प्रवीण कुमार
आर्थिक जगत में 48 घंटे का वक्त हालांकि बहुत छोटा होता है, लेकिन भारत के आम आदमी के लिए बीता 48 घंटा किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा। बुधवार की रात जब देश सोने की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल देख रहा था, तभी गुरुवार की सुबह दूध के दामों ने रसोई का बजट बिगाड़ दिया। शुक्रवार आते-आते पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में वृद्धि ने पूरे जीवन को ही महंगा कर दिया। यह सिर्फ कुछ वस्तुओं के महंगा होने की छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि एक व्यापक आर्थिक संकट की आहट है। जब थोक महंगाई दर (WPI) 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाए और रुपया डॉलर के मुकाबले अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर गोता लगा दे तो सवाल उठना लाजिमी है: क्या भारतीय अर्थव्यवस्था आउट ऑफ कंट्रोल हो रही है?
महंगाई का तीन तरफा प्रहार
भारत में महंगाई को अक्सर ‘सब्जी के दाम’ के चश्मे से ही देखा जाता है, लेकिन वर्तमान स्थिति कहीं अधिक जटिल है। इस बार महंगाई ने तीन तरफा हमला किया है: पहला अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता के कारण सोने के दाम बढ़ रहे हैं। भारतीयों के लिए सोना सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि ‘सेफ हेवन’ निवेश है। जब लोग डरते हैं, तो सोने की मांग बढ़ती है। यह बढ़ती कीमतें वैश्विक अस्थिरता का स्पष्ट संकेत हैं। दूसरा दूध की कीमतों में वृद्धि का ‘कैस्केडिंग इफेक्ट’ होता है। यह सिर्फ चाय महंगी नहीं करता, बल्कि मिठाई, घी, पनीर और संपूर्ण डेयरी उद्योग की लागत बढ़ा देता है, जो अंततः निम्न और मध्यम वर्ग के पोषण पर सीधा प्रहार करता है। तीसरा पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में वृद्धि अर्थव्यवस्था के लिए ‘साइलेंट किलर’ का काम करती है। चूंकि भारत में अधिकांश माल ढुलाई सड़कों के माध्यम से होती है, इसलिए ईंधन महंगा होने का मतलब है कि खेत से मंडी तक आने वाली हर सब्जी और फैक्ट्री से निकलने वाला हर उत्पाद महंगा हो जाएगा।
रुपये की गिरावट: एक गहराता जख्म
डॉलर के मुकाबले रुपये का कमजोर होना भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रहा है। जब रुपया गिरता है, तो भारत का ‘आयात बिल’ (Import Bill) स्वतः बढ़ जाता है। गिरावट के प्रमुख कारणों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियां सबसे ऊपर हैं। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालकर डॉलर में निवेश कर रहे हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली एक और बड़ी वजह बन गई है। भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पूंजी का बाहर जाना रुपये की तरलता को कम कर रहा है। व्यापार घाटे की बात करें तो हम निर्यात कम और आयात अधिक कर रहे हैं। खासकर कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए हमें भारी मात्रा में डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं। कुल मिलाकर कमजोर रुपया केवल एक संख्या नहीं है; यह सीधे तौर पर आपकी जेब से पैसा छीन रहा है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है।
थोक महंगाई (WPI) का डरावना चेहरा
थोक महंगाई दर का 42 महीने के शिखर पर पहुंचना एक ‘अर्ली वार्निंग सिग्नल’ है। थोक मूल्य सूचकांक यह बताता है कि निर्माता और थोक व्यापारी किस दर पर सामान खरीद रहे हैं। यदि सीमेंट, स्टील और कच्चे माल की थोक कीमतें बढ़ती हैं, तो कंपनियां इसे लंबे वक्त तक खुद सहन नहीं कर सकतीं। अंततः यह लागत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में परिवर्तित हो जाती है। यानी आज जो थोक में महंगा है, वह कल आपकी नजदीकी दुकान पर महंगा मिलेगा। इसकी सबसे ज्यादा मार निर्माण क्षेत्र, ऑटोमोबाइल और पैकेज्ड फूड (एफएमसीजी) पर पड़ने वाली है।
मध्यम वर्ग का बिगड़ता गणित
एक मध्यमवर्गीय परिवार, जिसकी मासिक आय ₹40,000 से ₹50,000 के बीच है, उसके लिए उसके घर का पूरा गणित बिगड़ चुका है। मान लीजिए किसी परिवार का मासिक खर्च अभी 35 से 40 हजार रुपये है। दूध और खाद्य वस्तुओं की कीमत बढ़ने से 1000-1500 रुपये अतिरिक्त खर्च हो सकते हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से रोजाना यात्रा का खर्च बढ़ेगा। गैस, CNG और परिवहन महंगा होने से स्कूल बस, ऑटो और टैक्सी किराए भी बढ़ सकते हैं। बिजली और निर्माण सामग्री महंगी होने से किराए और हाउसिंग लागत बढ़ सकती है। यानी कुल मिलाकर मध्यम वर्ग पर हर महीने 3 से 5 हजार रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। निम्न आय वर्ग के लिए यह संकट और गहरा होगा क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और परिवहन पर खर्च होता है। यह अतिरिक्त खर्च किसी विलासिता पर नहीं, बल्कि अनिवार्य जरूरतों पर हो रहा है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि लोग ‘डिस्क्रीशनरी स्पेंडिंग’ (जैसे घूमना, नए कपड़े, बाहर खाना) बंद कर देते हैं, जिससे बाजार में मांग (Demand) कम हो जाती है।
सरकार और आरबीआई के पास विकल्प क्या है?
