Last Updated on November 5, 2026 7:46 pm by INDIAN AWAAZ

फॉर्म-6 के पुराने प्रारूप की वापसी और आईटी व्यवस्था की समीक्षा से उठे सवाल


अरुण श्रीवास्तव
नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद के बीच कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की घोषणा की है। आयोग ने स्पष्ट किया कि सामान्य अवधि में नए मतदाता के पंजीकरण के लिए पुराने वैधानिक फॉर्म-6 का ही इस्तेमाल होगा। इसके साथ ही, ऑनलाइन आवेदन में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को फॉर्म-6 से अलग कर दिया गया है। आयोग ने अपनी आईटी व्यवस्था की समीक्षा के लिए समिति बनाने और फील्ड अधिकारियों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप डिजिटल पहुंच देने की बात भी कही है। इन फैसलों को विपक्ष के दबाव का परिणाम माना जाए या जनता का विश्वास बहाल करने की कोशिश—यह सवाल अब राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
क्या है फॉर्म-6 पर विवाद

फॉर्म-6 नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए निर्धारित वैधानिक आवेदन है। एसआईआर के दौरान इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी, जिसमें आवेदक को यह बताना होता था कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली विशेष गहन पुनरीक्षण सूची में दर्ज था या नहीं।

विवाद इस बात पर उठा कि यह अतिरिक्त घोषणा ऑनलाइन फॉर्म-6 के साथ इस तरह दिखाई दे रही थी कि आवेदक को वह उसी वैधानिक फॉर्म का हिस्सा लग सकती थी। आयोग ने बाद में सुप्रीम कोर्ट में कहा कि फॉर्म-6 में औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था; एसआईआर की घोषणा अलग दस्तावेज थी। लेकिन आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन प्रस्तुति से संशोधन का आभास हो सकता था। इसी कारण 21 अक्टूबर से ऑनलाइन आवेदन में फॉर्म-6 और एसआईआर घोषणा को अलग कर दिया गया।

यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं है। मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में किसी अतिरिक्त शर्त की स्थिति, उसका कानूनी आधार और आम नागरिक के लिए उसकी स्पष्टता—तीनों लोकतांत्रिक भरोसे से जुड़े प्रश्न हैं।

आईटी अधिकारियों के अधिकार

आयोग ने यह भी कहा कि फील्ड अधिकारियों को ईसीआईनेट प्रणाली में उनकी वैधानिक जिम्मेदारियों के अनुसार पहुंच मिलेगी। डिजिटल व्यवस्था की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में समिति बनाई जाएगी, जिसमें आईआईटी या आईआईआईटी का स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा। आगे से आईटी मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़ी नई पहलें आयोग की मंजूरी से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा के लिए रखी जाएंगी।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की वैधानिक जिम्मेदारी संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की होती है। यदि डिजिटल प्रणाली में उनकी पहुंच सीमित हो या निर्णय प्रक्रिया अस्पष्ट हो, तो जवाबदेही को लेकर सवाल उठ सकते हैं। स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा से यह जांचने का अवसर मिलेगा कि सिस्टम कानून के अनुरूप काम कर रहा है या नहीं।

—— क्या यह विपक्ष के दबाव का परिणाम है?

समय और घटनाक्रम को देखते हुए विपक्ष के दबाव की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। विपक्षी दलों और कुछ चुनावी प्रक्रिया के आलोचकों ने फॉर्म-6, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और आयोग के आंतरिक निर्णयों पर सवाल उठाए थे। इन मुद्दों पर सार्वजनिक बहस और कानूनी चुनौती के बाद आयोग ने प्रक्रिया में बदलाव और समीक्षा की घोषणा की।

——भरोसा लौटेगा कैसे?

फॉर्म-6 का पुराना वैधानिक प्रारूप सामान्य अवधि में लागू करना और एसआईआर घोषणा को अलग दिखाना प्रक्रिया की स्पष्टता बढ़ा सकता है। लेकिन भरोसा केवल घोषणा से वापस नहीं आता। मतदाताओं को यह समझ में आना चाहिए कि नाम जोड़ने, हटाने या सुधारने के नियम क्या हैं; आवेदन पर निर्णय कौन लेता है; और गलती होने पर शिकायत का समाधान कैसे होगा।

इसी तरह, आईटी समीक्षा का वास्तविक महत्व उसकी स्वतंत्रता, निष्कर्षों और उन पर की जाने वाली कार्रवाई से तय होगा। यदि समीक्षा में कमियां सामने आती हैं और उन्हें समयबद्ध तरीके से दूर किया जाता है, तो आयोग की विश्वसनीयता मजबूत हो सकती है।

अंत में

चुनाव आयोग के हालिया कदमों को विपक्षी दबाव और संस्थागत सुधार—दोनों संदर्भों में देखा जा सकता है। विपक्ष ने सवाल उठाए, सार्वजनिक बहस तेज हुई और आयोग ने प्रक्रिया में बदलाव तथा तकनीकी समीक्षा की घोषणा की। लेकिन इन फैसलों को केवल राजनीतिक जीत या दिखावा बताना अभी जल्दबाजी होगी।

आयोग की विश्वसनीयता का असली पैमाना यह होगा कि नए निर्देश जमीन पर कितनी प्रभावी तरह लागू होते हैं, मतदाताओं की शिकायतों का समाधान कितना पारदर्शी रहता है और आईटी प्रणाली की समीक्षा से क्या ठोस सुधार निकलते हैं। जाहिर है कि लोकतांत्रिक भरोसा बयान से नहीं, स्पष्ट नियमों, निष्पक्ष प्रक्रिया और जवाबदेही से लौटता है।

Arun Shrivastava