Last Updated on October 12, 2026 11:48 pm by INDIAN AWAAZ

विनोद कुमार‚ वरिष्ठ पत्रकार
जिंदगी में जब सब कुछ आपके खिलाफ हो, जब अपने भी साथ छोड़ दें, सपने टूट जाएं और हालात आपको हार मानने पर मजबूर कर दें, तब आप क्या करेंगे? परेशान होंगे, किस्मत को कोसेंगे और बीते हुए कल को याद करके दुखी होंगे। लेकिन हिंदी सिनेमा के एक ऐसे महान अभिनेता थे, जिन्होंने जिंदगी को देखने का नज़रिया ही कुछ अलग रखा। उनके लिए जिंदगी का मतलब था—जो मिला, उसे स्वीकार करो; जो खो गया, उसे पीछे छोड़ो और बिना रुके आगे बढ़ते चलो। ये अभिनेता थे सदाबहार देव आनंद!
हैरानी की बात यह है कि साल 1961 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘हम दोनों’ का सदाबहार गीत – “मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया” – केवल देव आनंद का ही पसंदीदा गीत नहीं था। हिंदी सिनेमा के एक और बेहद संजीदा, बेबाक और मंझे हुए अभिनेता नाना पाटेकर भी इस गीत को अपने जीवन का फलसफा मानते थे।
दिसंबर 2024 में जब नाना पाटेकर कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर पहुँचे, तो उन्होंने इसी गीत को गुनगुनाना शुरू कर दिया। महानायक अमिताभ बच्चन भी उनके साथ सुर मिलाने लगे। देखते ही देखते, एक पुराना गीत दो दिग्गज अभिनेताओं की भावनाओं से जुड़ गया। दोनों ने मिलकर इस सदाबहार गीत को गाया। गीत खत्म होने के बाद दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया।
नाना पाटेकर ने अमिताभ बच्चन के साथ बातचीत के दौरान साफ़ कहा कि उनके जीवन दर्शन को समझना हो, तो ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया’ गीत को समझना चाहिए। यह केवल संगीत का एक खूबसूरत पल नहीं था, बल्कि दो कलाकारों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का क्षण भी था।
छह दशक से भी ज़्यादा समय गुज़र जाने के बाद भी इस गीत की पंक्तियाँ लोगों को ज़िंदगी जीने का सलीका सिखाती हैं। इस गीत को अपनी जादुई आवाज़ देने वाले मोहम्मद रफ़ी साहब, इसके शब्द लिखने वाले साहिर लुधियानवी और इसकी धुन बनाने वाले संगीतकार जयदेव ने शायद भी नहीं सोचा होगा कि उनकी यह रचना आने वाली पीढ़ियों के लिए ज़िंदगी का दर्शन बन जाएगी।
आज न इस गाने को आवाज़ देने वाले मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच हैं, न इसे लिखने वाले साहिर लुधियानवी, न इसका संगीत देने वाले जयदेव और न ही इस गाने पर अदायगी करने वाले देव आनंद। इस गीत को अपने जीवन का दर्शन मानने वाले नाना पाटेकर भी अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन इन महान कलाकारों की यादों के साथ यह गीत आज भी जीवित है। इसकी खूबसूरती यही है कि यह केवल एक दौर की कहानी नहीं कहता, बल्कि हर दौर के इंसान को ज़िंदगी का अर्थ समझाता है।
विजय आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘हम दोनों’ में देव आनंद दोहरी भूमिका में नज़र आए थे। उनके साथ साधना और नंदा ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थीं। फिल्म के गीत-संगीत ने इसे हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया।
साहिर लुधियानवी के शब्द ज़िंदगी के अनुभवों को सरल लेकिन गहरे अर्थ देते हैं। जयदेव की धुन में सहजता और प्रवाह है, जबकि रफ़ी साहब की आवाज़ में एक ऐसी बेफ़िक्री और आत्मीयता है, जो गीत के संदेश को सीधे दिल तक पहुँचाती है। रफ़ी साहब इसे गाते हुए कहीं भी अनावश्यक नाटकीयता का सहारा नहीं लेते। उनकी गायकी में ऐसा लगता है, जैसे कोई इंसान ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव देखने के बाद मुस्कराते हुए कह रहा हो कि जो बीत गया, उसे लेकर अब परेशान होने का कोई फ़ायदा नहीं।
