Last Updated on May 11, 2026 8:26 pm by INDIAN AWAAZ

नव ठाकुरीया
हाल के वर्षों में पूर्वी भारत में भगवा राजनीति का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसकी सबसे बड़ी झलक असम और पश्चिम बंगाल की राजनीति में देखने को मिली, जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने संगठनात्मक विस्तार और आक्रामक चुनाव प्रचार के बल पर राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया। असम में पार्टी ने लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर अपनी स्थिति और मजबूत की, जबकि पश्चिम बंगाल में उसने सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए मुख्य विपक्षी शक्ति के रूप में खुद को स्थापित किया।
चुनाव प्रचार के दौरान कई राजनीतिक विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि BJP के नेतृत्व वाला गठबंधन असम में पुनः सत्ता में लौटेगा। यह अनुमान सही साबित हुआ जब 126 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी और उसके सहयोगियों ने भारी बहुमत प्राप्त किया। BJP ने अकेले 82 सीटें जीतीं, जबकि उसके सहयोगी असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इसके विपरीत कांग्रेस और उसके सहयोगी दल सीमित सीटों तक सिमट गए। कांग्रेस के प्रमुख नेता गौरव गोगोई को भी चुनावी पराजय का सामना करना पड़ा।
हालाँकि सत्तारूढ़ गठबंधन ने मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा नहीं की थी, लेकिन हिमंत बिस्वा सरमा पूरे चुनाव अभियान का प्रमुख चेहरा बने रहे। वर्ष 2015 में कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए सरमा आज असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत में भगवा राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी ने धार्मिक पहचान, अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाया। विशेष रूप से ‘मिया’ समुदाय और बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया।
इसके साथ ही BJP ने विकास और प्रशासनिक उपलब्धियों को भी चुनाव प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढाँचे के विकास, जनकल्याण योजनाओं तथा पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया को सरकार की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन मुद्दों ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के मतदाताओं को प्रभावित किया।
असम चुनावों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई। संघ ने राज्यभर में हजारों ‘हिंदू सम्मेलन’ आयोजित किए और व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया। स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर लोगों को मतदान के लिए प्रेरित किया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उच्च मतदान प्रतिशत का लाभ BJP गठबंधन को मिला।
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में भी BJP का प्रभाव उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में बनी रही, लेकिन BJP ने बड़ी संख्या में सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया। हिंदुत्व, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रचार के माध्यम से पार्टी ने बंगाल में अपना जनाधार मजबूत किया। लंबे समय तक वामपंथ और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव वाले इस राज्य में BJP का उभार भारतीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूर्वी भारत में BJP का विस्तार केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों से भी जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय पहचान, मजबूत नेतृत्व की छवि और विपक्ष की कमजोर एकजुटता ने BJP को लाभ पहुँचाया है। दूसरी ओर विपक्षी दल भाजपा पर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते रहे हैं।
असम चुनावों के दौरान लोकप्रिय गायक ज़ुबीन गर्ग की मृत्यु से जुड़ा विवाद भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना। कुछ समूहों ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की, लेकिन मतदाताओं ने इस मुद्दे को अपेक्षित महत्व नहीं दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनता ने भावनात्मक मुद्दों की तुलना में स्थिर सरकार और विकास के सवालों को अधिक प्राथमिकता दी।
विशेषज्ञों के अनुसार पूर्वी भारत आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है। असम से लेकर बंगाल तक बदलते राजनीतिक समीकरण यह संकेत देते हैं कि देश की राजनीति में पूर्वी राज्यों की भूमिका लगातार बढ़ती जाएगी।
