यदि बच्चे को सही समझ और स्वीकृति मिले, तो वह अपनी प्रामाणिक अभिव्यक्ति का रास्ता खुद खोज लेगा।


डॉ. कलाले निखिल नागराज

आज की भागदौड़ भरी दुनिया उन लोगों को पुरस्कृत करती है जो आत्मविश्वास के साथ बोलते हैं और तुरंत जवाब देते हैं। ऐसे में उन बच्चों को अक्सर गलत समझ लिया जाता है जो स्वभाव से शांत होते हैं। कुछ बच्चों में खुद को बोलकर व्यक्त करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति तुरंत नहीं दिखती; वे किसी भी सामाजिक मेलजोल, क्लासरूम या खेल के मैदान में उतरने से पहले अपने आसपास के माहौल का बारीकी से अवलोकन (Observe) करना पसंद करते हैं।

स्वभाव और व्यक्तित्व: यह कोई समस्या नहीं है

हर बच्चे का अपना एक ‘टेम्परामेंट’ या मिजाज होता है। कुछ बच्चे जन्मजात अंतर्मुखी (Introverted) होते हैं, तो कुछ ‘स्लो-टू-वॉर्म’ (धीरे-धीरे घुलने-मिलने वाले) व्यक्तित्व के होते हैं। ऐसे बच्चों के लिए शोर-शराबे वाले और अत्यधिक ऊर्जा वाले स्थान तनाव का कारण बन सकते हैं। वे छोटे समूहों या ‘वन-ऑन-वन’ बातचीत में अधिक सहज महसूस करते हैं।

याद रखें, शांत रहने का मतलब यह नहीं है कि बच्चा पीछे है। शांत बच्चे अक्सर दो मुख्य गुणों में दूसरों से आगे होते हैं: गहन अवलोकन और सोच-समझकर बोलना। उनकी चुप्पी उनकी सोचने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

भाषा का विकास: समझना बनाम बोलना

बच्चों में भाषा का विकास अलग-अलग गति से होता है। कुछ बच्चों में ‘रिसेप्टिव लैंग्वेज स्किल्स’ (समझने की क्षमता) बहुत मजबूत होती है, भले ही उनकी ‘एक्सप्रेसिव स्किल्स’ (बोलने की क्षमता) अभी विकसित हो रही हो।

  • वे शब्दों के बजाय शारीरिक भाषा (Body Language) से जवाब दे सकते हैं।
  • वे आपकी बातों को पूरी तरह समझ रहे होते हैं, भले ही वे बोल न रहे हों।
  • हमें यह समझने की जरूरत है कि बच्चा ‘लैंग्वेज डिले’ (भाषाई देरी) का शिकार है या वह केवल शब्दों का चयन सोच-समझकर कर रहा है।

‘शर्मीला’ होने का ठप्पा लगाने से बचें

सामाजिक आत्मविश्वास एक क्रमिक प्रक्रिया है। जब हम किसी बच्चे पर बहुत जल्दी ‘शर्मीला’ (Shy) होने का लेबल लगा देते हैं, तो वह बच्चा उस ठप्पे को सच मान लेता है। दूसरों के सामने बच्चे को शर्मीला कहना उसे सामाजिक स्थितियों से और दूर कर सकता है। उन्हें सुरक्षित महसूस होने दें; सुरक्षा का अहसास होते ही वे अपनी गति से बोलना शुरू कर देंगे।

सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

कई संस्कृतियों और परिवारों में बड़ों के सामने बोलने के बजाय सुनने को अधिक महत्व दिया जाता है। यहाँ मौन को सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसलिए, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले बच्चे के पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश को समझना आवश्यक है।

विशेषज्ञ की सलाह कब लें? (Red Flags)

हालाँकि शांत रहना सामान्य है, लेकिन कुछ स्थितियों में डॉक्टरी जांच जरूरी हो सकती है:

  • यदि बच्चा अपनी बात समझाने में कठिनाई महसूस कर रहा हो।
  • लगातार नजरें मिलाने (Eye Contact) से कतरा रहा हो।
  • परिचित लोगों के साथ भी बातचीत न कर पाना।
  • बोलने की क्षमता विकसित होने के बाद अचानक उस कौशल को खो देना।

बच्चों के लिए ‘सेफ स्पेस’ कैसे बनाएं?

अभिभावक और शिक्षक के रूप में हमारी भूमिका दबाव डालने की नहीं, बल्कि साथ देने की होनी चाहिए:

  1. दबाव न डालें: उन्हें “कुछ बोलो” या “जवाब दो” कहकर मजबूर न करें।
  2. तुलना से बचें: उनकी तुलना अधिक बातूनी बच्चों से कभी न करें।
  3. खुले सवाल पूछें: तनावमुक्त माहौल में उनसे ऐसे सवाल पूछें जिनका जवाब ‘हाँ’ या ‘ना’ से अधिक हो।
  4. अभिव्यक्ति के अन्य माध्यम: उन्हें चित्रकारी, कहानी सुनाने, संगीत या रोल-प्ले (नाटक) के माध्यम से अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित करें।

निष्कर्ष

दुनिया के ये ‘शांत’ बच्चे अक्सर असाधारण विचारक होते हैं। जब हम उन्हें बिना किसी ‘लेबल’ के बिना शर्त स्वीकार करते हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। धैर्य रखें, क्योंकि हर बच्चा अपने समय और अपनी गति से खिलता है।


डॉ. कलाले निखिल नागराज के अनुसार, यदि बच्चे को सही समझ और स्वीकृति मिले, तो वह अपनी प्रामाणिक अभिव्यक्ति का रास्ता खुद खोज लेगा।