत्पादन की क्षमता के लिए जाना जाता है।
अन्य देशी नस्लों की तुलना में किसी गिर गाय को कितना चारा चाहिए और वह कितना दूध देगी, यह उसके स्वास्थ्य, उम्र, आनुवंशिक गुणों, आहार और देखभाल पर निर्भर करता है। इसलिए केवल नस्ल के आधार पर कम खर्च या अधिक मुनाफे की गारंटी नहीं दी जा सकती।
केंद्र सरकार भी देशी गोवंश के संरक्षण और विकास के लिए राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजनाएं चला रही है। इन प्रयासों का उद्देश्य देशी नस्लों का संरक्षण, उनका आनुवंशिक सुधार और पशुपालन क्षेत्र में उनकी उपयोगिता बढ़ाना है।
एक गिर गाय से प्रति दुग्धकाल औसतन 1,500 से 2,000 लीटर दूध मिलने का आंकड़ा बताया जाता है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन पशु की नस्लीय विशेषताओं, पोषण, स्वास्थ्य और रखरखाव के अनुसार काफी अलग हो सकता है।
पशुपालन विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी नस्ल के साथ संतुलित आहार, समय पर टीकाकरण, पशु चिकित्सकीय देखभाल, साफ-सुथरा आवास और बेहतर प्रजनन प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।
कैसे पहचानें गिर गाय?
गिर गाय भारत की प्रमुख देशी दुग्ध उत्पादक नस्लों में शामिल है। इसका मूल क्षेत्र गुजरात का गिर वन और उसके आसपास का इलाका माना जाता है।
इसकी खास शारीरिक बनावट इसे दूसरी नस्लों से अलग पहचान देती है। इसके शरीर का रंग लाल, लाल-भूरा, सफेद, हल्का भूरा या चितकबरा हो सकता है। इसके लंबे और नीचे की ओर झुके कान, उभरा हुआ माथा तथा पीछे की ओर मुड़ने वाले सींग इसकी प्रमुख पहचान हैं।
गिर गाय को उसकी अनुकूलन क्षमता, शांत स्वभाव और दुग्ध उत्पादन की संभावनाओं के लिए जाना जाता है। यही विशेषताएं इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पशुपालकों के बीच लोकप्रिय बना रही हैं।
हालांकि, गिर गाय खरीदने वाले किसानों के लिए जरूरी है कि वे पशु की सेहत, वास्तविक दूध उत्पादन, उम्र, प्रजनन इतिहास और उपलब्ध पशु चिकित्सा सुविधाओं की जांच करने के बाद ही खरीदारी करें।
15 साल पहले गुरुग्राम में दो गिर गाय लेकर आए थे चांद सिंह यादव
गुरुग्राम के वजीराबाद गांव के प्रमुख जमीन मालिक चांद सिंह यादव के लिए गिर गाय की लोकप्रियता की कहानी करीब 15 साल पहले शुरू हुई थी।
उस समय उनके इलाके में बहुत कम लोग गिर गाय के बारे में जानते थे। एक अच्छी देशी गाय की तलाश उन्हें गुजरात के गिर सोमनाथ तक ले गई। वहां से वह दो गिर गाय खरीदकर हरियाणा ले आए।
अपने शुरुआती अनुभव को याद करते हुए चांद सिंह यादव बताते हैं, “करीब 15 साल पहले मैं एक अच्छी देशी गाय की तलाश कर रहा था। उस समय मेरे एक मित्र ने पहली बार मुझे गिर गाय के बारे में बताया और उसके दूध की खूबियों की जानकारी दी। मैं खुद किसान परिवार से हूं, इसलिए गिर गाय के बारे में जानने की उत्सुकता इतनी बढ़ गई कि मैं अपनी कार लेकर गुजरात के लिए निकल पड़ा।”
उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों की मदद से वह गिर सोमनाथ पहुंचे और वहां के अलग-अलग गांवों में घूमकर गिर गाय की तलाश की।
