Last Updated on June 15, 2026 11:53 pm by INDIAN AWAAZ


Our Correspondent
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, वित्तीय संरचना, फंडिंग स्रोत, पदाधिकारियों और वैधानिक अनुपालन से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का आग्रह किया है। इस पत्र के बाद आरएसएस की संगठनात्मक संरचना और पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से चल रही बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है।
13 जून को लिखे गए अपने पत्र में प्रियंक खड़गे ने सवाल उठाया कि देशभर में व्यापक स्तर पर सक्रिय आरएसएस बिना किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकरण कराए किस आधार पर कार्य कर रहा है। उनका कहना था कि इतने बड़े सार्वजनिक प्रभाव वाले संगठन को अन्य संस्थाओं की तरह जवाबदेही और खुलासे के समान मानकों का पालन करना चाहिए।
15 जून को सोशल मीडिया पर जारी टिप्पणी में प्रियंक ने कहा कि यदि कोई संगठन 60,000 से अधिक शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करता है तो उसे संवैधानिक जवाबदेही और पारदर्शिता भी सुनिश्चित करनी चाहिए।
पत्र में उन्होंने आरएसएस से उसकी कानूनी पहचान, संगठनात्मक ढांचा, पदाधिकारियों का विवरण, चंदे और आय के स्रोत, व्यय, संपत्तियां, कर अनुपालन तथा बिना औपचारिक पंजीकरण के संचालन के कानूनी आधार को सार्वजनिक करने की मांग की।
प्रियंक ने कहा कि कोई भी संगठन, चाहे वह कितना भी पुराना, बड़ा या प्रभावशाली क्यों न हो, सार्वजनिक जांच से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट, गैर-सरकारी संगठन, कंपनियां और धार्मिक संस्थाएं नियमित रूप से अपने वित्तीय और प्रशासनिक विवरण सार्वजनिक करती हैं।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पहले भी संगठन की वर्तमान व्यवस्था का बचाव करते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि आरएसएस किसी सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में नहीं बल्कि “व्यक्तियों के समूह” के रूप में कार्य करता है। उनके अनुसार 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान संगठन की स्थापना ऐसे समय हुई थी जब पंजीकरण की आवश्यकता नहीं थी और स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बना जिसने इसे अनिवार्य किया हो।
भागवत का यह भी कहना रहा है कि संगठन की स्थिति की पूर्व में अदालतों और आयकर विभाग द्वारा समीक्षा की जा चुकी है और आरएसएस कानून के दायरे में कार्य करता है। उनके अनुसार “व्यक्तियों के समूह” के रूप में इसकी कानूनी स्थिति होने के कारण संगठन पर सामान्य संस्थागत आयकर लागू नहीं होता।
प्रियंक ने अपने पत्र में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (एबीपीएस) द्वारा जारी आरएसएस की 2025–26 रिपोर्ट का हवाला देते हुए संगठन के विस्तार को रेखांकित किया। रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक में 4,127 दैनिक शाखाएं, 1,389 साप्ताहिक मिलन और 60 मासिक मंडलियां संचालित हो रही हैं।
आरएसएस की कार्यप्रणाली में शाखाएं नियमित स्थानीय बैठकें होती हैं, जहां स्वयंसेवक शारीरिक गतिविधियां, चर्चा और वैचारिक प्रशिक्षण में भाग लेते हैं। मिलन उन क्षेत्रों में आयोजित होते हैं जहां दैनिक शाखाएं नहीं लगतीं, जबकि मंडलियां मासिक सभाएं होती हैं।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि संगठन ने राज्य में 2,194 समाजोत्सव आयोजित किए जिनमें 19.6 लाख से अधिक लोग शामिल हुए, जबकि 562 पथ संचलनों में 2.2 लाख से अधिक गणवेशधारी प्रतिभागियों ने भाग लिया।
प्रियंक का तर्क है कि इतने व्यापक जनसंपर्क और सार्वजनिक गतिविधियों वाले संगठन के मामले में फंडिंग, कर व्यवस्था, सार्वजनिक आयोजनों की अनुमति और जवाबदेही से जुड़े सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह पत्र आरएसएस की प्रशासनिक और कानूनी संरचना को लेकर प्रियंक द्वारा उठाए गए सवालों की श्रृंखला का नवीनतम हिस्सा है। इससे पहले 2025 में उन्होंने सरकारी परिसरों में आरएसएस गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी और सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी पर भी कार्रवाई की बात कही थी।
आरएसएस की कानूनी स्थिति दशकों से चर्चा का विषय रही है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव के बावजूद संगठन उन कई प्रकटीकरण नियमों के दायरे में नहीं आता जो पंजीकृत संस्थाओं पर लागू होते हैं।
विभिन्न अध्ययनों और जांचों में यह उल्लेख किया गया है कि आरएसएस स्वयं पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि उसकी अनेक गतिविधियां और संस्थान अलग-अलग ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थानों और सेवा संगठनों के माध्यम से संचालित होते हैं जो अलग-अलग कानूनों के तहत पंजीकृत हैं।
संगठन के समर्थकों का कहना है कि आरएसएस की गतिविधियां पूरी तरह वैध हैं और उससे जुड़े संस्थान लागू नियमों का पालन करते हैं।
कर्नाटक सरकार द्वारा आरएसएस गतिविधियों पर उठाए गए सवालों के जवाब में भागवत पहले भी इन आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बता चुके हैं। केरल में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था कि आरएसएस कोई गुप्त संगठन नहीं है, उसकी शाखाएं सार्वजनिक स्थानों पर लगती हैं और उसकी गतिविधियां सभी के सामने होती हैं।
भागवत ने यह भी कहा था कि भारत में कई संगठन बिना पंजीकरण के कार्य करते हैं और पंजीकरण केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में आवश्यक होता है, जैसे सरकारी सहायता प्राप्त करना।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार हमेशा से आरएसएस के अस्तित्व से परिचित रही है और संगठन पर अतीत में दो बार प्रतिबंध लगने तथा बाद में हटाए जाने से भी यह स्पष्ट होता है। उन्होंने यह भी कहा कि 1950 के दशक में आरएसएस ने सरकार को अपना लिखित संविधान सौंप दिया था और सौ वर्षों के इतिहास में किसी भी प्राधिकरण ने संगठन को पंजीकरण का निर्देश नहीं दिया।
अपने पत्र के अंत में प्रियंक ने आरएसएस से आग्रह किया कि वह अपने शताब्दी वर्ष को “संवैधानिक आत्ममंथन” का अवसर बनाए और स्वेच्छा से अपनी वित्तीय, प्रशासनिक और संगठनात्मक जानकारी सार्वजनिक करे।
उन्होंने कहा कि यदि संगठन आम नागरिकों से नियमों के पालन की अपेक्षा करता है तो उसे भी समान स्तर की पारदर्शिता और जवाबदेही अपनानी चाहिए।
