Last Updated on March 9, 2026 4:18 pm by INDIAN AWAAZ

असद मिर्ज़ा
ईरान ने सोमवार (9 मार्च) को एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए मोजतबा खामेनेई को अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई के उत्तराधिकारी के रूप में देश का नया सर्वोच्च नेता घोषित किया। इस घोषणा के साथ ही ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में निरंतरता का स्पष्ट संकेत मिला और यह भी जाहिर हो गया कि देश में कट्टरपंथी माने जाने वाले धड़े का प्रभाव अब भी मजबूत बना हुआ है।
देश के विभिन्न संस्थानों—विदेश मंत्रालय से लेकर संसद के सदस्यों तक—ने नए सर्वोच्च नेता के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए बयान जारी किए। यह सब ऐसे समय में हुआ जब क्षेत्र में युद्ध का दसवां दिन चल रहा है और पूरे मध्य-पूर्व में मिसाइल तथा ड्रोन हमलों की गूंज सुनाई दे रही है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पश्चिमी देशों की ईरान में शासन परिवर्तन की रणनीति सफल हो पाएगी।
पश्चिम की पुरानी रणनीति
पिछले कई वर्षों से पश्चिमी देश ईरान में इस्लामवादी नेतृत्व वाली सरकार को बदलने की कोशिश करते रहे हैं। इसके लिए वे अक्सर लोकतंत्र की कमी, महिलाओं के अधिकारों के हनन, सामाजिक ठहराव और आर्थिक समस्याओं जैसे मुद्दों को उठाते रहे हैं।
हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि इन तर्कों के पीछे असली कारण ईरान के विशाल तेल और खनिज संसाधनों पर नियंत्रण की इच्छा है। पश्चिमी शक्तियां चाहती हैं कि ईरान उनकी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के अनुरूप चले।
हालिया संकट के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खुले तौर पर ईरानी जनता से “उठ खड़े होने” की अपील की। इस अभियान के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई सहित कई वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों की हत्या को अमेरिका-इज़राइल गठबंधन ने अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
नेतृत्व हटाने से बदलाव की गारंटी नहीं
जर्मनी की फिलिप्स-यूनिवर्सिटी मारबर्ग में मध्य-पूर्व अर्थशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद रज़ा फरज़ानेगन का मानना है कि यह धारणा गलत हो सकती है कि किसी केंद्रीय नेता को हटाने से तुरंत और निर्णायक राजनीतिक बदलाव हो जाएगा।
उनके अनुसार, अयातुल्ला खामेनेई के बाद का ईरान वैसा बिल्कुल भी नहीं हो सकता जैसा हस्तक्षेप के समर्थक देखना चाहते हैं।
मध्य-पूर्व के उदाहरण
अगर हम मध्य-पूर्व के हालिया इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि बाहरी हस्तक्षेप से सत्ता परिवर्तन अक्सर स्थिरता नहीं बल्कि अराजकता पैदा करता है।
इराक, लीबिया और सीरिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- इराक में 2003 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमण के बाद से लगातार विद्रोह, सांप्रदायिक हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है।
- लीबिया में 2011 में नाटो के हस्तक्षेप के बाद देश दो हिस्सों में बंट गया—एक सत्ता केंद्र त्रिपोली में और दूसरा बेंगाजी में।
- सीरिया में भी शासन परिवर्तन के बाद स्थिर और कल्याणकारी राजनीतिक व्यवस्था अभी तक स्थापित नहीं हो सकी।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शासन परिवर्तन के बाद स्थिरता की गारंटी नहीं होती।
ईरान का मामला अलग क्यों?
ईरान की स्थिति इन देशों से कई मायनों में अलग है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ईरान में मजबूत प्रशासनिक ढांचा और राजनीतिक संस्थाएं मौजूद हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, ईरान की स्थिरता दो प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है:
- सिविल नौकरशाही और तकनीकी प्रशासनिक तंत्र
- नियमित सेना (आर्टेश) और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की एकजुटता
यदि ये संस्थाएं एकजुट रहती हैं तो देश की प्रशासनिक एकता और क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रह सकती है।
शहादत की अवधारणा और राजनीतिक प्रतीकवाद
शिया इस्लाम में शहादत का एक गहरा धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। ऐसे में खामेनेई की मृत्यु को उनके समर्थक पराजय के बजाय शहादत के रूप में भी देख सकते हैं।
इस दृष्टिकोण से यह घटना राजनीतिक पतन नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक समापन बन सकती है, जो सत्ता व्यवस्था को और मजबूत भी कर सकती है।
आंतरिक चुनौतियां
हालांकि चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ईरान एक बहु-जातीय और बहुभाषी समाज है।
यदि केंद्रीय सत्ता कमजोर पड़ती है तो सीमावर्ती क्षेत्रों में पहले से मौजूद असंतोष—विशेषकर बलूच, कुर्द और अरब समुदायों के बीच—अलगाववादी आंदोलनों को जन्म दे सकता है।
ऐसे हालात में विभिन्न मिलिशिया समूहों के उभरने का खतरा भी बना रहता है।
सैन्य हस्तक्षेप की बहस
हाल के दिनों में कुछ विश्लेषकों ने यह तर्क दिया है कि “कड़वा अंत, अंतहीन कड़वाहट से बेहतर होता है”, यानी सैन्य हस्तक्षेप के जरिए संकट का जल्दी समाधान निकाला जा सकता है।
लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा कदम ईरान और पूरे क्षेत्र के लिए दशकों तक चलने वाली अस्थिरता की शुरुआत भी कर सकता है।
शिया-सुन्नी एकजुटता
ईरान में शिया बहुसंख्यक हैं, लेकिन वहां सुन्नी अल्पसंख्यक भी रहते हैं। हाल के घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि बाहरी दबाव के समय दोनों समुदायों के बीच एकजुटता बढ़ सकती है।
मार्च के पहले सप्ताह में सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत के लगभग 660 सुन्नी विद्वानों ने संयुक्त बयान जारी कर अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ “जिहाद” का आह्वान किया और ईरानी सशस्त्र बलों के प्रति समर्थन व्यक्त किया।
इसी तरह कई शिया विद्वानों ने भी अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ फतवा जारी किया।
आगे का रास्ता
शिया और सुन्नी समूहों के इस तरह एक साथ आने, साथ ही सर्वोच्च परिषद और आईआरजीसी के मजबूत नियंत्रण को देखते हुए यह संभावना कम लगती है कि ईरान की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था तुरंत ढह जाएगी।
इसके विपरीत, यह घटनाक्रम पश्चिमी देशों की उस धारणा को चुनौती दे सकता है कि सैन्य दबाव और नेतृत्व परिवर्तन के जरिए ईरान में आसानी से शासन परिवर्तन कराया जा सकता है।
अंततः यह कहना जल्दबाजी होगा कि ईरान किस दिशा में जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि बाहरी शक्तियां सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिए तेज बदलाव की उम्मीद कर रही हैं, तो उन्हें मध्य-पूर्व के पिछले अनुभवों से सबक लेना होगा।
क्योंकि किसी देश में शासन परिवर्तन का “कड़वा अंत” कभी-कभी एक ऐसे दौर की शुरुआत भी बन सकता है, जो पूरे क्षेत्र के लिए लंबे समय तक “अंतहीन कड़वाहट” का कारण बन जाए।