देव आनंद हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में थे, जिनकी पहचान उनके अभिनय के साथ-साथ उनकी ज़िंदादिली और उत्साही व्यक्तित्व से भी थी। इस गीत पर उनकी अदायगी गीत के भावों के बिल्कुल अनुकूल थी। पर्दे पर वह ऐसे व्यक्ति की छवि प्रस्तुत करते हैं, जो ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करता है और उनसे घबराकर रुकता नहीं है। उनकी सार्वजनिक छवि में हमेशा आगे बढ़ते रहने का भाव दिखाई देता था। इसलिए जब यह गीत उनके ऊपर फ़िल्माया गया, तो वह केवल एक किरदार का गीत बनकर नहीं रह गया। देव आनंद के व्यक्तित्व और गीत के दर्शन के बीच ऐसा मेल दिखाई दिया कि दोनों की छवि एक-दूसरे से जुड़ गई। आज भी इस गीत को याद करते हुए देव आनंद का चेहरा और उनका बेफ़िक्र अंदाज़ आँखों के सामने आ जाता है।
नाना पाटेकर का इस गीत को अपने जीवन दर्शन से जोड़ना इसलिए अर्थपूर्ण था, क्योंकि इसके बोल इंसान को परिस्थितियों के सामने असहाय बने रहने के बजाय अपने भीतर ताकत खोजने की प्रेरणा देते हैं। नाना अपने गंभीर अभिनय, बेबाक बातचीत और सादगी के लिए जाने जाते हैं। उनके व्यक्तित्व में जीवन की कठोर सच्चाइयों को देखने और उन्हें स्वीकार करने वाला एक व्यावहारिक नज़रिया दिखाई देता है। केबीसी के मंच पर भी वह किसी लंबे भाषण के बजाय एक गीत के माध्यम से अपनी बात कह रहे थे।
यह गीत जीवन को किसी ऐसी काल्पनिक दुनिया के रूप में नहीं देखता, जहाँ हमेशा खुशियाँ ही खुशियाँ हों। यह मानता है कि दुख, नुकसान, निराशा और असफलता भी ज़िंदगी का हिस्सा हैं। लेकिन इनके बावजूद आगे बढ़ने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में हम अक्सर दूसरों की उपलब्धियों से अपनी तुलना करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर किसी की सफलता देखकर अपनी ज़िंदगी अधूरी लगने लगती है। भविष्य की चिंता और अतीत का पछतावा हमें वर्तमान में जीने नहीं देते। ऐसे समय में यह गीत याद दिलाता है कि ज़िंदगी की खूबसूरती केवल बड़ी सफलताएँ हासिल करने में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करने में भी है।
हर सपना पूरा नहीं होता। हर रिश्ता हमेशा नहीं चलता। हर मेहनत का परिणाम हमारी उम्मीद के मुताबिक़ नहीं निकलता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ज़िंदगी में आगे बढ़ने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। इस गीत से हम सीख सकते हैं कि असफलता को अपनी पहचान न बनने दें, बीते हुए कल को अपने आज पर हावी न होने दें और भविष्य की चिंता में वर्तमान को जीना न भूलें।
ज़िंदगी में मुश्किलें आएंगी, लेकिन उनका सामना किस नज़रिये से करना है, यह काफ़ी हद तक हमारे हाथ में है। और यही बात इस गीत को कालजयी बनाती है।
फिल्म ‘हम दोनों’ को रिलीज़ हुए छह दशक से भी ज़्यादा समय हो चुका है, लेकिन साहिर लुधियानवी के शब्द, जयदेव की धुन और मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ आज भी उतनी ही असरदार हैं। देव आनंद की अदायगी ने इस गीत को एक यादगार पहचान दी, जबकि नाना पाटेकर और अमिताभ बच्चन के साथ गाए गए इसके अंश ने नई पीढ़ी के सामने इसकी प्रासंगिकता को फिर से उजागर किया।
