Last Updated on October 10, 2026 12:53 pm by INDIAN AWAAZ

विनोद कुमार‚ वरिष्ठ पत्रकार
सुरों की मल्लिका आशा भोसले। नाम लेते ही हिंदी सिनेमा की वो अमिट धुनें कानों में गूंजने लगती हैं, जिन्होंने पीढ़ियों को झुमाया, रुलाया और झूमने पर मजबूर कर दिया। महज दस साल की उम्र में सिंगिंग की दुनिया में कदम रखने वाली आशा ताई ने अपने 80 साल से ज्यादा लंबे करियर में हर तरह का गाना गाया—क्लासिकल से लेकर कव्वाली, रोमांटिक से लेकर कैबरे, और फिर वो बोल्ड, नशीले और प्रयोगधर्मी गीत जो उस दौर में किसी और के बस की बात नहीं थी।
उन्हें गानों में वेरिएशन डालने के लिए जाना जाता है। कभी आवाज में ठहराव लातीं, कभी नशा, कभी जवानी का जोश, कभी दर्द की गहराई। ऐसा ही एक अद्भुत प्रयोग उनके सबसे बड़े कल्ट गाने से जुड़ा है—‘दम मारो दम, मिट जाए गम’।
साल 1971 की बात है। देव आनंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ रिलीज होने वाली थी। कहानी एक बिखरे परिवार की थी। भाई-बहन बचपन में अलग हो जाते हैं। सालों बाद देव आनंद का किरदार प्रशांत अपनी बहन जसबीर को काठमांडू में ढूंढने जाता है। जसबीर अब जेनीस बन चुकी है और हिप्पी लाइफ जी रही है। जीनत अमान का यह रोल उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बना। इस एक गाने ने उन्हें रातों-रात स्टार बना दिया। फिल्म हिप्पी कल्चर और ड्रग्स के खिलाफ मजबूत संदेश देने वाली थी, लेकिन गाने ने अपनी एक अलग पहचान बना ली।
संगीत आर.डी. बर्मन यानी पंचम दा का था और लिरिक्स आनंद बख्शी ने लिखे थे। दिलचस्प बात यह है कि मूल रूप से यह गाना लता मंगेशकर और उषा उत्थुप के ड्युएट के रूप में सोचा गया था। लता “अच्छी लड़की” के लिए और उषा “बुरी लड़की” के लिए। लेकिन पंचम दा को लगा कि आशा ताई की सल्ट्री, बोल्ड और गहरी आवाज ही इस हिप्पी वाइब को सही तरीके से जस्टिफाई कर सकती है। आखिरकार गाना आशा भोसले का सोलो बन गया। उषा उत्थुप की आवाज गाने के कोरस और “हरे कृष्णा हरे राम” वाले हिस्से में सुनाई देती है।
पंचम दा को जीनत अमान के किरदार के लिए एक ऐसी आवाज चाहिए थी जिसमें नशा हो, भारीपन हो और ठहराव हो। आशा ताई ने उनके विजन को पूरी तरह समझा। रिकॉर्डिंग के दौरान उन्होंने कई पलों तक अपनी सांसे रोक-रोककर गाया। इससे उनकी आवाज में वह नशीला ठहराव और गहराई आ गई, जो गाने को अमर बना गई। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने इस प्रभाव को हासिल करने के लिए सांस रोकने का अभ्यास भी किया था। परिणाम सामने है—एक ऐसी आवाज जो आज भी सुनते ही शरीर में करंट सा दौड़ जाता है।
गाना बनने के बाद भी विवाद हुआ। देव आनंद को “दम मारो दम” और “हरे कृष्णा हरे राम” शब्दों का एक साथ इस्तेमाल अजीब लगा। उन्होंने गाने को फिल्म से निकालने का फैसला कर लिया। लेकिन आशा ताई ने खुद देव साहब के घर जाकर कहा—“ये गाना बहुत चलेगा, इसे रख लीजिए।” देव आनंद ने उनकी बात मान ली। पंचम दा के पिता एस.डी. बर्मन भी जब गाना सुनने आए तो स्टूडियो से बाहर चले गए। उन्हें बेटे का यह नया, साइकेडेलिक अंदाज पसंद नहीं आया।
जब फिल्म रिलीज हुई तो गाना धमाकेदार हिट हो गया। 1972 में बिनाका गीतमाला की एनुअल लिस्ट में नंबर वन रहा। 12 हफ्तों तक टॉप पर बना रहा और सरताज गीत बन गया। आशा भोसले को इसी गाने के लिए फिल्मफेयर बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला। जीनत अमान का चिलम फूंकते हुए डांस, आशा ताई की नशीली आवाज और पंचम दा का जादुई संगीत—तीनों मिलकर इसे हिंदी सिनेमा का एक ऐसा कल्ट गाना बना देते हैं जिसका कोई मुकाबला नहीं।
लेकिन सफलता के साथ विवाद भी आया। ऑल इंडिया रेडियो ने गाने पर बैन लगा दिया। दूरदर्शन पर फिल्म प्रसारित करते समय भी यह गाना काट दिया जाता था। आरोप था कि गाना युवाओं को नशे और ड्रग्स की तरफ बढ़ा रहा है। विडंबना यह थी कि पूरी फिल्म ही ड्रग्स के खिलाफ संदेश देती थी। गाने के ठीक बाद किशोर कुमार का “देखो ओ दीवानों… राम का नाम बदनाम न करो” आता है, जो साफ तौर पर हिप्पी कल्चर की निंदा करता है। फिर भी गाना विवादों में घिर गया। रेडियो सीलोन पर हालांकि यह खुलकर बजता रहा और चार्ट पर राज करता रहा।
आज 55 साल बाद भी जब “दम मारो दम” बजता है तो पार्टियों में लोग झूम उठते हैं। रिमिक्स होते हैं, कॉलेज फेस्ट में बजता है, क्लब्स में लोग हाथ ऊपर करके गाते हैं। आशा ताई की आवाज में वह जादू आज भी वैसा का वैसा है। यह गाना सिर्फ एक हिट सॉन्ग नहीं, बल्कि एक युग की निशानी है—जब हिंदी सिनेमा ने बोल्डनेस, प्रयोग और युवा संस्कृति को एक साथ छुआ।
आशा भोसले ने सिर्फ गाना नहीं गाया, उन्होंने एक चरित्र को आवाज दी। पंचम दा ने संगीत में क्रांति लाई। जीनत अमान ने स्क्रीन पर इतिहास रच दिया। और देव आनंद ने एक ऐसी फिल्म बनाई जो आज भी प्रासंगिक है।
