Last Updated on September 1, 2026 11:31 pm by INDIAN AWAAZ

Staff Reporter / नई दिल्ली
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने देशव्यापी राजनीतिक अभियान तेज करने का ऐलान करते हुए 1, 2 और 3 दिसंबर को राष्ट्रव्यापी जेल भरो आंदोलन आयोजित करने की घोषणा की है। पार्टी ने इस आंदोलन के तहत कम से कम पांच लाख लोगों के गिरफ्तारी देने का आह्वान किया है। दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘बदलाव जरूरी है’ रैली में पार्टी ने संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और संघीय ढांचे की रक्षा को अपने आगामी राजनीतिक अभियान का प्रमुख आधार बताया।
सीपीआई के मुताबिक, रैली में देश के विभिन्न हिस्सों से करीब 80,000 लोग शामिल हुए। पार्टी ने दावा किया कि प्रतिभागियों ने पुलिस कार्रवाई, कथित नजरबंदी, ट्रेनों के रद्द होने, बाढ़, खराब मौसम और लंबी यात्राओं जैसी कठिनाइयों के बावजूद दिल्ली पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।
रैली में वक्ताओं ने कहा कि देश के सामने चुनौती केवल एक सरकार को हटाकर दूसरी सरकार लाने की नहीं है, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के साथ-साथ आर्थिक एवं सामाजिक असमानता से निपटने की भी है। मजदूरों, किसानों, आदिवासियों, दलितों, महिलाओं और युवाओं के अधिकारों को आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया।
डी. राजा ने संविधान की रक्षा का आह्वान किया
सीपीआई महासचिव डी. राजा ने अपने उद्घाटन संबोधन में देशभर से रामलीला मैदान पहुंचे लोगों का आभार जताया। उन्होंने विशेष रूप से उन कार्यकर्ताओं का उल्लेख किया, जिन्हें पार्टी के अनुसार यात्रा के दौरान पुलिस की कथित बाधाओं, ट्रेनों के रद्द होने और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ा।
राजा ने कहा कि संघर्ष का मूल उद्देश्य संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की रक्षा करना है। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक मूल्यों को कमजोर किया जा रहा है और सार्वजनिक संपत्तियों को कॉरपोरेट हितों के हवाले किया जा रहा है।
उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपने-अपने राज्यों में लौटकर आंदोलन को और मजबूत करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि सीपीआई जनता के संघर्षों के साथ खड़ी रहेगी और उनसे सीखते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाएगी।
अमरजीत कौर का मोदी सरकार पर हमला
सीपीआई की वरिष्ठ नेता और एआईटीयूसी महासचिव अमरजीत कौर ने मोदी सरकार को हटाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पार्टी का संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की राजनीतिक और वैचारिक दिशा को लेकर है।
कौर ने 2014 के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा संकट को केवल सरकारों के आने-जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने बहुसंख्यकवादी राजनीति के खिलाफ चेतावनी देते हुए धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने मजदूरों और किसानों के संघर्षों का उल्लेख करते हुए पूंजीवादी व्यवस्था की आलोचना की और संविधान की रक्षा तथा समाजवादी व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत बताई।

शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सवाल
सीपीआई नेता रामकृष्ण पांडा ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में अमीर और गरीब के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं विकसित हो गई हैं।
उन्होंने सभी के लिए समान शिक्षा और समान स्वास्थ्य सेवाओं की मांग की। पांडा ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी नहीं होने, श्रम संहिताओं और खनिज कानूनों में प्रस्तावित बदलावों पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि बदलाव का अर्थ केवल एक राजनीतिक चेहरे की जगह दूसरे चेहरे को लाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए जो आर्थिक और सामाजिक असमानता को जन्म देती है। उन्होंने वामपंथी और लोकतांत्रिक शक्तियों की एकजुटता का आह्वान करते हुए जेल भरो आंदोलन की तैयारी का संकेत दिया।
महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों पर जोर
सीपीआई सचिवालय की सदस्य एनी राजा ने महिलाओं की स्थिति और उनके अधिकारों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सरकार के महिला सशक्तीकरण के दावों पर सवाल उठाते हुए आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील कर्मियों को मिलने वाले कम पारिश्रमिक का मुद्दा उठाया।
उन्होंने आदिवासी समुदायों के जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों की रक्षा की मांग की और विस्थापन तथा उनकी पहचान मिटाने के प्रयासों का विरोध किया।
एनी राजा ने जातिगत भेदभाव समाप्त करने और दलितों को समान अधिकार देने की मांग की। उन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित हमलों तथा संवैधानिक और संसदीय संस्थाओं के दुरुपयोग को लेकर भी चिंता जताई।
