Last Updated on October 7, 2026 9:07 pm by INDIAN AWAAZ

संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर उठे सवालों के बीच राहुल गांधी के हमले और भाजपा की जवाबी राजनीति ने बहस को नया मोड़ दिया है

अरुण श्रीवास्तव
भारत में चुनाव आयोग केवल एक सरकारी विभाग नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी इसी संस्था को दी गई है। स्वयं चुनाव आयोग अपनी वेबसाइट पर इसे “permanent Constitutional Body” और “autonomous constitutional authority” बताता है।

ऐसे में जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की निष्पक्षता पर विपक्ष गंभीर सवाल उठा रहा है, तब एक स्वाभाविक राजनीतिक प्रश्न सामने आता है—यदि आरोप चुनाव आयोग और उसके प्रमुख पर हैं, तो भाजपा को उनके बचाव में इतनी सक्रियता से सामने आने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। राहुल गांधी और ‘इंडिया’ ब्लॉक के नेताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ दिल्ली में मार्च किया और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की। 6 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया में ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जिनसे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

वहीं चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज कर रहा है। ताजा विवाद Form-6 को लेकर है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इसमें बदलाव “अवैध और एकतरफा” तरीके से किया गया। आयोग ने उनके दावे को “भ्रामक” बताया और कहा कि संबंधित बदलाव 2025 में आयोग की सर्वसम्मति से स्वीकृत प्रक्रिया का हिस्सा था। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश ने यह स्पष्ट किया कि अदालत ने संशोधित Form-6 को मंजूरी नहीं दी थी और संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जाएगी।

यहीं से भाजपा की भूमिका पर सवाल उठता है।

भाजपा का तर्क है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश हैं। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग और केंद्र से जवाब मांगे जाने को भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं की स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा का प्रमाण बताया है।

चुनावी राजनीति की जानकारी रखने वालों को भाजपा का यह पक्ष अपने आप में राजनीतिक रूप से समझ में आता है। चुनाव आयोग पर हमला अप्रत्यक्ष रूप से उस चुनावी व्यवस्था पर भी प्रश्न खड़ा करता है जिसके माध्यम से वर्तमान सरकार और अन्य निर्वाचित सरकारें सत्ता में आती हैं। इसलिए सत्तारूढ़ दल के लिए आयोग की विश्वसनीयता का बचाव करना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है।

लेकिन दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी है। क्या किसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता का सबसे प्रभावी बचाव राजनीतिक दलों द्वारा किया जाना चाहिए, या स्वयं संस्था को पारदर्शी तरीके से अपने निर्णयों और प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण देना चाहिए?

यही इस विवाद का मूल बिंदु है।

यदि चुनाव आयोग के फैसलों पर आरोप लगते हैं, तो आयोग को दस्तावेजों, नियमों और प्रक्रिया के आधार पर जवाब देना चाहिए न कि सत्ताधारी दल को आयोग की ओर से पैरवी करना चाहिए। यदि वास्तव में विपक्ष के आरोप गलत हैं, तो उन्हें तथ्यात्मक तरीके से खारिज किया जाना चाहिए। और यदि किसी प्रक्रिया में वास्तविक संदेह है, तो न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की जांच को पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

वर्तमान विवाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोग से जवाब मांगा जाना भी इसलिए महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह कत्तई नहीं है कि विपक्ष के आरोप सही सिद्ध हो गए हैं। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े प्रश्न अब केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं हैं।

राहुल गांधी के आक्रामक अभियान ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। लेकिन उनके आरोपों को भी अंतिम सत्य मान लेना उतना ही अनुचित होगा जितना बिना जांच के चुनाव आयोग को निर्दोष मान लेना। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता आरोपों या राजनीतिक बचाव से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, प्रमाण और स्वतंत्र जांच से मजबूत होती है।

अंततः सवाल भाजपा के चुनाव आयोग के पक्ष में बोलने का ही नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्तमान में ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाला चुनाव आयोग इतना संस्थागत रूप से मजबूत और पारदर्शी है कि उसे अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए किसी राजनीतिक दल के सहारे की आवश्यकता ही न पड़े?

यही प्रश्न आज की राजनीतिक बहस से आगे जाकर भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है।