Last Updated on October 14, 2026 2:37 pm by INDIAN AWAAZ

विनोद कुमार‚ वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म लेखक 

साहिर लुधियानवी के तीखे और बेबाक बोल, एस. डी. बर्मन का भावपूर्ण संगीत और मोहम्मद रफी की रूह को झकझोर देने वाली आवाज़। इन तीनों कलाकारों का ऐसा संगम हुआ कि गीत महज़ फिल्मी गीत बनकर नहीं रह गए, बल्कि वे गीत सामाजिक चेतना और इंसानी संवेदना की एक बुलंद आवाज़ बन गए। इन तीनों के संगम से एक ऐसा गीत भी बना जिसने पूरे देश और समाज को झकझोर दिया। यही नहीं, इस गीत को लेकर सड़क से लेकर संसद तक भारी हंगामा हुआ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहले गीत को मोहम्मद रफी से नहीं, बल्कि मन्ना डे से रिकॉर्ड कराया गया था? और क्या आप जानते हैं कि कई सिनेमाघरों में फिल्म रोककर बार-बार इस गीत को दिखाने की माँग करते थे? 

दोस्तों, साल 1957 में रिलीज़ हुई प्यासा हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों में शामिल है, जिनकी प्रासंगिकता समय बीतने के साथ कम होने के बजाय और बढ़ती ही जा रही है। फिल्म के निर्देशक और मुख्य अभिनेता थे गुरु दत्त। फिल्म में माला सिन्हा ने मीना, वहीदा रहमान ने गुलाबो और जॉनी वॉकर ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्यासा की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसके गीत कहानी को रोकते नहीं थे, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाते थे। वे किरदारों की मनःस्थिति व्यक्त करते थे, उनके संघर्ष को सामने लाते थे और उन भावनाओं को आवाज़ देते थे, जिन्हें सामान्य संवादों में व्यक्त करना मुश्किल था।

फिल्म की आत्मा बसी थी साहिर लुधियानवी के लिखे गीतों में। साहिर उन शायरों में थे, जिन्होंने प्रेम और विरह के पारंपरिक विषयों को तो लिखा ही, लेकिन अपनी कलम को सामाजिक असमानता, गरीबी, पाखंड और शोषण के सवालों से भी जोड़े रखा।


उनकी शायरी में प्रेम करने वाला इंसान भी है और समाज से सवाल करने वाला नागरिक भी। प्यासा में साहिर की यही विशेषता अपने सबसे प्रभावशाली रूप में सामने आती है।

फिल्म के कई गीत आज भी लोकप्रिय हैं। ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ में व्यवस्था के प्रति गहरी निराशा और विद्रोह दिखाई देता है। ‘जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला’ में टूटे हुए प्रेम और अधूरी इच्छाओं का दर्द है। ‘हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो’ में रोमांस की कोमलता है।


लेकिन ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं’ का तेवर इन सबसे अलग है। यहाँ कवि केवल अपने दुख की बात नहीं करता। वह उन लोगों की तरफ देखता है, जिनकी ज़िंदगी समाज की चमक-दमक के पीछे छिपी हुई है।यह गीत उन दावों पर सवाल उठाता है, जिनमें देश की महानता का गुणगान तो किया जाता है, लेकिन समाज में मौजूद शोषण, अमानवीयता और पाखंड की ओर आँखें बंद कर ली जाती हैं।

https://youtu.be/TaTCySsec3M?list=RDTaTCySsec3M

साहिर के शब्दों को संगीतबद्ध करना एस. डी. बर्मन के सामने एक बड़ी रचनात्मक चुनौती रही होगी। एस. डी. बर्मन हिंदी फिल्म संगीत के उन संगीतकारों में थे, जो धुन को गीत के भाव के अनुरूप ढालने की क्षमता रखते थे। ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं’ गीत में संगीत का उद्देश्य शब्दों पर हावी होना नहीं, बल्कि उनकी चोट को और गहरा करना है। गीत के बोल, धुन और गायकी मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिससे यह गीत सुनने वालों के दिलों को झकझोर देता है। मोहम्मद रफी की रूहानी आवाज़ ने इस गीत को कालजयी बना दिया।