तो इस तरह के हालात में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकार के हाथ बंधे हुए हैं? वास्तविकता यह है कि सरकार एक ‘कैच-22’ (विकट परिस्थिति) में फंसी है। यदि सरकार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी कम करती है, तो उसे भारी राजस्व हानि होगी, जिससे विकास कार्यों के लिए पैसा कम बचेगा। यदि आरबीआई महंगाई रोकने के लिए रेपो रेट बढ़ाता है तो लोन महंगे हो जाएंगे। लोन महंगे होने से निवेश रुकेगा और जीडीपी विकास दर धीमी पड़ जाएगी। रूस-यूक्रेन या मध्य-पूर्व के तनाव पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है, लेकिन उनकी वजह से बढ़ती तेल की कीमतें भारत की घरेलू नीति को तहस-नहस कर रही हैं।
स्टैगफ्लेशन का खतरा: एक गंभीर चेतावनी
ऐसे में सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत ‘स्टैगफ्लेशन‘ की ओर न बढ़ जाए। यह एक ऐसी स्थिति है जहां महंगाई (Inflation) बहुत ऊंची होती है। आर्थिक विकास स्थिर या धीमा हो जाता है। बेरोजगारी दर बढ़ती है। फिलहाल भारत की विकास दर अन्य देशों की तुलना में बेहतर दिख रही है, लेकिन निजी निवेश की कमी और ग्रामीण मांग में गिरावट इस बात का संकेत है कि जमीनी हकीकत दावों से अलग हो सकती है। जब आय नहीं बढ़ती और खर्चे दोगुने हो जाते हैं, तो अर्थव्यवस्था का पहिया रुकने लगता है।
भविष्य की राह: क्या उम्मीद की जाए?
आने वाले समय में चुनौतियां कम होती नहीं दिख रही हैं। मानसून की अनिश्चितता खाद्य कीमतों को और हवा दे सकती है। यदि डॉलर ₹95-₹96 के पार जाता है, तो आयातित महंगाई (Imported Inflation) को रोकना असंभव होगा। तो सरकार को क्या करना चाहिए? निश्चित रूप से सप्लाई चेन में सुधार एक जरूरी कदम होगा। भंडारण और परिवहन की लागत कम करने के लिए दीर्घकालिक निवेश जरूरी होगा। ईंधन कर में कटौती भी एक बेहतर कदम हो सकता है। राज्यों और केंद्र को मिलकर वैट (VAT) और एक्साइज ड्यूटी पर राहत देनी होगी ताकि ‘कैस्केडिंग इफेक्ट’ को रोका जा सके। इसके अलावा रोजगार सृजन पर ध्यान देना होगा। केवल बुनियादी ढांचे पर खर्च करने से काम नहीं चलेगा; बल्कि एमएसएमई सेक्टर को संजीवनी देनी होगी ताकि लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) बढ़े।
बहरहाल, 48 घंटे में उपजी यह महंगाई कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी का नतीजा है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से सरकार के हाथ से फिसल गई है, ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन यह निश्चित है कि लगाम ढीली पड़ गई है। सरकार के पास अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति का वक्त खत्म हो चुका है। यदि कड़े और सुधारात्मक कदम तुरंत नहीं उठाए गए तो महंगाई का यह चक्र भारत की विकास गाथा को पटरी से उतार सकता है। अंततः किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का पैमाना उसकी जीडीपी के आंकड़े नहीं, बल्कि उसके आम नागरिक की थाली और उसकी बचत होती है। आज ये दोनों ही खतरे में हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

