Last Updated on October 22, 2026 3:41 pm by INDIAN AWAAZ

प्रवीण कुमार
देश के कई राज्यों में बारिश की कमी ने खेती-किसानी के संकट को गहरा दिया है। कर्नाटक में करीब 33 फीसदी फसलें बर्बाद होने का अनुमान है, महाराष्ट्र में कर्ज और फसल खराब होने के बीच किसान जान दे रहे हैं और तमिलनाडु में चावल की कुछ किस्मों के दाम 50 फीसदी तक बढ़ गए हैं। जलाशयों में घटता पानी आने वाले दिनों की चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि मौसम की मार झेल रहे किसानों और महंगाई से परेशान आम लोगों को राहत देने की तैयारी कितनी है?
खेती पर मौसम की मार पड़ती है तो उसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। किसान की आमदनी घटती है, ग्रामीण बाजारों में खरीदारी कम होती है, कृषि मजदूरों के सामने रोजगार का संकट खड़ा होता है और अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतें आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ाने लगती हैं। कमजोर मॉनसून से पैदा हो रहे मौजूदा हालात इसी खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं। दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्यों में पानी की कमी ने खेती-किसानी को संकट में डाल दिया है। खेत सूख रहे हैं, जलाशयों का स्तर लगातार गिर रहा है और किसानों के सामने अगली फसल की तैयारी को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक में करीब 33 फीसदी फसल बर्बाद होने का अनुमान है। महाराष्ट्र में फसल खराब होने और कर्ज के दबाव के बीच सात दिनों में चार किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। तमिलनाडु में पानी की कमी से धान की खेती का रकबा एक लाख एकड़ से अधिक घट गया है। चावल की कुछ किस्मों के दाम 50 फीसदी तक बढ़ने की खबर है। ये आंकड़े सिर्फ कृषि उत्पादन में गिरावट की कहानी नहीं कहते, बल्कि उस व्यापक संकट की ओर संकेत करते हैं जिसमें किसान की कमाई, उपभोक्ता का खर्च और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
सूखे की चपेट में खेती, संकट में किसान
कर्नाटक में सूखे की स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के 240 तालुकों में से 226 को सूखाग्रस्त बताया गया है। राज्य की लगभग 94.1 फीसदी तालुका इकाइयों में सूखे की स्थिति दर्ज होने का दावा किया गया है। इसी तरह महाराष्ट्र के 86.4 फीसदी तालुके और आंध्र प्रदेश के 56.4 फीसदी तालुके सूखे से प्रभावित बताए गए हैं। तेलंगाना में भी करीब 45.6 फीसदी मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।
इन आंकड़ों के पीछे किसानों की रोजमर्रा की परेशानियां छिपी हैं। खेती के लिए समय पर बारिश न हो तो बीज बोने से लेकर फसल की बढ़वार और दाने भरने तक की प्रक्रिया प्रभावित होती है। जिन किसानों ने बारिश की उम्मीद में बीज, खाद और कीटनाशकों पर खर्च किया, उनकी लागत डूबने का खतरा बढ़ जाता है। जहां सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं हैं, वहां फसल बचाने के विकल्प और भी सीमित हो जाते हैं।
किसान की परेशानी यह भी है कि खेती में निवेश पहले करना पड़ता है, जबकि आमदनी फसल तैयार होने के बाद मिलती है। यदि बारिश बीच में साथ छोड़ दे तो किसान को नुकसान के साथ अगली बुवाई के लिए भी पैसे जुटाने पड़ते हैं। जिन परिवारों पर पहले से कर्ज है, उनके लिए यह दोहरा दबाव बन जाता है। ऐसे में फसल बीमा, समय पर मुआवजा, सस्ता कृषि ऋृण और वैकल्पिक रोजगार जैसी व्यवस्थाओं की अहमियत बढ़ जाती है।
महाराष्ट्र में सात दिनों के भीतर चार किसानों की आत्महत्या के मामले इस संकट की मानवीय गंभीरता को सामने लाते हैं। हालांकि, इन घटनाओं के पीछे के कारणों की अलग-अलग जांच जरूरी है, लेकिन फसल का नुकसान, कर्ज की देनदारी और आमदनी की अनिश्चितता किसानों की मुश्किलों को बढ़ा सकती है। किसान संकट को सिर्फ व्यक्तिगत परेशानी मानकर नहीं देखा जा सकता। यह कृषि व्यवस्था में मौजूद उन कमजोरियों पर भी सवाल उठाता है जिनके कारण मौसम की एक बड़ी मार किसान के पूरे परिवार की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डाल देती है।
