
AMN /नई दिल्ली
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों का राजनीतिक भविष्य संसद के आगामी मानसून सत्र से ठीक पहले तय होने जा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ओम बिड़ला दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत इन बागी सांसदों की सदस्यता और उनकी स्थिति पर अंतिम फैसला लेने वाले हैं।
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सचिवालय इस मामले में बेहद सतर्कता बरत रहा है। बागी सांसदों द्वारा एक नई पार्टी के साथ विलय की दी गई दलील और उस पर टीएमसी की आपत्तियों को लेकर सचिवालय व्यापक कानूनी और संवैधानिक परामर्श में जुटा हुआ है। इस दौरान संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए ऐतिहासिक फैसलों की बारीकी से समीक्षा की जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मिली हार के बाद, लोकसभा में पार्टी के भीतर एक बड़ी बगावत देखने को मिली थी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी के टिकट पर कुल 29 सांसद चुनकर आए थे। इनमें से एक सांसद के निधन के बाद सदन में पार्टी की प्रभावी संख्या 28 रह गई थी।
हाल ही में, इन 28 सांसदों में से 20 बागी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कानूनी अयोग्यता (Disqualification) से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने हावड़ा स्थित एक क्षेत्रीय और पंजीकृत पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के साथ अपने विलय की घोषणा कर दी। बागी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात कर संसद में अपने लिए अलग बैठने की व्यवस्था (Separate Seating Arrangement) करने की भी मांग की है और एनडीए (NDA) सरकार को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है।
टीएमसी ने की अयोग्य घोषित करने की मांग
दूसरी तरफ, तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इसे सीधे तौर पर दलबदल का मामला बताया है। टीएमसी के लोकसभा नेता अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर ओम बिड़ला से मुलाकात कर सभी 20 बागी सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं (Disqualification Petitions) दायर की हैं।
टीएमसी का तर्क है कि:
- किसी भी पार्टी का विलय तभी वैध माना जा सकता है जब मूल राजनीतिक पार्टी के दो-तिहाई सदस्य इसके पक्ष में हों, न कि केवल चुने हुए विधायी/संसदीय दल के।
- बागी सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी है और एक अज्ञात दल (NCPI) के साथ हाथ मिलाया है, इसलिए वे दसवीं अनुसूची के तहत संरक्षण के हकदार नहीं हैं और उनकी सदस्यता तुरंत रद्द होनी चाहिए।
सचिवालय फूंक-फूंक कर रख रहा है कदम
चूंकि यह फैसला देश की राजनीति और दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए लोकसभा सचिवालय कोई भी कानूनी खामी नहीं छोड़ना चाहता। सचिवालय के विशेषज्ञ पिछले ऐसे मामलों (जैसे महाराष्ट्र में शिवसेना का विवाद) और पीठासीन अधिकारियों के पुराने फैसलों का अध्ययन कर रहे हैं।
जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होने वाले मानसून सत्र से पहले स्पीकर ओम बिड़ला इस पर अपनी अंतिम व्यवस्था (Ruling) दे सकते हैं। यदि स्पीकर बागी गुट के इस विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो संसद में एनडीए का कुनबा और मजबूत हो जाएगा, वहीं याचिका स्वीकार होने की स्थिति में इन 20 सांसदों को अपनी लोकसभा सदस्यता गंवानी पड़ सकती है।