उन्होंने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर की विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाएं संविधान द्वारा दिए गए अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेंगी।
संघीय ढांचे को मजबूत करने की मांग
सीपीआई सचिवालय के सदस्य पल्ला वेंकट रेड्डी ने केंद्र और राज्यों के संबंधों तथा संघीय ढांचे का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता की रक्षा के लिए वास्तविक संघवाद और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान जरूरी है।
उन्होंने बढ़ते केंद्रीकरण को लोकतंत्र और राज्यों के आर्थिक एवं राजनीतिक हितों के लिए चुनौती बताया।
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव के. रामकृष्ण ने भी लोकतांत्रिक अधिकारों और आर्थिक संकट को लेकर सरकार की आलोचना की। उन्होंने 2014 में किए गए वादों को पूरा नहीं करने का आरोप लगाते हुए धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी शक्तियों की एकजुटता का आह्वान किया।
युवाओं के बीच बेरोजगारी और शिक्षा चिंता का विषय
रैली में युवाओं के मुद्दों को भी प्रमुखता मिली। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) के अध्यक्ष विराज देवांग ने कहा कि शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण मजदूरों और किसानों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को कठिन बना रहा है।
उन्होंने कहा कि युवाओं की आकांक्षाओं को केवल नारों से पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए सुरक्षित शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकार सुनिश्चित करना जरूरी है।
ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (एआईवाईएफ) के महासचिव सुखजिंदर महेश्वरी ने बेरोजगारी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा तकनीकी बदलावों से रोजगार पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का मुद्दा उठाया।
उन्होंने युवाओं को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने के लिए व्यापक राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून की मांग की और रोजगार को संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की बात कही।
अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी सीपीआई का रुख
सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डॉ. भालचंद्र कांगो ने भारत के राजनीतिक संघर्ष को वैश्विक परिस्थितियों से जोड़ते हुए फिलिस्तीन में जारी हिंसा, ईरान पर हमलों और यूक्रेन युद्ध का विरोध किया। उन्होंने सभी युद्धों को समाप्त करने की मांग की।
कांगो ने भारत में बढ़ते कॉरपोरेट प्रभाव की भी आलोचना की और आरोप लगाया कि सरकारी नीतियां बड़े कारोबार के पक्ष में हैं तथा आम लोगों के हित प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने अधिनायकवाद, सांप्रदायिकता, साम्राज्यवाद और कॉरपोरेट वर्चस्व के खिलाफ व्यापक संघर्ष का आह्वान किया।
रैली में वरिष्ठ सीपीआई नेता पल्लब सेनगुप्ता ने नेपाल और बिहार में आई विनाशकारी बाढ़ के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देते हुए शोक प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव में प्रभावित परिवारों के प्रति एकजुटता जताई गई, जिन्होंने जान-माल, घर, आजीविका और पशुधन गंवाया।
दिसंबर में पांच लाख लोगों के जेल भरो आंदोलन का लक्ष्य
रैली के समापन पर सीपीआई ने अपने आगामी कार्यक्रमों की घोषणा की। पार्टी ने 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर सांप्रदायिक सद्भाव दिवस और 7 नवंबर को क्रांति दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया।
सबसे महत्वपूर्ण घोषणा 1, 2 और 3 दिसंबर को राष्ट्रव्यापी जेल भरो आंदोलन की रही। पार्टी ने इस दौरान कम से कम पांच लाख लोगों से गिरफ्तारी देने का आह्वान किया है। यह आंदोलन ‘बदलाव’ और जनता के अधिकारों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर चलाया जाएगा।
रैली के संयोजक और सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव पी. संतोष कुमार ने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोगों का रामलीला मैदान पहुंचना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से आंदोलन का संदेश राज्यों, जिलों और गांवों तक ले जाने का आह्वान किया।
सीपीआई ने कहा कि रामलीला मैदान की रैली उसके अभियान का अंत नहीं, बल्कि एक व्यापक आंदोलन की शुरुआत है। पार्टी का दावा है कि वह संविधान, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, सामाजिक न्याय तथा मजदूरों, किसानों, महिलाओं, युवाओं, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर अपना अभियान जारी रखेगी।
रैली का समापन सीपीआई के नारे “बदलाव जरूरी है, बदलाव होकर रहेगा” के साथ हुआ।
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