चांद सिंह यादव के मुताबिक, “आखिरकार मैंने वहां से दो गिर गाय खरीदीं और उन्हें अपने गांव ले आया। उस समय हमारे इलाके में कोई भी गिर गाय के बारे में नहीं जानता था।”
उनकी यह कहानी बताती है कि किस तरह कुछ किसानों की व्यक्तिगत पहल ने देशी नस्लों को उनके पारंपरिक क्षेत्रों से बाहर पहचान दिलाने में भूमिका निभाई।
भारत से ब्राजील तक पहुंची गिर गाय, विदेशी डेयरी उद्योग में भी बनाई पहचान
गिर गाय की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं है। ब्राजील के डेयरी उद्योग में भी भारतीय मूल की इस नस्ल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इस कहानी का एक प्रमुख अध्याय 1958 में शुरू हुआ, जब ब्राजील के पशुपालक सेल्सो गार्सिया सिड ने भारत से अच्छी नस्ल के गिर पशु मंगाने की पहल की। इसके लिए गुजरात में प्रतिनिधि भेजा गया, जिसने कृष्णा नाम के एक गिर सांड की पहचान की। बताया जाता है कि यह सांड भावनगर के तत्कालीन महाराजा कृष्णकुमार सिंह के पशुधन का हिस्सा था।
वर्ष 1960 में कृष्णा नाम के इस सांड को ब्राजील ले जाया गया। वहां उसके आनुवंशिक गुणों का इस्तेमाल प्रजनन कार्यक्रमों में किया गया। कृत्रिम गर्भाधान और चयनित प्रजनन के माध्यम से ब्राजील में गिर नस्ल के पशुओं की वंशावली को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
समय के साथ भारतीय गिर नस्ल और होल्स्टीन नस्ल के संकरण से गिरोलैंडो नस्ल विकसित हुई। आज गिरोलैंडो ब्राजील की महत्वपूर्ण दुग्ध उत्पादक नस्लों में गिनी जाती है।
गिर गाय की यह अंतरराष्ट्रीय यात्रा भारतीय देशी नस्लों की उस क्षमता को दर्शाती है, जिसने विदेशों में भी पशुपालन और डेयरी विकास में योगदान दिया है।
गिर गाय को बढ़ावा देने के लिए देशभर में ‘गौ राष्ट्र यात्रा’
देशी गोवंश की उपयोगिता और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए जयपुर के इंजीनियर भारत सिंह राजपुरोहित ने एक अलग पहल शुरू की है। वह पिछले करीब एक साल से ‘गौ राष्ट्र यात्रा’ के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में घूम रहे हैं।
इस दौरान वह गांव-गांव जाकर लोगों को पशुपालन के प्रति जागरूक कर रहे हैं। साथ ही अलग-अलग राज्यों की बड़ी गोशालाओं में जाकर गोपालकों से बातचीत करते हैं और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं।
भारत सिंह राजपुरोहित का कहना है कि इस यात्रा का उद्देश्य देश में गोपालन के प्रति जागरूकता बढ़ाना और नई पीढ़ी को पशुपालन से जोड़ना है।
उन्होंने कहा, “हमारी यात्रा का उद्देश्य लोगों में गोपालन के प्रति जागरूकता पैदा करना है। मेरा मानना है कि हमारे देश में गोपालन एक स्टेटस सिंबल बनना चाहिए।”
वह कहते हैं, “पहले लोग अपने घरों में गाय रखते थे। बेटियों की शादी में भी कई परिवार गाय दान करते थे। लेकिन आज पशुपालन में लोगों की रुचि कम होने के कारण घरों में गाय पालने की परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। हमारा प्रयास है कि देश के युवा और किसान फिर से गोपालन की ओर लौटें।”
राजपुरोहित गोपालन को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधि नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ा विषय मानते हैं।