मोहम्मद रफी की गायकी की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह थी कि वह अपनी आवाज़ को गीत की ज़रूरत के मुताबिक ढाल सकते थे। रोमांटिक गीतों में उनकी आवाज़ कोमल हो जाती थी, भक्ति गीतों में उसमें श्रद्धा और समर्पण झलकता था, जबकि दर्दभरे गीतों में वह श्रोता के भीतर तक उतर जाती थी।

इस गीत में भी रफी साहब की आवाज़ का प्रभाव उसकी ऊँचाई या तकनीकी कठिनाई से नहीं, बल्कि उसके भावनात्मक संयम से पैदा होता है।


उनकी गायकी में पीड़ा है, लेकिन वह केवल निजी दुख की पीड़ा नहीं है। उसमें एक संवेदनशील इंसान का आक्रोश भी है, जो अपने आसपास हो रही घटनाओं को देखकर बेचैन है। वह सवाल करता है, लेकिन उसकी आवाज़ में बनावटी नाटकीयता नहीं आती।

बताया जाता है कि इस गीत को पहले मन्ना डे की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था। बाद में गुरु दत्त को लगा कि मोहम्मद रफी इस गीत की भावनात्मक ज़रूरतों के साथ बेहतर न्याय कर सकते हैं, इसलिए इसे रफी साहब की आवाज़ में दोबारा रिकॉर्ड कराया गया।

गुरु दत्त अपनी फिल्मों में गीतों को केवल संगीत के टुकड़ों की तरह नहीं देखते थे। उनके लिए गीत कहानी का अभिन्न हिस्सा थे। आवाज़, शब्द, संगीत, दृश्य और किरदार की मनःस्थिति—इन सभी का एक-दूसरे से मेल खाना ज़रूरी था।
गुरु दत्त की फिल्मों में गीतों की प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली होने का एक कारण यह भी था कि वे जानते थे कि किसी गीत को केवल अच्छा गाना बना देना पर्याप्त नहीं है। उसे उस क्षण की भावनात्मक सच्चाई का हिस्सा भी बनना चाहिए।

रफी साहब की आवाज़ में इस गीत का जो रूप सामने आया, उसमें शब्दों की चोट और पात्र के भीतर की बेचैनी एक साथ महसूस होती है। यह उनकी गायकी की बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

इस गीत के साथ एक और दिलचस्प किस्सा जुड़ा है। कहा जाता है कि प्यासा के प्रदर्शन के दौरान बंबई के मिनर्वा थिएटर में जब यह गीत आया, तो दर्शक इतने प्रभावित हुए कि तालियाँ बजाने लगे। कुछ विवरणों में यह भी कहा जाता है कि दर्शकों की माँग पर गीत को दोबारा चलाया गया।


सिनेमा में अक्सर तालियाँ सितारों की अदाकारी, रोमांचक दृश्यों या मनोरंजक गीतों पर बजती हैं। लेकिन जब कोई गीत अपनी सामाजिक संवेदना और सच्चाई के कारण याद रह जाए, तो उसका महत्व और बढ़ जाता है।

इस गीत की ताकत केवल उस समय के दर्शकों तक सीमित नहीं रही। आज भी इसके बोल सुनते हुए हमें अपने समाज के बारे में सवाल करने की ज़रूरत महसूस होती है। इस गीत को रिलीज़ हुए कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन इसकी केंद्रीय चिंता आज भी समझ में आती है।


साहिर के शब्द, बर्मन की धुन और रफी की आवाज़ मिलकर एक ऐसा कलात्मक अनुभव रचते हैं, जिसमें मनोरंजन और सामाजिक चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

साहिर लुधियानवी ने अपने शब्दों से इस सवाल को जन्म दिया। एस. डी. बर्मन ने अपनी धुन से उसे भावनात्मक गहराई दी और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज़ से उसे अमर बना दिया। गुरु दत्त ने इसे पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत किया कि गीत फिल्म की कहानी से आगे निकलकर अपने समय की एक पहचान बन गया।