अन्दलीब अख्तर
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानवीय सहायता व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच टकराव के बाद हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आई बाधाओं ने ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य श्रृंखला और राहत कार्यों को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसका असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत जैसे देशों में आम आदमी की जिंदगी पर सीधा असर पड़ रहा है, जहां ईंधन की बढ़ती कीमतों ने महंगाई को और तेज कर दिया है।
फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष के बाद खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता तेजी से बढ़ी। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का लगभग एक-तिहाई तेल गुजरता है, अब जोखिम भरा मार्ग बन गया है। जहाजों की आवाजाही में बाधा और बीमा लागत में वृद्धि के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ गई हैं।
भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इस संकट से सीधे प्रभावित हुआ है। पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी ने परिवहन लागत को बढ़ा दिया है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं पर पड़ा है। सब्जियां, अनाज, दूध और अन्य जरूरी सामान महंगे हो गए हैं। कम आय वाले परिवारों के लिए यह स्थिति और कठिन हो गई है, जहां सीमित आय के बीच बढ़ते खर्च ने जीवन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि का असर पूरे आर्थिक ढांचे पर पड़ता है। परिवहन और उत्पादन महंगा होने से कंपनियां इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डालती हैं, जिससे महंगाई और बढ़ती है। ग्रामीण भारत में, जहां आय पहले से ही अस्थिर है, किसानों को ईंधन और उर्वरक की बढ़ती लागत का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उपभोक्ताओं को महंगी खाद्य सामग्री खरीदनी पड़ रही है।
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र ने इस संकट के मानवीय प्रभावों पर गंभीर चिंता जताई है। समुद्री मार्गों में बाधा आने से खाद्य पदार्थों, दवाओं और अन्य जरूरी सहायता की आपूर्ति प्रभावित हुई है। अब राहत सामग्री को वैकल्पिक और लंबे रास्तों से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के अनुसार, राहत सामग्री की ढुलाई की लागत औसतन 18 प्रतिशत तक बढ़ गई है, जबकि कुछ मामलों में यह दोगुनी हो गई है। खाड़ी क्षेत्र से सूडान और चाड जैसे देशों को भेजी जाने वाली सहायता अब अधिक महंगी हो गई है। पूर्वी अफ्रीका में भी ईंधन की बढ़ती कीमतों ने ट्रकों की उपलब्धता को प्रभावित किया है, जिससे इथियोपिया, कांगो और दक्षिण सूडान में राहत कार्य धीमे पड़ गए हैं।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए उर्वरकों की आपूर्ति में बाधा आने से कृषि उत्पादन पर भी खतरा मंडरा रहा है। यदि यह स्थिति जारी रही तो आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, जिससे विकासशील देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र को इस समय वित्तीय संसाधनों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक राहत कार्यों के लिए 8.5 अरब डॉलर की अपील के बावजूद अब तक केवल 23 प्रतिशत धनराशि ही जुटाई जा सकी है। इससे कई महत्वपूर्ण सहायता कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं।
इस संदर्भ में António Guterres ने चेतावनी दी है कि यह संकट लाखों लोगों को गरीबी में धकेल सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल और समन्वित कार्रवाई की अपील की है।
भारत के लिए यह स्थिति एक बड़ी चेतावनी है। जहां अल्पकालिक उपाय जैसे टैक्स में कटौती या सब्सिडी कुछ राहत दे सकते हैं, वहीं दीर्घकालिक समाधान के लिए देश को आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करनी होगी। सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कुल मिलाकर, हॉर्मुज़ संकट यह दिखाता है कि आज की वैश्विक दुनिया कितनी परस्पर जुड़ी हुई है। एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। भारत जैसे देशों में इसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है, जहां हर बढ़ती कीमत जीवन को और मुश्किल बना देती है।

