— ललित गर्ग

भारतीय समाज आज जिस संक्रमण काल से गुजर रहा है, उसमें केवल आर्थिक, राजनीतिक या तकनीकी परिवर्तन ही नहीं हो रहे, बल्कि मानवीय संबंधों की बुनियाद भी गहरे संकट का सामना कर रही है। विश्वास, जो परिवार, समाज और सभ्यता का सबसे मजबूत आधार माना जाता है, धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में सामने आए कुछ घटनाक्रम इस चिंता को और गंभीर बना देते हैं। पुणे के निकट लोहागढ़ किले से अपने मंगेतर केतन अग्रवाल को कथित रूप से धक्का देकर हत्या करने के आरोप में सिया गोयल की गिरफ्तारी तथा इससे पहले मेघालय में हनीमून के दौरान इंदौर निवासी राजा रघुवंशी की कथित हत्या, जिसमें उनकी पत्नी सोनम रघुवंशी और उसके प्रेमी की संलिप्तता के आरोप लगे, केवल आपराधिक घटनाएं नहीं हैं। ये घटनाएं भारतीय समाज में विश्वास, नैतिकता और संबंधों के बदलते स्वरूप पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों का पवित्र मिलन माना जाता है। इसे सात जन्मों का बंधन कहा गया है। ऐसे में यदि पति-पत्नी, मंगेतर या प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को जीवनसाथी के बजाय बोझ या बाधा समझने लगें और समस्या का समाधान हत्या जैसे जघन्य अपराध में खोजें, तो यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के संकट का संकेत है।

सबसे अधिक भयावह तथ्य यह है कि इन घटनाओं में हत्या का आरोप उन्हीं लोगों पर लगा जिन पर पीड़ितों ने सबसे अधिक विश्वास किया था। किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि या सैन्य क्षमता में नहीं, बल्कि उसके सामाजिक विश्वास में निहित होती है। जब यही विश्वास टूटने लगता है, तब समाज भीतर से खोखला होने लगता है। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि किसी युवक या युवती को संबंध स्वीकार्य नहीं था, तो क्या विवाह से इनकार करने, सगाई तोड़ने या आपसी सहमति से अलग होने जैसे वैधानिक और सामाजिक विकल्प उपलब्ध नहीं थे? आधुनिक समाज ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को व्यापक स्वीकृति दी है। फिर हत्या जैसी अमानवीय प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है?

इस प्रश्न का उत्तर केवल पुलिस या न्यायालय नहीं दे सकते। इसके लिए समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, धार्मिक नेताओं और परिवार संस्था को मिलकर गंभीर चिंतन करना होगा। आज का युवा पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली के बीच गहरे द्वंद्व से गुजर रहा है। एक ओर परिवार की अपेक्षाएं हैं, दूसरी ओर व्यक्तिगत आकांक्षाएं। संवाद के अभाव में यही द्वंद्व मानसिक तनाव, विद्रोह और हिंसा का रूप ले लेता है।

पिछले कुछ वर्षों में देश ने श्रद्धा वालकर, निक्की यादव और विभिन्न महानगरों में प्रेम तथा वैवाहिक संबंधों से जुड़े अनेक निर्मम हत्याकांड देखे हैं। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि प्रेम, विवाह और संबंधों के प्रति अस्थिरता और अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। यह संकट केवल महिलाओं या पुरुषों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंसक प्रवृत्तियां दोनों पक्षों में दिखाई दे रही हैं।

डिजिटल युग ने भी इस संकट को जटिल बनाया है। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने जहां संवाद के नए अवसर दिए, वहीं कई मामलों में छल, षड्यंत्र और अपराध के साधन भी बन गए। आभासी दुनिया में बनने वाले संबंध अक्सर वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों, नैतिक सीमाओं और सामाजिक उत्तरदायित्व से कटे हुए होते हैं। परिणामस्वरूप धैर्य, सहनशीलता, त्याग, समर्पण और प्रतिबद्धता जैसे पारिवारिक जीवन के मूल गुण कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

इसी संदर्भ में तथाकथित “लव जिहाद” और छिपी हुई पहचान के आधार पर बनाए गए संबंधों को लेकर समय-समय पर सामाजिक विवाद भी सामने आते रहे हैं। यदि प्रेम, विवाह या संबंधों का उपयोग किसी व्यक्ति को धोखा देने, पहचान छिपाने, धार्मिक परिवर्तन, आर्थिक शोषण या मानसिक उत्पीड़न के लिए किया जाता है, तो इससे केवल दो व्यक्तियों का जीवन प्रभावित नहीं होता बल्कि समुदायों के बीच भी अविश्वास पैदा होता है। इसलिए आवश्यक है कि हर संबंध पारदर्शिता, स्वतंत्र सहमति, समानता और ईमानदारी पर आधारित हो।

साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरे समुदाय को दोषी न ठहराया जाए। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और सामाजिक सह-अस्तित्व है। सदियों से विभिन्न धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के लोग परस्पर सम्मान और विश्वास के साथ रहते आए हैं। इसलिए प्रत्येक अपराध की जिम्मेदारी अपराधी व्यक्ति की होनी चाहिए, किसी संपूर्ण समुदाय की नहीं। प्रेम के नाम पर छल का विरोध जितना आवश्यक है, उतना ही सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की रक्षा भी।

आज सबसे बड़ी चुनौती परिवार संस्था को पुनः मजबूत बनाने की है। संयुक्त परिवारों का विघटन, महानगरीय जीवन, अकेलापन और व्यस्त जीवनशैली ने परिवारों के भीतर संवाद को सीमित कर दिया है। माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ रही है। बच्चों को भौतिक सुविधाएं तो मिल रही हैं, लेकिन संस्कार, भावनात्मक सुरक्षा और जीवन मूल्यों का पर्याप्त वातावरण नहीं मिल पा रहा।

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल रोजगारपरक शिक्षा तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें जीवन कौशल, नैतिक शिक्षा, भावनात्मक संतुलन, संबंध प्रबंधन और पारिवारिक मूल्यों को भी शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। युवाओं को यह समझाना होगा कि प्रेम अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; संबंध उपभोग नहीं, प्रतिबद्धता हैं; और मतभेद का समाधान हिंसा नहीं, संवाद है।

धार्मिक और आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सभी धर्म प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा और सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। यदि ये संस्थाएं युवाओं को मानवीय मूल्यों, आत्मसंयम और संवाद की संस्कृति से जोड़ सकें तो अनेक सामाजिक विकृतियों को रोका जा सकता है। आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ, महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों ने चरित्र, नैतिकता और आत्मानुशासन को समाज की वास्तविक शक्ति बताया था।

विश्वास का संकट केवल पारिवारिक संबंधों तक सीमित नहीं है। अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों पर लापरवाही के कारण होने वाली आग और दुर्घटनाओं में निर्दोष लोगों की मौतें प्रशासनिक व्यवस्था पर जनता का विश्वास भी कमजोर करती हैं। सांप्रदायिक तनाव, धार्मिक कट्टरता, छिपी पहचान पर आधारित संबंध, प्रेम के नाम पर शोषण तथा सामाजिक ध्रुवीकरण भी सामाजिक समरसता को चुनौती दे रहे हैं। दूसरी ओर भौतिकवाद, उपभोक्तावाद और अंधी प्रतिस्पर्धा ने संयम, सादगी, त्याग और पारिवारिक गरिमा जैसे मूल्यों को पीछे धकेल दिया है। शराब और नशीले पदार्थों की बढ़ती प्रवृत्ति युवाओं को परिवार और समाज से दूर कर रही है तथा हिंसा, अपराध और संवेदनहीनता को बढ़ावा दे रही है।

जब व्यक्ति स्वार्थ, वासना और तात्कालिक सुख को सर्वोपरि मानने लगता है, तब संबंध साधना नहीं बल्कि सौदे में बदल जाते हैं। ऐसे समय में परिवार, शिक्षण संस्थान, धार्मिक संगठन, मीडिया और सरकार सभी की साझा जिम्मेदारी है कि वे मानवीय मूल्यों, पारदर्शिता, नैतिकता, संवाद और परस्पर सम्मान पर आधारित सामाजिक संस्कृति को पुनर्जीवित करें।

पुणे और मेघालय की घटनाएं केवल चेतावनी नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी हैं। यदि समय रहते विश्वास को पुनर्स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया, तो संबंधों का यह संकट और गहरा हो सकता है। परिवारों में संवाद बढ़ाना, युवाओं को स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व का बोध कराना, डिजिटल संस्कृति का संयमित उपयोग सिखाना और सामाजिक-सांप्रदायिक सद्भाव को मजबूत करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

किसी भी सभ्यता की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, तकनीकी प्रगति या आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि उसके नागरिक एक-दूसरे पर कितना विश्वास करते हैं। यदि विश्वास ही समाप्त हो जाए, तो समाज की आत्मा घायल हो जाती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा राष्ट्रीय दायित्व यही है कि संबंधों में विश्वास को पुनर्जीवित किया जाए, मानवीय संवेदनाओं को सशक्त बनाया जाए और प्रेम, विश्वास तथा सामाजिक समरसता की उस परंपरा को आगे बढ़ाया जाए जिसने सदियों तक भारतीय समाज को एकजुट रखा है।

Translated and edited by Andalib Akhter