जलाशयों में घटता पानी, आगे की चिंता
सूखे की गंभीरता केवल बारिश के आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती। यह देखना भी जरूरी है कि नदियों, बांधों और जलाशयों में कितना पानी बचा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर उनकी कुल क्षमता से 31 फीसदी कम रह गया है। पेन्नार नदी बेसिन में पानी की कमी 72.3 फीसदी और कावेरी बेसिन में 60.5 फीसदी बताई गई है।
तमिलनाडु का अलियार जलाशय लगभग खाली होने की स्थिति में पहुंच गया है। तेलंगाना से जुड़े प्रमुख बांधों में भी जलस्तर सामान्य से काफी नीचे बताया गया है। इन हालात का असर केवल खरीफ की मौजूदा फसल पर नहीं पड़ेगा। यदि पानी की कमी बनी रहती है, तो रबी की बुवाई, बागवानी, पशुपालन और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है।
जलाशयों में पानी कम होने का मतलब यह है कि सिंचाई के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो रहे हैं। ऐसे में किसानों को तय करना पड़ता है कि वे उपलब्ध पानी से कितने खेतों की सिंचाई करें और किन फसलों को प्राथमिकता दें। पानी की कमी के कारण यदि किसान कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करते हैं, तो उसके लिए बीज, बाजार, खरीद और भंडारण की व्यवस्था भी जरूरी होगी। केवल किसानों से फसल बदलने की अपील कर देना पर्याप्त नहीं है।
यहीं पर जल प्रबंधन की नीतियों की परीक्षा होती है। वर्षा जल संचयन, तालाबों और छोटे जलाशयों का पुनर्जीवन, भूजल का संतुलित उपयोग तथा सिंचाई की बेहतर व्यवस्था सूखे के असर को कम कर सकती है। लेकिन इन उपायों के लिए स्थानीय स्तर पर लगातार काम और समयबद्ध निवेश की जरूरत है। संकट आने के बाद टैंकर भेजना या अस्थायी राहत देना जरूरी तो है, मगर स्थायी समाधान नहीं।
चावल महंगा, आम आदमी की थाली पर बोझ
खेती में उत्पादन घटने का असर बाजार में कीमतों के रूप में दिखाई देने लगता है। तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में पानी की कमी के कारण धान की खेती का रकबा एक लाख एकड़ से अधिक घटने की बात सामने आई है। जब खेती का क्षेत्र कम होता है और पैदावार प्रभावित होती है, तो चावल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। इसी बीच चावल की कुछ किस्मों के दाम 50 फीसदी तक बढ़ने की सूचना है।
चावल की कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों के बजट को बिगाड़ सकती है। जिन परिवारों की आमदनी का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है, उनके लिए अनाज की महंगाई का असर दूसरी जरूरतों पर होने वाले खर्च में कटौती के रूप में सामने आ सकता है। दूध, दाल, सब्जी, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य जैसी जरूरतों के लिए उपलब्ध रकम कम पड़ सकती है।
हालांकि, चावल की कुछ किस्मों की कीमतों में बढ़ोतरी को पूरे देश में चावल के दामों में समान वृद्धि नहीं माना जाना चाहिए। स्थानीय उत्पादन, मांग, परिवहन, भंडार और बाजार की स्थिति के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में कीमतों का अंतर हो सकता है। फिर भी, यदि उत्पादन में गिरावट व्यापक होती है, तो खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ जाता है।
इसका एक और पहलू है। फसल खराब होने से किसान की आमदनी घटती है, लेकिन बाजार में उपभोक्ता को जरूरी नहीं कि सस्ता अनाज मिले। कई बार किसान कम उत्पादन के कारण नुकसान उठाता है और उपभोक्ता ऊंची कीमत चुकाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि उत्पादन से लेकर भंडारण, खरीद और खुदरा बिक्री तक की व्यवस्था में ऐसा कौन-सा रास्ता निकाला जाए जिससे किसान को उचित दाम मिले और उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ न पड़े।