नए पशुपालकों की मदद भी करती है गौ राष्ट्र यात्रा
भारत सिंह राजपुरोहित के मुताबिक, गौ राष्ट्र यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य पशुपालकों की व्यावहारिक समस्याओं का समाधान तलाशना भी है।
उन्होंने बताया कि उनकी टीम नए गोपालकों को पशुपालन से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराती है। जरूरत के अनुसार अच्छे सांडों के चयन, प्रजनन संबंधी व्यवस्थाओं और गोशालाओं के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की तलाश में भी मदद की जाती है।
उनका मानना है कि देशी गाय पालने के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए केवल प्रचार पर्याप्त नहीं है। पशुपालकों को सही जानकारी, अच्छी देखभाल की व्यवस्था, उचित बाजार और आर्थिक रूप से टिकाऊ व्यवसाय का अवसर भी मिलना चाहिए।
गिर गाय इतनी लोकप्रिय कैसे हुई? मार्केटिंग भी बड़ी वजह
जब भारत सिंह राजपुरोहित से पूछा गया कि गिर गाय देशभर में इतनी लोकप्रिय क्यों हो रही है, तो उन्होंने इसके पीछे मार्केटिंग और ऐतिहासिक पहचान को भी महत्वपूर्ण कारण बताया।
उनका कहना है कि भारत की सभी देशी गायों की अपनी विशेषताएं और उपयोगिता हैं। लेकिन गुजरात के राजाओं और रियासतों में गिर गाय को लंबे समय तक विशेष महत्व मिलने के कारण इसकी अलग पहचान बनी और धीरे-धीरे यह प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई।
राजपुरोहित ने कहा, “हमारे देश की सभी देशी गायें अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन गुजरात के राजा-महाराजाओं के यहां गिर गाय पाली जाती थी। इसी वजह से धीरे-धीरे वहां यह स्टेटस सिंबल बन गई।”
उन्होंने पशुपालन में उचित आहार और देखभाल की अहमियत पर भी जोर दिया।
राजपुरोहित के शब्दों में, “गाय को जैसा खिलाएंगे, उसके दूध पर भी उसका असर पड़ेगा। गाय पालने के साथ-साथ उसकी उचित देखभाल करना भी बहुत जरूरी है।”
उनकी यह बात उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, जो केवल किसी लोकप्रिय नस्ल का नाम सुनकर पशुपालन शुरू करना चाहते हैं। किसी भी डेयरी व्यवसाय की सफलता के लिए नस्ल के साथ-साथ आहार, स्वास्थ्य, आवास, प्रजनन प्रबंधन और दूध बेचने के लिए भरोसेमंद बाजार भी जरूरी हैं।
देशी नस्ल, आधुनिक बाजार और किसानों की नई उम्मीद
गुजरात से दो गिर गाय लाकर गुरुग्राम में पशुपालन शुरू करने वाले किसान से लेकर प्रीमियम कीमत पर दूध और घी बेचने वाली गोशालाओं तक, गिर गाय की बढ़ती लोकप्रियता कई बदलावों की कहानी कहती है।
एक ओर देशी नस्लों के संरक्षण की जरूरत है, तो दूसरी ओर किसानों के सामने पशुपालन को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाने की चुनौती भी है।
गिर गाय इस दिशा में एक अवसर जरूर प्रस्तुत करती है, लेकिन इसकी सफलता के लिए वैज्ञानिक पशुपालन, पशुओं की उचित देखभाल, पारदर्शी मार्केटिंग और बाजार की वास्तविक मांग को समझना जरूरी है।
गुजरात के गिर जंगलों से शुरू हुआ इस देशी नस्ल का सफर आज देश के कई राज्यों और विदेशों तक पहुंच चुका है। अब देखना यह है कि गिर गाय के प्रति बढ़ता आकर्षण किस तरह देशी गोवंश के संरक्षण और किसानों की टिकाऊ आमदनी में योगदान देता है।
