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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुआ भीषण कोचिंग सेंटर अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आया है। तीन मंजिला व्यावसायिक इमारत में लगी आग ने 15 मासूम बच्चों की जान ले ली, जबकि कई अन्य छात्र गंभीर रूप से झुलस गए और उनका इलाज जारी है। यह हादसा ऐसे समय हुआ जब इमारत के भीतर कोचिंग, लाइब्रेरी और अन्य गतिविधियां सामान्य रूप से चल रही थीं।

केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के अनुसार, बड़ी संख्या में बच्चों को अस्पताल लाया गया, जिनमें कई को मृत अवस्था में पहुंचाया गया। कुछ बच्चों ने जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिलों से छलांग भी लगाई, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।

शुरुआती जांच में सामने आई आग की भयावह श्रृंखला

प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि आग की शुरुआत बिजली प्रणाली में शॉर्ट सर्किट से हुई। बताया जा रहा है कि भीषण गर्मी के दौरान एयर कंडीशनिंग सिस्टम पर अत्यधिक लोड पड़ने से वायरिंग प्रभावित हुई और आग तेजी से कंप्यूटर सेक्शन तक पहुंच गई। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में मौजूद प्लास्टिक और अन्य सिंथेटिक सामग्री ने आग को कुछ ही मिनटों में विकराल रूप दे दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे हादसों में केवल आग नहीं, बल्कि उससे निकलने वाला जहरीला धुआं अधिक घातक साबित होता है। इसी कारण कई बच्चों की स्थिति तेजी से बिगड़ी।

जहरीला धुआं बना सबसे बड़ा खतरा

घटना की सबसे चिंताजनक बात यह सामने आई कि बच्चों की मौत केवल लपटों से नहीं, बल्कि धुएं और ऑक्सीजन की कमी से भी हुई। क्लासरूम और लाइब्रेरी में रखे फर्नीचर, प्लाईवुड, सनमाइका, प्लास्टिक और अन्य कृत्रिम सामग्री के जलने से अत्यधिक घना और विषैला धुआं पैदा हुआ।

वेंटिलेशन और पर्याप्त निकासी व्यवस्था नहीं होने के कारण धुआं पूरे फ्लोर और सीढ़ियों में भर गया। इससे बच्चों को बाहर निकलने का समय नहीं मिला और कई छात्र अंदर ही फंस गए।

किताबें और बंद ढांचा बने आग के प्रसार का माध्यम

इमारत में बड़ी मात्रा में किताबें, कॉपियां और अन्य कागजी सामग्री मौजूद थी। आग लगने के बाद यही सामग्री तेजी से ईंधन में बदल गई। आग की तीव्रता बढ़ने के साथ धुएं का दबाव भी बढ़ता गया, जिससे बचाव कार्य और कठिन हो गया।

बताया जा रहा है कि इमारत के ऊपरी हिस्से में इलेक्ट्रॉनिक गतिविधियों और अतिरिक्त उपकरणों का संचालन भी किया जा रहा था, जिसने आग के फैलाव को और तेज कर दिया।

फायर सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौजूदगी वाली इमारत में पर्याप्त अग्नि सुरक्षा व्यवस्था थी। शुरुआती जानकारी में सामने आया है कि भवन में अग्निशमन मानकों और आपातकालीन निकासी व्यवस्था को लेकर गंभीर खामियां थीं।

इस घटना ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि स्कूल, कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी और व्यावसायिक परिसरों में अग्नि सुरक्षा नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित फायर ऑडिट, सुरक्षित वायरिंग, आपातकालीन निकास और कर्मचारियों का प्रशिक्षण ऐसी त्रासदियों को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

लखनऊ का यह हादसा केवल एक शहर की त्रासदी नहीं, बल्कि देशभर में संचालित शैक्षणिक और व्यावसायिक परिसरों के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है।