सरकार के लिए चुनौती यही है कि वह खाद्य आपूर्ति पर नजर रखते हुए जमाखोरी पर नियंत्रण, बाजार में पर्याप्त उपलब्धता और जरूरतमंद परिवारों तक सस्ती खाद्य सामग्री पहुंचाने के उपाय प्रभावी ढंग से लागू करे। केवल कीमतें बढ़ने के बाद कदम उठाना पर्याप्त नहीं होगा। उत्पादन में गिरावट की आशंका के शुरुआती संकेतों के आधार पर तैयारी करना जरूरी है।
अल नीनो और मौसम में बदलाव बड़ी चुनौती
भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में अल नीनो के प्रभाव की चर्चा हो रही है। अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर वैश्विक मौसम के अलग-अलग हिस्सों पर पड़ सकता है। भारत में मानसून पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन हर अल नीनो वर्ष में बारिश का एक जैसा पैटर्न बने, यह जरूरी नहीं है।
इसलिए मौजूदा संकट को केवल अल नीनो का परिणाम मान लेना भी उचित नहीं होगा। बारिश का क्षेत्रीय वितरण, मॉनसून की अवधि, तापमान, मिट्टी में नमी, जलाशयों की स्थिति और सिंचाई की उपलब्धता भी कृषि उत्पादन तय करते हैं। फिर भी, जब कई राज्यों में एक साथ पानी की कमी और फसलों पर दबाव दिखाई देता है, तो यह कृषि व्यवस्था की मौसम संबंधी जोखिमों से निपटने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में अनिश्चित मौसम के बीच खेती को सुरक्षित बनाने की जरूरत और बढ़ गई है। सूखा सहने वाली फसल किस्में, मौसम के पूर्वानुमान की समय पर जानकारी, स्थानीय जल संरक्षण और फसल विविधीकरण किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसके साथ ही, कृषि सलाह ऐसी होनी चाहिए जिसे छोटे और सीमांत किसान अपनी आर्थिक परिस्थितियों में अपना सकें।
राहत से आगे बढ़कर स्थायी तैयारी की जरूरत
मौजूदा हालात में सबसे पहली जरूरत प्रभावित किसानों की पहचान कर उन्हें समय पर राहत देने की है। फसल नुकसान का पारदर्शी आंकलन हो, मुआवजे में देरी न हो और पात्र किसानों को फसल बीमा का भुगतान मिले। जहां सूखे के कारण बुवाई संभव नहीं हो पा रही है, वहां कृषि ऋण की अदायगी में राहत और अगली फसल के लिए सहायता पर विचार किया जाना चाहिए। पशुपालकों और कृषि मजदूरों की जरूरतों को भी राहत योजनाओं में शामिल करना जरूरी है।
इसके साथ ही, सरकारों को जलाशयों के स्तर, फसल उत्पादन और खाद्य पदार्थों की कीमतों की नियमित निगरानी करनी होगी। जिन क्षेत्रों में धान या दूसरी प्रमुख फसलों का उत्पादन घटने की आशंका है, वहां वैकल्पिक आपूर्ति और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की तैयारी समय रहते की जानी चाहिए। स्थानीय प्रशासन को पानी के इस्तेमाल में प्राथमिकताएं तय करते समय पेयजल, सिंचाई और पशुओं की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा।
सबसे अहम बात यह है कि खेती को केवल मानसून के भरोसे छोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। किसान को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें मौसम खराब होने पर उसका पूरा निवेश डूबने का खतरा कम हो, फसल का उचित मूल्य मिले और परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए उसे लगातार कर्ज पर निर्भर न रहना पड़े।
कमजोर मॉनसून ने एक बार फिर यह दिखाया है कि खेत में पैदा होने वाला संकट बाजार और रसोई तक पहुंचने में देर नहीं लगाता। किसान की फसल बचाना और आम आदमी की थाली को महंगाई से बचाना दो अलग-अलग लक्ष्य नहीं हैं। दोनों एक ही कृषि और खाद्य व्यवस्था के हिस्से हैं। यदि सरकारें सूखे के संकट को केवल मौसमी आपदा मानकर अस्थायी राहत तक सीमित रखती हैं, तो हर साल मौसम की अनिश्चितता किसानों और उपभोक्ताओं के लिए नया आर्थिक संकट खड़ा कर सकती है।
असली कसौटी यही होगी कि संकट के इस दौर में किसान को कितनी राहत मिलती है, पानी का कितना बेहतर प्रबंधन होता है और बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कितनी प्रभावी तैयारी की जाती है। खेतों में फसल बचाना ही नहीं, किसान की आमदनी और आम आदमी की थाली बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
